NEW English Version

पर्यावरणीय संकट से समाधान की ओर बढ़ने का समय

विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2026 पर विशेषः

5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि पृथ्वी और मानवता के भविष्य को बचाने का वैश्विक संकल्प है। वर्ष 2026 का विश्व पर्यावरण दिवस ऐसे समय में आया है जब जलवायु परिवर्तन, प्लास्टिक प्रदूषण, जैव विविधता का क्षरण, जल संकट, वायु प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन ने पृथ्वी के अस्तित्व को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है। इस वर्ष की थीम “प्लास्टिक प्रदूषण का अंत” केवल प्लास्टिक के उपयोग को कम करने का आह्वान नहीं है, बल्कि उपभोगवादी जीवनशैली और प्रकृति-विरोधी विकास मॉडल पर पुनर्विचार का भी संदेश है। आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को झेल रही है। कहीं भीषण गर्मी जीवन को असहनीय बना रही है, कहीं अनियंत्रित वर्षा और बाढ़ तबाही ला रही है, तो कहीं सूखा और जल संकट मानव अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न खड़े कर रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। उत्तराखंड के जंगलों में आग, हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना, महानगरों में प्रदूषण, बेंगलुरु जैसे तकनीकी नगरों में जल संकट और लगातार बढ़ती गर्मी इस बात के संकेत हैं कि पर्यावरणीय संकट अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की वास्तविकता बन चुका है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टें चेतावनी दे रही हैं कि पिछले एक दशक में जलवायु संबंधी आपदाओं से लाखों लोगों की मृत्यु हुई है और खरबों डॉलर की आर्थिक क्षति हुई है। जैव विविधता का ह्रास, जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण-ये तीनों संकट परस्पर जुड़े हुए हैं। यदि वैश्विक तापमान वृद्धि को नियंत्रित नहीं किया गया तो मानव सभ्यता के सामने अभूतपूर्व संकट खड़ा हो सकता है। 2015 के पेरिस जलवायु समझौते में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन आज भी दुनिया उस दिशा में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि विश्व के सामने उपस्थित इस सबसे बड़े संकट को भारत की राजनीति में वह महत्व नहीं मिला, जिसका वह अधिकारी है। चुनावी घोषणापत्रों में पर्यावरण का उल्लेख तो होता है, लेकिन वह केवल औपचारिकता भर रह जाता है। राजनीतिक दल यह मानकर चलते हैं कि पर्यावरण, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन वोट दिलाने वाले मुद्दे नहीं हैं। परिणामस्वरूप पर्यावरणीय प्रश्न न तो चुनावी बहस का हिस्सा बनते हैं और न ही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का। जबकि सच्चाई यह है कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन, स्वास्थ्य और सुरक्षा इसी प्रश्न पर निर्भर करती है।

पर्यावरणीय संकट का मूल कारण विकास की वह अवधारणा है जिसमें प्रकृति को केवल संसाधन और उपभोग की वस्तु मान लिया गया है। हमने जंगलों को उद्योगों के लिए, नदियों को अपशिष्ट के लिए और भूमि को कंक्रीट के जंगलों में बदलने के लिए प्रयोग किया। प्रकृति हमें जीवन का आधार निःशुल्क देती है, लेकिन हमने उसके प्रति कृतज्ञता के बजाय दोहन का व्यवहार अपनाया। परिणामस्वरूप वनस्पतियों का विनाश, वन्य जीवों का संकट, भूमिगत जल का क्षय और प्रदूषण का विस्तार निरंतर बढ़ रहा है। भारतीय संस्कृति ने सदैव प्रकृति को पूजनीय माना है। वृक्षों, नदियों, पर्वतों और वनस्पतियों को केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि जीवनदाता के रूप में देखा गया। आयुर्वेद और वनौषधि विज्ञान इसका श्रेष्ठ उदाहरण हैं। जड़ी-बूटियों और वनस्पतियों ने हजारों वर्षों तक मानव स्वास्थ्य की रक्षा की, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में यह ज्ञान और प्राकृतिक संपदा दोनों उपेक्षित होते गए। आज जब नई-नई बीमारियां मानव जीवन को चुनौती दे रही हैं, तब पुनः प्रकृति और वनस्पति जगत की ओर लौटने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।

वर्तमान संकट केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक, सामाजिक और नैतिक संकट भी है। वायु प्रदूषण लाखों लोगों की असामयिक मृत्यु का कारण बन रहा है। जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। कृषि व्यवस्था प्रभावित हो रही है। मौसम चक्र असंतुलित हो गया है। गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। कभी इंदिरा गांधी ने कहा था कि ‘गरीबी सबसे बड़ा प्रदूषक है।’ आज यह कथन और अधिक प्रासंगिक हो गया है क्योंकि गरीबी और पर्यावरणीय विनाश एक-दूसरे को बढ़ाने वाले कारक बन गए हैं। भारत में पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनों की कमी नहीं है। 1972 में वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से लेकर अनेक पर्यावरणीय कानून बनाए गए। लेकिन कानूनों और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई बनी हुई है। अवैध खनन, वनों की कटाई, प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की अनदेखी और पर्यावरणीय मंजूरियों में शिथिलता इस बात का प्रमाण हैं कि संस्थागत इच्छाशक्ति अभी भी पर्याप्त नहीं है।

फिर भी आशा की किरण दिखाई देती है। युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता तेजी से बढ़ रही है। विभिन्न सर्वेक्षणों में बड़ी संख्या में युवाओं ने जलवायु संकट को गंभीर विषय माना है और सरकार से इस संबंध में शिक्षा एवं जनजागरण की अपेक्षा की है। यह संकेत है कि नई पीढ़ी पर्यावरण को केवल प्रकृति का नहीं, बल्कि अपने भविष्य का प्रश्न मान रही है। आवश्यकता इस चेतना को सामाजिक और राजनीतिक शक्ति में बदलने की है। समाधान क्या है? सबसे पहले विकास और पर्यावरण को विरोधी नहीं, पूरक मानने की दृष्टि विकसित करनी होगी। ऊर्जा के स्वच्छ स्रोतों को बढ़ावा देना, जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना, सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाना, जल संरक्षण को राष्ट्रीय अभियान बनाना, वृक्षारोपण को जनांदोलन का रूप देना और प्लास्टिक के उपयोग पर प्रभावी नियंत्रण आवश्यक है। केवल सरकारी योजनाओं से यह कार्य संभव नहीं होगा, इसके लिए समाज, उद्योग, शिक्षा संस्थानों और नागरिकों की साझी भागीदारी चाहिए।

दूसरा, पर्यावरण को राजनीतिक एजेंडा बनाना होगा। जिस प्रकार रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य चुनावी मुद्दे बनते हैं, उसी प्रकार स्वच्छ वायु, स्वच्छ जल, हरित विकास और जलवायु सुरक्षा भी राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनें। मतदाता अपने प्रतिनिधियों से पर्यावरण संबंधी दृष्टि और प्रतिबद्धता के बारे में प्रश्न पूछें। जब जनता पर्यावरण को प्राथमिकता देगी, तब राजनीति भी उसकी ओर मुड़ेगी। तीसरा, शिक्षा व्यवस्था में पर्यावरणीय चेतना को व्यवहारिक रूप से शामिल करना होगा। बच्चों और युवाओं को केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव, जल संरक्षण, कचरा प्रबंधन और जैव विविधता संरक्षण के व्यावहारिक संस्कार दिए जाने चाहिए। चैथा, हमें अपनी जीवनशैली में परिवर्तन लाना होगा। अत्यधिक उपभोग, अपव्यय और सुविधावादी संस्कृति ने पर्यावरणीय संकट को बढ़ाया है। संयमित उपभोग, पुनर्चक्रण, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और प्रकृति के प्रति संवेदनशील जीवनशैली ही स्थायी समाधान दे सकती है। यह दृष्टि भारतीय दर्शन और जीवन मूल्यों में पहले से विद्यमान है।

विश्व पर्यावरण दिवस 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि पर्यावरण का प्रश्न केवल पेड़-पौधों या नदियों का प्रश्न नहीं हैय यह मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न है। यदि हमने समय रहते अपनी नीतियों, विकास मॉडल और जीवनशैली में परिवर्तन नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें क्षमा नहीं करेंगी। लेकिन यदि हम सजगता, वैज्ञानिक दृष्टि, राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक सहभागिता के साथ आगे बढ़ें, तो संकट को अवसर में बदल सकते हैं। भारत के पास विश्व को नई दिशा देने की क्षमता है। प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व, अहिंसा, संयम और संतुलित विकास की भारतीय दृष्टि आज पूरे विश्व के लिए मार्गदर्शक बन सकती है। आवश्यकता केवल इतनी है कि पर्यावरण को विकास का विकल्प नहीं, विकास का आधार माना जाए। यही विश्व पर्यावरण दिवस का संदेश है, यही भविष्य की सुरक्षा का मार्ग है और यही पृथ्वी के प्रति हमारी सच्ची जिम्मेदारी भी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »