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उत्सव मनाएं, उन्माद नहीं फैलाएं  रैली जुलूस वाले यह कैसा उत्सव मनाते हैं..?

आखिर कैसी होती जा रही है हमारी संस्कृति..?

मैं अपनी बात अपने शहर और मेरी मातृभूमि बिलासपुर की उस हालिया घटना से शुरू करना चाहता हूं, जिसने शहर की शांत फिजा और उसकी वर्षों पुरानी गंगा-जमुनी तहजीब को क्षणभर के लिए चिंतित कर दिया। निजी विवाद को धार्मिक रंग देकर दो संप्रदायों के कुछ दिग्भ्रमित युवाओं द्वारा जिस प्रकार तनावपूर्ण वातावरण निर्मित करने का प्रयास किया गया, वह केवल कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक संस्कारों के लिए भी गंभीर चेतावनी है।

सौभाग्य से शासन और प्रशासन की समय रहते सजगता, तत्परता और सख्ती ने स्थिति को नियंत्रित कर लिया, जिसके लिए वे निश्चित रूप से धन्यवाद के पात्र हैं। किंतु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आग लगाने के लिए एक छोटी-सी चिंगारी ही पर्याप्त होती है। बिलासपुर का इतिहास आपसी प्रेम, भाईचारे और विभिन्न धर्मों के लोगों के बीच सौहार्दपूर्ण मेल-मिलाप का रहा है। यहां के नागरिकों ने सदैव इस सामाजिक एकता को अपनी जिम्मेदारी समझकर सुरक्षित रखा है। ऐसे में कुछ भटके हुए युवाओं की असावधानी, उन्माद और शक्ति प्रदर्शन की प्रवृत्ति यदि समय रहते नहीं रोकी गई, तो इसके परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ सकते हैं। यह घटना केवल एक घटना नहीं, बल्कि हम सबके लिए चेतावनी है कि धर्म के नाम पर उन्माद नहीं, बल्कि प्रेम; प्रदर्शन नहीं, बल्कि सद्भाव और टकराव नहीं, बल्कि भाईचारा ही हमारे शहर और समाज की वास्तविक पहचान बने।

आजकल शहरों और कस्बों में एक नया चलन तेजी से बढ़ता दिखाई दे रहा है। छोटी-छोटी बातों पर रैली और जुलूस निकालना मानो फैशन बन गया है। धार्मिक उत्सव हो, किसी नेता का आगमन हो, चुनाव में किसी की जीत हो अथवा किसी सामाजिक संगठन का कार्यक्रम, लोगों की पहली प्राथमिकता रैली निकालकर भारी भीड़ जुटाना और अपना शक्ति प्रदर्शन करना बन गई है।

लेकिन प्रश्न यह है कि आखिर रैली वाले यह कैसा उत्सव मनाते हैं? किसी भी धार्मिक या सामाजिक आयोजन का मूल उद्देश्य श्रद्धा, सात्विकता, भक्ति, आपसी प्रेम और सामाजिक सद्भाव होना चाहिए। किंतु दुर्भाग्यवश अनेक आयोजनों में इन मूल भावनाओं की अपेक्षा भीड़ जुटाने, वाहनों की लंबी कतार लगाने और शक्ति प्रदर्शन करने की होड़ अधिक दिखाई देने लगी है।

इन रैलियों और जुलूसों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव आम नागरिकों को भुगतना पड़ता है। घंटों तक सड़कों का अवरुद्ध रहना, यातायात व्यवस्था का चरमरा जाना और स्कूल, अस्पताल अथवा आवश्यक कार्यों के लिए जा रहे लोगों का परेशान होना आम बात हो गई है। क्या किसी उत्सव की खुशी दूसरों के लिए परेशानी का कारण बननी चाहिए?

इसके अतिरिक्त अनावश्यक खर्च भी एक गंभीर विषय है। वाहनों, डीजे, बैनर-पोस्टर और दिखावे पर हजारों-लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। यदि यही धन समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता अथवा पर्यावरण संरक्षण में लगाया जाए तो उत्सव वास्तव में सार्थक बन सकता है।

रैलियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी चिंता का विषय है। कौन अधिक भीड़ जुटाएगा, किसके वाहनों की संख्या अधिक होगी और किसका शक्ति प्रदर्शन बड़ा होगा, यही प्रतिस्पर्धा कई बार आयोजन के मूल उद्देश्य को ही समाप्त कर देती है। इसके साथ हुड़दंग, विवाद और मारपीट जैसी घटनाओं की आशंका भी बनी रहती है।

धार्मिक आयोजनों में तो विशेष रूप से यह विचार आवश्यक है कि भक्ति का प्रदर्शन सड़कों पर शोर और शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि अपने आचरण और सेवा से होना चाहिए। एक स्थान पर सामूहिक रूप से आरती, पूजा, भजन और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जा सकते हैं। सामाजिक एवं सार्वजनिक कार्यक्रमों के माध्यम से आपसी मेल-मिलाप बढ़ाया जा सकता है।

उत्सव के अवसर पर रक्तदान शिविर, पौधारोपण, स्वच्छता अभियान, गरीबों को भोजन एवं वस्त्र वितरण, विद्यार्थियों की सहायता और जनहित के अनेक कार्य किए जा सकते हैं। ऐसे आयोजनों से समाज को वास्तविक लाभ मिलेगा और उत्सव की सार्थकता भी सिद्ध होगी। आज आवश्यकता इस बात की है कि रैली और जुलूस की संस्कृति पर गंभीरता से विचार किया जाए। प्रशासन को भी ऐसी गतिविधियों के लिए स्पष्ट और प्रभावी नियम बनाने चाहिए, वहीं आयोजकों को स्वेच्छा से संयम और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए।

उत्सव मनाना अच्छी बात है, लेकिन उत्सव के नाम पर यातायात रोकना, धन और समय की बर्बादी करना, गंदगी फैलाना और शक्ति प्रदर्शन करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। आइए, हम अपनी उत्सव संस्कृति को अधिक सात्विक, संवेदनशील और समाजोपयोगी बनाएं। क्योंकि सच्चा उत्सव वही है, जिसमें केवल कुछ लोगों का प्रदर्शन नहीं, बल्कि पूरे समाज की खुशी और भलाई शामिल हो।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस

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