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राष्ट्रभाषा के पथ पर बढ़ती हिंदी

लेख का आरंभ महात्मा गांधी के कथन से करता हूं,  “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।” यह एक सामान्य वाक्य विन्यास नहीं है अपितु इसमें भारत की एकता-अखंडता, संस्कृति एवं जीवन मूल्यों की आभा दिखती प्रतीत होती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर हिंदी के पक्ष में कहते हैं कि हिंदी जनमानस की भाषा है, इसे ही राष्ट्रभाषा बनना चाहिए। वहीं लोकमान्य तिलक अपना मत व्यक्त करते हैं कि हिंदी में देश के विभिन्न प्रदेशों को एकता के सूत्र में बांधने का महान कार्य किया है, हिंदी ही राष्ट्रभाषा हो सकती है। आज 14 सितंबर को जब हम हिंदी दिवस के अवसर पर अनेक आयोजन कर रहे होंगे तो हिंदी के महत्व और योगदान की चर्चा करते हुए राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने की भावधारा में डुबकी लगा रहे होंगे। हिंदी भाषा देश की व्यापक संपर्क भाषा होते हुए भी राष्ट्रभाषा की मान्यता से वंचित है, यह हिंदी प्रेमियों के लिए कसक एवं वेदना भरा है। लेकिन मुझे पूर्ण विश्वास है कि आने वाले समय में हिंदी राष्ट्रभाषा के रूप में न केवल अपना स्थान अर्जित करेगी बल्कि विभिन्न भाषा भाषी समुदायों के बीच सहज स्वीकार्य हो भारत के गौरव, गरिमा एवं उपलब्धियों का नवल आख्यान रचेगी।

राष्ट्र भाषा के रूप में हिंदी को बढ़ावा देने हेतु राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा की पहल एवं सुझाव पर सर्वप्रथम 14 सितम्बर, 1953 को हिंदी दिवस का आयोजन किया गया था। यह सर्वविदित है कि 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा में संस्कृत एवं हिंदुस्तानी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर सदस्यों के बीच एक जोरदार तार्किक बहस पश्चात हिंदी को राजभाषा स्वीकार किया गया था। अनुच्छेद 343 (1) के अंतर्गत भारत की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी स्वीकृत की गईं। आगे 26 जनवरी, 1950 को देश में संविधान अंगीकृत होने के साथ ही भारत की राजभाषा नीति भी लागू हो गई, किंतु हिंदीतर तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम, मराठी, गुजराती, बांग्ला भाषी आदि राज्यों के साथ राजकीय पत्राचार एवं संवाद हेतु हिंदी के साथ अंग्रेजी को भी इस शर्त के साथ मान्य किया गया कि अगले 15 वर्षों में हिंदी में पूर्ण रूपेण सुचारू संचालन हेतु आवश्यक पर्याप्त प्रशिक्षण एवं प्रबंध कर लिया जाएगा, किंतु ऐसा संभव नहीं हो सका। कार्य-व्यवहार में अंग्रेजी के अधिकाधिक प्रयोग से हिंदी पीछे होती गई, किंतु वर्तमान परिदृष्य हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अभिषेक करने हेतु परिस्थितियां एवं परिवेश की निर्मिति कर रहा है। विभिन्न मंत्रालयों एवं विभागों द्वारा हिंदी सप्ताह एवं हिंदी पखवाड़ा के राष्ट्रव्यापी आयोजन, कार्यशालाएं करने तथा हिंदी में रचनात्मक लेखन  करने हेतु प्रेरित एवं पुरस्कृत किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार के मंत्रालयों द्वारा हिंदी पत्रिकाएं प्रकाशित की जा रही हैं। पोर्टलों एवं वेबसाइटों में हिंदी में भी सामग्री उपलब्ध है।

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की ऐतिहासिक यात्रा पथ पर दृष्टिपात करें तो सन 1918 में सृजनपति तिवारी का प्रयास हिंदी को जन भाषा मानते हुए राष्ट्रभाषा बनाने का सुझाव स्मृति में कौंधता है। कामता प्रसाद गुरु के प्रयासों की झलकियां सुख देती हैं। स्वतंत्रता के बाद महनीय हिंदी रचनाकारों यथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल, सेठ गोविंद दास, काका कालेलकर, राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, हजारी प्रसाद द्विवेदी,  महादेवी वर्मा आदि ने न केवल सरकारों से पत्राचार कर आग्रह-अनुरोध किया, साथ ही दक्षिण भारत में प्रवास कर हिंदी की स्वीकृति हेतु सकारात्मक परिवेश बनाने की पहल एवं प्रयत्न भी किए। क्वींस कालेज की कक्षा नौवीं के तीन विद्यार्थियों बाबू श्यामसुंदर दास, रामनारायण मिश्र एवं ठाकुर शिवकुमार सिंह द्वारा स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा, काशी का योगदान अविस्मरणीय है, जिसके प्रथम अध्यक्ष राधाकृष्ण दास थे। इस सभा द्वारा हिंदी के ग्रंथ प्रकाशन, न्यायालयों में हिंदी भाषा के प्रयोग तथा विभिन्न कार्यक्रमों के आयोजन द्वारा हिंदी का प्रचार-प्रसार किया गया।

 हिंदी राष्ट्रभाषा भले ही न बन पाई हो किंतु राजकाज की भाषा है। 10 राज्यों ने हिंदी को आधिकारिक राजभाषा का दर्जा दिया है जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली आदि राज्य हैं। गुजरात, पश्चिम बंगाल और मिजोरम राज्यों में हिंदी द्वितीय राजभाषा के रूप में सम्मानित है।

वैश्वीकरण के दौर में हिंदी विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर हो प्रतिष्ठा प्राप्त कर रही है। हिंदी विश्व में सर्वाधिक बोले जाने वाली तीसरी भाषा है। विदेशस्थ 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी भाषा का अध्यापन हो रहा है। आबू धाबी ने हिंदी को न्यायालय की तीसरी भाषा के रूप में मान्यता दी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में आधिकारिक दर्जा प्राप्त अंग्रेजी, फ्रेंच, रूसी, चीनी, स्पेनिश और अरबी के साथ संयुक्त राष्ट्र कार्यालय द्वारा प्रति सप्ताह महत्वपूर्ण सूचनाओं का एक पत्रक हिंदी में भी प्रकाशित किया जाता हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियां एवं व्यापारिक संस्थाएं अपने कर्मचारियों को हिंदी सीखने को प्रेरित एवं प्रशिक्षित कर रही हैं। फिजी, गुयाना, सूरीनाम, टोबैगो, ट्रिनिडाड और अरब अमीरात में हिंदी को आधिकारिक रूप से अल्पसंख्यक भाषा का दर्जा प्राप्त है। भारत के अलावा पूरे विश्व में 25 से अधिक पत्र-पत्रिकाएं हिंदी में निकल रही हैं और हिंदी में रेडियो कार्यक्रम संचालित होते हैं। भारत सरकार द्वारा हिंदी के राजभाषा यात्रा के 75 वर्ष पूरे होने पर एक विशेष स्मारक डाक टिकट 2024 में जारी किया गया था। राष्ट्रीय हिंदी दिवस के अवसर पर हम संकल्प लें कि परिवार, पड़ोस में संवाद तथा निजी एवं सरकारी पत्राचार में हिंदी भाषा का ही प्रयोग करते हुए हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने में योगदान देंगे।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)

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