NEW English Version

लंबी उम्र, लेकिन जीवन स्वस्थ क्यों नहीं? ..

विचारोत्तेजक लेख

मान लो “यदि किसी व्यक्ति की आयु 80 वर्ष है, लेकिन अंतिम 10–15 वर्ष अस्पतालों, दवाइयों और दूसरों पर निर्भरता में बीतते हैं, तो क्या इसे वास्तविक प्रगति कहा जा सकता है?” यही प्रश्न आज पूरे विश्व के सामने खड़ा है।

पिछले कुछ दशकों में चिकित्सा विज्ञान ने औसत जीवन-प्रत्याशा (Life Expectancy) बढ़ाने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है। भारत सहित अधिकांश देशों में लोग पहले की तुलना में अधिक समय तक जीवित रह रहे हैं। किंतु इसके साथ एक चिंताजनक प्रवृत्ति भी तेजी से उभरकर सामने आई है! लोग अधिक वर्ष तो जी रहे हैं, परंतु जीवन के अंतिम 8 से 10 वर्ष गंभीर बीमारियों, शारीरिक अक्षमता और मानसिक तनाव के बीच बिताने को विवश हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य वैश्विक स्वास्थ्य अध्ययनों में बार-बार यह तथ्य सामने आया है कि जीवन-प्रत्याशा बढ़ने के बावजूद स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा (Healthy Life Expectancy) उतनी तेजी से नहीं बढ़ी। अर्थात् मनुष्य की आयु तो बढ़ रही है, लेकिन स्वस्थ रहने के वर्ष अपेक्षाकृत कम हैं।इसका सबसे बड़ा कारण बदलती जीवनशैली है।    

आधुनिक जीवन ने मनुष्य को सुविधाएं तो दी हैं, लेकिन शारीरिक श्रम छीन लिया है। घंटों कुर्सी पर बैठकर काम करना, मोबाइल और कंप्यूटर पर निर्भरता, जंक फूड, अत्यधिक चीनी और नमक का सेवन, नींद की कमी तथा मानसिक तनाव ने शरीर की प्राकृतिक प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर दिया है। परिणामस्वरूप मधुमेह, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कैंसर, गठिया, किडनी रोग, फैटी लिवर और अल्जाइमर जैसी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

भारत भी इससे अछूता नहीं है। पहले संक्रामक रोग मृत्यु का प्रमुख कारण थे, लेकिन आज गैर-संचारी रोग (Non-Communicable Diseases—NCDs) सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। हृदय रोग, स्ट्रोक, मधुमेह और कैंसर देश में होने वाली अधिकांश मौतों और दीर्घकालिक विकलांगता के प्रमुख कारण हैं। इन बीमारियों का प्रभाव केवल वृद्धावस्था तक सीमित नहीं रहा; अब 35 से 50 वर्ष की आयु के लोग भी इनके शिकार हो रहे हैं।

एक और महत्वपूर्ण कारण है – चिकित्सा विज्ञान की सफलता। पहले जिन बीमारियों से व्यक्ति की मृत्यु हो जाती थी, आज आधुनिक उपचार उन्हें लंबे समय तक जीवित रखता है। लेकिन कई बार यह अतिरिक्त जीवन पूर्णतः स्वस्थ नहीं होता, बल्कि दवाओं, नियमित जांच और चिकित्सकीय देखभाल पर निर्भर होता है। अर्थात चिकित्सा ने मृत्यु को टाल दिया है, किंतु हर स्थिति में पूर्ण स्वास्थ्य वापस नहीं ला पाई है।

मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही गंभीर विषय बन चुका है। अकेलापन, अवसाद, चिंता, सामाजिक अलगाव और डिजिटल जीवनशैली ने वृद्धावस्था को और कठिन बना दिया है। संयुक्त परिवारों के विघटन के कारण अनेक बुजुर्ग भावनात्मक सहारे से भी वंचित हो रहे हैं! परिणामस्वरूप शारीरिक बीमारी के साथ मानसिक पीड़ा भी बढ़ रही है।

हालांकि इस तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। दुनिया के अनेक क्षेत्रों में ऐसे समुदाय हैं, जहां लोग 90–100 वर्ष की आयु तक अपेक्षाकृत स्वस्थ रहते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इन लोगों की कुछ सामान्य आदतें होती हैं, संतुलित प्राकृतिक भोजन, नियमित शारीरिक श्रम, पर्याप्त नींद, तनाव पर नियंत्रण, सामाजिक जुड़ाव और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण। इसका अर्थ स्पष्ट है कि वृद्धावस्था की अधिकांश समस्याएं केवल उम्र का परिणाम नहीं, बल्कि जीवनशैली का भी परिणाम हैं।

भारत जैसे देश के लिए अब स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य केवल जीवन बचाना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन के वर्षों को बढ़ाना होना चाहिए। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, नियमित स्वास्थ्य जांच, योग, व्यायाम, पौष्टिक भोजन, तंबाकू और शराब से दूरी, मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान तथा बुजुर्गों के लिए सम्मानजनक सामाजिक वातावरण तैयार करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

हमें यह भी समझना होगा कि स्वास्थ्य केवल अस्पतालों से नहीं आता; वह घर की रसोई, सुबह की सैर, संतुलित दिनचर्या, तनावमुक्त जीवन और सामाजिक संबंधों से भी निर्मित होता है। यदि बचपन से ही स्वस्थ जीवनशैली अपनाई जाए, तो जीवन के अंतिम वर्षों को भी सक्रिय, आत्मनिर्भर और गरिमापूर्ण बनाया जा सकता है।

अब प्रश्न केवल लंबी उम्र का नहीं, बल्कि अच्छी उम्र का है। यदि विज्ञान हमें अधिक वर्ष दे रहा है, तो समाज और व्यक्ति दोनों की जिम्मेदारी है कि उन वर्षों को स्वस्थ, सक्रिय और आनंदपूर्ण बनाया जाए। विकास का वास्तविक अर्थ तभी होगा, जब मनुष्य केवल अधिक समय तक न जिए, बल्कि जीवन के अंतिम क्षण तक सम्मान, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के साथ जी सके।

 लंबी उम्र मिले तो क्या, यदि तन-मन रहे लाचार,
स्वस्थ रहे हर साँस जब, तभी सजे जीवन-संसार।
वर्ष नहीं, स्वास्थ्य से ही जीवन का होता मान,
निरोगी काया ही सच में, ईश्वर का अनुपम दान।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »