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पीओके की पुकार और दुनिया की जिम्मेदारी


पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में इन दिनों जो परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वे केवल एक चुनावी प्रक्रिया की कहानी नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और जनविश्वास के गहरे संकट की दास्तान हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक शक्ति निष्पक्ष चुनाव, नागरिक स्वतंत्रता और शासन की जवाबदेही में निहित होती है, लेकिन जब चुनाव भय, हिंसा, प्रशासनिक दबाव और धांधली के आरोपों से घिर जाएँ, तब लोकतंत्र का स्वरूप विकृत हो जाता है। आज पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति इसी कठोर वास्तविकता की ओर संकेत करती है। वहाँ के लोगों का आक्रोश केवल चुनावी अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से चली आ रही आर्थिक उपेक्षा, राजनीतिक भेदभाव और नागरिक अधिकारों की अनदेखी के विरुद्ध भी है। यही कारण है कि वहाँ का असंतोष अब स्थानीय मुद्दा न रहकर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बनता जा रहा है। लोकतंत्र केवल मतपेटियों तक सीमित नहीं होता। लोकतंत्र का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक बिना किसी भय, दबाव या प्रलोभन के अपनी इच्छा व्यक्त कर सके और उसकी अभिव्यक्ति का सम्मान हो। यदि किसी क्षेत्र में चुनाव पहले से तय परिणामों का माध्यम बन जाएँ, यदि सत्ता का पूरा तंत्र एक दल विशेष के पक्ष में खड़ा दिखाई दे, यदि विरोध की आवाज को बलपूर्वक दबाया जाए और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर कठोर कार्रवाई हो, तो उसे लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में समय-समय पर ऐसे आरोप सामने आते रहे हैं कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि सत्ता का प्रभाव प्रशासन और चुनावी व्यवस्था पर स्पष्ट दिखाई देता है। यदि जनता के मन में यह विश्वास ही समाप्त हो जाए कि उसका मत परिवर्तन ला सकता है, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण आधार ही समाप्त हो जाता है।

पाकिस्तान स्वयं को लोकतांत्रिक राष्ट्र कहता है, लेकिन उसके व्यवहार में लोकतंत्र की मूल भावना बार-बार प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव करवा देना नहीं है, बल्कि असहमति का सम्मान करना, नागरिक अधिकारों की रक्षा करना और सत्ता की आलोचना को स्वीकार करना भी है। यदि विरोध करने वालों को राष्ट्रविरोधी या व्यवस्था विरोधी बताकर दबाने का प्रयास किया जाए, यदि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित कर दी जाए और यदि प्रशासन जनता के बजाय सत्ता के हितों की रक्षा करता दिखाई दे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों की विश्वसनीयता स्वतः समाप्त होने लगती है। पाकिस्तान की यही दोहरी नीति आज उसके लोकतांत्रिक दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लोगों की सबसे बड़ी पीड़ा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद वहाँ का सामान्य नागरिक मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहा है। बिजली संकट, महँगाई, बेरोजगारी, आवश्यक वस्तुओं की कमी और विकास की धीमी गति ने जनजीवन को अत्यंत कठिन बना दिया है। यह विडंबना है कि जिन नदियों से ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसी क्षेत्र के लोग लंबे समय तक बिजली कटौती झेलने को विवश हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि उनके संसाधनों का उपयोग तो किया जाता है, लेकिन उनके विकास के लिए अपेक्षित निवेश नहीं किया जाता। ऐसी स्थिति में जनता के भीतर असंतोष का बढ़ना स्वाभाविक है।

लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी कसौटी यह होती है कि वह संकट के समय जनता के साथ किस प्रकार खड़ा रहता है। यदि जनता की शिकायतों का समाधान संवाद से करने के बजाय दमन से किया जाए, तो यह शासन की कमजोरी का प्रमाण होता है। पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों और असंतोष के प्रति जिस प्रकार का रवैया अपनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, वे चिंता पैदा करते हैं। लोकतंत्र का उत्तर हिंसा नहीं, बल्कि संवाद होता है। दुर्भाग्य से जब शासन संवाद छोड़कर शक्ति प्रदर्शन का मार्ग अपनाता है, तब जनता और व्यवस्था के बीच विश्वास की खाई और गहरी हो जाती है। विश्व समुदाय के सामने भी यह एक गंभीर नैतिक प्रश्न है। यदि लोकतंत्र और मानवाधिकार वास्तव में सार्वभौमिक मूल्य हैं, तो उनका संरक्षण केवल कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक सीमित नहीं होना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और महाशक्तियाँ अनेक अवसरों पर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में मानवाधिकारों और लोकतंत्र की रक्षा की बात करती हैं। यदि यही सिद्धांत सार्वभौमिक हैं, तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में उठ रहे प्रश्नों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। मानवाधिकारों का मूल्य भौगोलिक सीमाओं से निर्धारित नहीं होता। जहाँ भी नागरिकों की स्वतंत्रता और सम्मान प्रभावित होता है, वहाँ वैश्विक समुदाय की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह स्थिति पर गंभीरता से ध्यान दे।

भारत ने हाल की घटनाओं के संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति की ओर आकर्षित किया है और वहाँ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा तथा दमन रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है। इस प्रकार की अपील को केवल कूटनीतिक दृष्टि से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में चुनावी प्रक्रिया पर लगातार प्रश्न उठ रहे हों, यदि नागरिक असुरक्षा और अविश्वास के वातावरण में जी रहे हों और यदि उनके मौलिक अधिकार प्रभावित हो रहे हों, तो विश्व समुदाय की निष्क्रियता भविष्य के लिए और भी गंभीर संकट उत्पन्न कर सकती है। पाकिस्तान की लोकतांत्रिक नीतियों का सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि एक ओर वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लोकतंत्र, न्याय और जनाधिकारों की बात करता है, वहीं दूसरी ओर अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में उन्हीं मूल्यों को व्यवहार में उतारने में विफल दिखाई देता है। लोकतंत्र की विश्वसनीयता केवल भाषणों से नहीं, बल्कि शासन की कार्यशैली से सिद्ध होती है। यदि नागरिक स्वयं को उपेक्षित, असुरक्षित और असहाय महसूस करें, तो लोकतंत्र का दावा खोखला प्रतीत होने लगता है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ सत्ता परिवर्तन की संभावना, स्वतंत्र संस्थाएँ, निष्पक्ष प्रशासन और नागरिकों की गरिमा की रक्षा है। यदि ये तत्व अनुपस्थित हों, तो चुनाव केवल औपचारिक प्रक्रिया बनकर रह जाते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में चुनाव पूरी तरह शांतिपूर्ण, स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी वातावरण में संपन्न हों। मतदाता बिना किसी भय या दबाव के अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, राजनीतिक दल समान अवसर प्राप्त करें और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास पुनर्स्थापित हो। यह केवल उस क्षेत्र के लोगों के हित में नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में स्थिरता और शांति के लिए भी आवश्यक है। विश्व की महाशक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल वक्तव्यों से नहीं होती। जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमजोर पड़ती हैं, वहाँ समय रहते निष्पक्ष निगरानी, संवाद और मानवाधिकारों के संरक्षण के लिए रचनात्मक प्रयास आवश्यक होते हैं। यदि दुनिया ऐसे मामलों में मौन रहती है, तो लोकतंत्र के सार्वभौमिक मूल्यों की विश्वसनीयता भी कमजोर पड़ती है।

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की वर्तमान परिस्थितियाँ दुनिया के लिए एक चेतावनी हैं कि चुनाव केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की सबसे बड़ी परीक्षा होते हैं। यदि यह विश्वास टूट जाता है, तो असंतोष, अस्थिरता और संघर्ष की परिस्थितियाँ जन्म लेती हैं। आज आवश्यकता किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन करने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र, न्याय, पारदर्शिता और मानवाधिकारों की रक्षा करने की है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को निष्पक्ष दृष्टि से स्थिति का आकलन करते हुए यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि वहाँ के नागरिकों को वही अधिकार और सम्मान मिले, जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के नागरिकों का स्वाभाविक अधिकार है। दुनिया की आँखें अब इस ओर खुलनी चाहिए, क्योंकि जहाँ लोकतंत्र कमजोर होता है, वहाँ अंततः पूरी मानवता की नैतिक शक्ति भी कमजोर पड़ती है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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