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संगीत है शांति, संवेदना और मानवता का स्वर

आज का विश्व अभूतपूर्व संकटों के दौर से गुजर रहा है। एक ओर युद्धों की विभीषिका है, दूसरी ओर आतंकवाद का भय, सामाजिक हिंसा, मानसिक तनाव, अवसाद, अकेलापन और असहिष्णुता का बढ़ता हुआ वातावरण। विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को सुविधासंपन्न तो बनाया है, लेकिन मनुष्य के भीतर की शांति, संतुलन और आनंद कहीं खोता जा रहा है। ऐसे समय में यदि कोई शक्ति मनुष्य को स्वयं से, समाज से और मानवता से पुनः जोड़ सकती है तो वह है-संगीत। संगीत केवल मनोरंजन नहीं है, यह मनुष्य के भीतर छिपी संवेदनाओं का जागरण है। यह आत्मा की भाषा है, जो बिना शब्दों के भी हृदय तक पहुंच जाती है। यही कारण है कि 21 जून को विश्व संगीत दिवस केवल एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि मानवता को शांति, संवेदना और सौहार्द का संदेश देने वाला वैश्विक उत्सव बन गया है।

विश्व संगीत दिवस का आरम्भ 1982 में फ्रांस से हुआ था। इसका मूल उद्देश्य था कि संगीत सभागारों और मंचों तक सीमित न रहे, बल्कि सड़कों, पार्कों, चौपालों और जनजीवन में उतरे। धीरे-धीरे यह उत्सव 120 से अधिक देशों तक पहुंच गया। आज यह दिन हमें याद दिलाता है कि संगीत किसी देश, धर्म, जाति या भाषा का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता का साझा धरोहर है। वर्तमान समय में दुनिया का सबसे बड़ा संकट केवल युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बढ़ती हुई कठोरता और संवेदनहीनता है। हथियारों से पहले विचार हिंसक होते हैं और विचारों को मानवीय बनाने का सामर्थ्य संगीत में है। संगीत मनुष्य के भीतर करुणा, प्रेम और सह-अस्तित्व की भावना जगाता है। जहां संवाद समाप्त हो जाता है, वहां संगीत संवाद का नया मार्ग खोल देता है।
इतिहास गवाह है कि युद्धों ने कभी स्थायी शांति नहीं दी, लेकिन संगीत ने सदैव टूटे हुए दिलों को जोड़ा है। सैनिक मोर्चों पर भी गीतों ने साहस जगाया है और शांति आंदोलनों में भी संगीत ने मानवता की आवाज बनकर कार्य किया है। आज जब दुनिया के अनेक हिस्से संघर्षों से जूझ रहे हैं, तब संगीत सीमाओं से परे जाकर मनुष्यों के बीच एक अदृश्य पुल का निर्माण कर सकता है। संगीत का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि यह मनुष्य को भीतर से स्वस्थ बनाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने भी स्वीकार किया है कि संगीत केवल कानों को सुख नहीं देता, बल्कि शरीर और मस्तिष्क पर गहरा सकारात्मक प्रभाव डालता है। अनेक शोधों से प्रमाणित हुआ है कि मधुर संगीत तनाव हार्माेन को कम करता है, रक्तचाप को नियंत्रित करता है, अनिद्रा में राहत देता है तथा अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याओं को कम करने में सहायक होता है।

आज दुनिया में करोड़ों लोग मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रहे हैं। प्रतिस्पर्धा, भागदौड़, अकेलापन और डिजिटल जीवनशैली ने मनुष्य को भीतर से थका दिया है। ऐसे समय में संगीत एक औषधि की तरह कार्य करता है। यही कारण है कि विश्व के अनेक अस्पतालों में संगीत-चिकित्सा- म्यूजिक थैरेपी का प्रयोग किया जा रहा है। यह चिकित्सा व्यक्ति के मन को शांत कर उसके भीतर आशा और सकारात्मकता का संचार करती है। संगीत का संबंध केवल स्वास्थ्य से नहीं, बल्कि रचनात्मकता और सृजनशीलता से भी है। जहां संगीत होता है, वहां जीवन में लय होती है। लयहीन जीवन तनाव पैदा करता है, जबकि संगीत जीवन को संतुलन प्रदान करता है। संगीत सुनने वाला व्यक्ति अधिक संवेदनशील, अधिक कल्पनाशील और अधिक रचनात्मक बनता है। यही कारण है कि साहित्य, कला, चित्रकला, नृत्य और अन्य सृजनात्मक क्षेत्रों में संगीत की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती है। यदि गहराई से देखा जाए तो संपूर्ण प्रकृति स्वयं एक विराट संगीत है। पक्षियों का कलरव, कोयल की कूक, झरनों की कलकल, समुद्र की लहरों का संगीत, वर्षा की रिमझिम, हवा की सरसराहट और पत्तों की थिरकन-सबमें संगीत की ही अभिव्यक्ति है। प्रकृति का यह संगीत हमें सिखाता है कि जीवन संघर्ष नहीं, समन्वय का नाम है। जहां समन्वय है, वहां संगीत है; जहां संगीत है, वहां शांति है।

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भारतीय संस्कृति में संगीत को दिव्यता का स्वरूप माना गया है। भगवान शिव के डमरू से निकली ध्वनियों को सृष्टि के प्रथम नाद का प्रतीक माना गया है। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि प्रेम, आकर्षण और आत्मिक एकता का प्रतीक है। मां सरस्वती के हाथों में वीणा ज्ञान और संगीत के अद्भुत समन्वय का संदेश देती है। भारतीय संगीत की परंपरा हजारों वर्षों पुरानी है। वेदों के मंत्रों से लेकर सामवेद के गायन तक, भक्ति आंदोलन के संतों से लेकर शास्त्रीय संगीत के महान आचार्यों तक, संगीत ने भारतीय समाज को आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सूरदास, तुलसीदास, कबीर, मीरा, नामदेव, तानसेन और बैजू बावरा जैसे महान व्यक्तित्वों ने संगीत को जन-जन तक पहुंचाया। संगीत केवल कला नहीं, बल्कि अहिंसा का भी माध्यम है। हिंसा मनुष्य को विभाजित करती है, जबकि संगीत जोड़ता है। आतंकवाद और कट्टरता का जन्म घृणा से होता है, जबकि संगीत प्रेम का वातावरण निर्मित करता है। यदि बच्चों को बचपन से संगीत, कला और संस्कृति से जोड़ा जाए तो उनके भीतर संवेदनशीलता और सहिष्णुता विकसित होगी। यही संवेदनशीलता भविष्य में हिंसा और कट्टरता के विरुद्ध सबसे बड़ी शक्ति बन सकती है।
आज विश्व को जिस प्रकार योग की आवश्यकता है, उसी प्रकार संगीत की भी आवश्यकता है। वास्तव में संगीत और योग दोनों एक ही लक्ष्य की ओर ले जाते हैं-आंतरिक संतुलन और आत्मिक शांति। योग शरीर और मन को जोड़ता है, जबकि संगीत मन और आत्मा को जोड़ता है। दोनों मिलकर व्यक्ति को सम्पूर्ण स्वास्थ्य और संतुलित जीवन की दिशा प्रदान करते हैं। संगीत सामाजिक सौहार्द का भी महत्वपूर्ण साधन है। किसी भी उत्सव, पर्व, विवाह, धार्मिक आयोजन या राष्ट्रीय समारोह की कल्पना संगीत के बिना नहीं की जा सकती। संगीत लोगों को एक साथ बैठने, सुनने और अनुभव करने का अवसर देता है। जहां लोग साथ गाते हैं, वहां वैमनस्य के लिए स्थान कम रह जाता है। विश्व संगीत दिवस हमें यह संदेश देता है कि यदि दुनिया को अधिक शांतिपूर्ण, अधिक मानवीय और अधिक संवेदनशील बनाना है तो संगीत को जीवन का हिस्सा बनाना होगा। संगीत को केवल मंचों और कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि विद्यालयों, परिवारों, कार्यस्थलों और सामाजिक जीवन में भी उसे सम्मानजनक स्थान देना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम संगीत को केवल मनोरंजन का साधन न मानें, बल्कि जीवन-शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक समरसता और विश्वशांति के प्रभावी माध्यम के रूप में स्वीकार करें। जब दुनिया युद्ध के शोर से कांप रही हो, तब संगीत ही वह मधुर स्वर है जो मानवता को बचा सकता है। जब मनुष्य तनाव और अवसाद से घिरा हो, तब संगीत ही वह प्रकाश है जो भीतर आशा की किरण जगाता है। वस्तुतः संगीत अहिंसा है, संगीत योग है, संगीत शांति है, संगीत ऊर्जा है और संगीत मानवता की आत्मा का स्वर है। विश्व संगीत दिवस इसी शाश्वत सत्य का उत्सव है कि जब तक संगीत जीवित है, तब तक मनुष्य के भीतर प्रेम, करुणा और शांति की संभावना भी जीवित रहेगी।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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