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अब समय आ गया है… “मोबाइल उपयोग बंद दिवस” मनाने का डिजिटल संयम की ओर एक आवश्यक कदम

समीचीन व ज्वलंत मुद्दा-

आज का युग विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग है। मानव सभ्यता ने जितनी तीव्र गति से विकास किया है, उसमें मोबाइल फोन और इंटरनेट की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। आज मोबाइल केवल बातचीत का माध्यम नहीं रहा, बल्कि शिक्षा, चिकित्सा, बैंकिंग, व्यापार, प्रशासन, मनोरंजन, समाचार, सामाजिक संपर्क और आपातकालीन सेवाओं का भी सबसे बड़ा साधन बन चुका है। वास्तव में यह विज्ञान का एक अद्भुत वरदान है। किन्तु इतिहास साक्षी है कि विज्ञान का प्रत्येक आविष्कार तभी तक वरदान रहता है, जब तक उसका उपयोग विवेक, संतुलन और मर्यादा के साथ किया जाता है। जैसे ही उसका दुरुपयोग या अति-उपयोग आरंभ होता है, वही वरदान धीरे-धीरे अभिशाप का रूप धारण कर लेता है। मोबाइल फोन के साथ भी आज यही स्थिति दिखाई देने लगी है।

एक समय था जब मोबाइल केवल आवश्यकता था, लेकिन आज यह जीवनशैली बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही मोबाइल और रात को सोने से पहले अंतिम बार भी मोबाइल। भोजन करते समय, यात्रा करते समय, परिवार के बीच बैठते समय, यहां तक कि पूजा-पाठ और सामाजिक आयोजनों में भी लोगों का ध्यान मोबाइल स्क्रीन पर ही रहता है।धीरे-धीरे यह सुविधा निर्भरता और फिर लत (Addiction) में बदलती जा रही है।

आज छोटे-छोटे बच्चे घंटों मोबाइल पर गेम खेल रहे हैं। युवा सोशल मीडिया में डूबे रहते हैं और अनेक वयस्क बिना किसी आवश्यक कारण के बार-बार मोबाइल चेक करते रहते हैं। मनोवैज्ञानिक इसे “नोमोफोबिया” (Nomophobia) अर्थात मोबाइल से दूर होने का भय भी मानने लगे हैं। मोबाइल के अत्यधिक उपयोग से अनेक शारीरिक और मानसिक समस्याएं सामने आ रही हैं –   आंखों की रोशनी पर प्रतिकूल प्रभाव। गर्दन और रीढ़ की हड्डी में दर्द।अनिद्रा एवं नींद की गुणवत्ता में गिरावट। तनाव, चिंता और अवसाद की वृद्धि। स्मरण शक्ति एवं एकाग्रता में कमी। बच्चों के मानसिक एवं बौद्धिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव।

विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञ भी स्क्रीन टाइम को सीमित रखने की सलाह देते हैं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मोबाइल ने दूर बैठे लोगों को तो जोड़ दिया, लेकिन एक ही घर में रहने वाले लोगों के बीच दूरी बढ़ा दी। पहले परिवार भोजन के समय एक-दूसरे से बातें करता था, अब अधिकांश लोग मोबाइल स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं। संवाद कम हो रहा है, संवेदनाएं कमजोर हो रही हैं और रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

वाहन चलाते समय मोबाइल का उपयोग आज दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण बन चुका है। एक क्षण का ध्यान भटकना जीवनभर का पछतावा बन सकता है। इसी प्रकार पैदल चलते हुए मोबाइल देखने की आदत भी दुर्घटनाओं को बढ़ा रही है। जिस प्रकार ऊर्जा संरक्षण के लिए “बिजली बचाओ” अभियान चलाए जाते हैं, पर्यावरण संरक्षण के लिए “वाहन मुक्त दिवस” मनाया जाता है, उसी प्रकार अब “मोबाइल उपयोग बंद दिवस” अथवा “डिजिटल डिटॉक्स डे” की आवश्यकता महसूस होने लगी है। इसका उद्देश्य मोबाइल का विरोध करना नहीं होगा, बल्कि उसके विवेकपूर्ण एवं सीमित उपयोग की संस्कृति विकसित करना होगा।

मोबाइल उपयोग बंद दिवस क्यों?  मनाना उचित होगा इसके उत्तर में मैं कह सकता हूं – यदि वर्ष में एक दिन, सप्ताह में कुछ घंटे अथवा प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल से पूर्ण दूरी बनाई जाए तो –  परिवार के साथ गुणवत्तापूर्ण समय मिलेगा। मानसिक शांति बढ़ेगी। आंखों और मस्तिष्क को आराम मिलेगा। पुस्तक पढ़ने और सृजनात्मक कार्यों के लिए समय मिलेगा।बच्चों का सर्वांगीण विकास बेहतर होगा। सामाजिक रिश्ते मजबूत होंगे।प्रकृति के साथ पुनः जुड़ने का अवसर मिलेगा। परिवार एक दिन बिना मोबाइल के साथ समय बिताए। विद्यालयों में “नो मोबाइल आवर” आयोजित किया जाए। कार्यालयों में अनावश्यक मोबाइल उपयोग सीमित किया जाए। पार्कों, पुस्तकालयों और सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहन दिया जाए। युवाओं को डिजिटल संतुलन का प्रशिक्षण दिया जाए।सप्ताह में एक दिन “डिजिटल उपवास” की परंपरा विकसित की जाए।

        मोबाइल समस्या नहीं है, उसका अनियंत्रित उपयोग समस्या है। जिस प्रकार भोजन आवश्यक है लेकिन अति भोजन रोग का कारण बनता है, उसी प्रकार मोबाइल भी आवश्यकता है, परंतु उसकी अति मानसिक, सामाजिक और शारीरिक समस्याओं को जन्म देती है। हमें तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि तकनीक पर नियंत्रण स्थापित करना होगा। विज्ञान मानव का सेवक बने, स्वामी नहीं, यही आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

        जिस प्रकार हमने ऊर्जा संरक्षण के लिए “बिजली बंद दिवस”, पर्यावरण संरक्षण के लिए “वाहन मुक्त दिवस” जैसे अभियानों को अपनाया, उसी प्रकार आने वाले समय में “मोबाइल उपयोग बंद दिवस” भी समाज की आवश्यकता बन सकता है। यह दिवस तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि मानव जीवन में संतुलन, संवाद, स्वास्थ्य और संवेदनशीलता की पुनर्स्थापना का अभियान होगा। यदि आज हम स्वयं पर नियंत्रण नहीं करेंगे, तो कल तकनीक हम पर नियंत्रण स्थापित कर लेगी। इसलिए समय की पुकार है – मोबाइल का उपयोग करें, उसके उपयोग के गुलाम न बनें।

मेरे विचार

“मोबाइल रहे हाथों में, मन पर उसका राज न हो;
रिश्तों की गर्माहट बचे, जीवन केवल स्क्रीन का समाज न हो।।”

मेरा मानना है कि आने वाले समय में “मोबाइल उपयोग बंद दिवस” केवल एक प्रतीकात्मक आयोजन नहीं, बल्कि स्वस्थ, संतुलित और संवेदनशील समाज के निर्माण का जनआंदोलन बन सकता है। विज्ञान का विरोध करना बुद्धिमानी नहीं है, किंतु विज्ञान के अनियंत्रित उपयोग पर आत्म-अनुशासन स्थापित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि हम प्रतिदिन कुछ समय और सप्ताह में एक दिन मोबाइल से दूरी बनाकर परिवार, समाज, प्रकृति और स्वयं से जुड़ने का प्रयास करें, तो यह मानव जीवन की गुणवत्ता को नई दिशा देगा। विज्ञान तभी तक वरदान है, जब तक उसका उपयोग विवेक, संयम और मानवीय मूल्यों के अनुरूप किया जाए।

स्क्रीन की चमक में जीवन न खो जाए कहीं,

रिश्तों की धूप यूँ ही धुंधली न हो जाए कहीं।

मोबाइल साधन है, इसे साध्य न बनने दें,

मानव मन फिर मानव से जुड़ जाए यहीं।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

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