हर युद्ध की विभीषिका की यह दुखभरी कहानी है
हर आंगन में सन्नाटा है, हर एक कीआंख में पानी है
जहां कभी जीवन बसता था वहां आज बस धुआं है
गहरे शोक की राख ने धरती से अम्बर तक छुआ है
किंतु राख ही वह मिट्टी है, नए बीज जो बोती है
जीवन का सत्य यही है कि राख “अंत” नहीं होती है
ठंडी पड़ी भस्म से ही होगा फिर साहस का जन्म
टूटे खंडहरों में ही होगा फिर से नवआशा का संगम
शोक की यह स्याह राख फिर उर्वर होकर चमकेगी
मानव की दृढ़ इच्छाशक्ति से फिर मानवता दमकेगी !!!

