NEW English Version

हर आकर्षण प्रेम नहीं होता, रिश्तों की वास्तविकता को समझना जरूरी

प्रेम और पसंद के अंतर को समझकर ही दीजिए संबंधों को वरीयता

मानवीय संबंधों की दुनिया बहुत सुंदर भी है और बहुत जटिल भी। किसी का अच्छा लगना, उसकी ओर आकर्षित होना, उसके साथ समय बिताने की इच्छा होना और उसके प्रति गहरा प्रेम होना ये सभी भाव एक जैसे दिखाई दे सकते हैं, लेकिन वास्तव में इनके अर्थ और गहराई अलग-अलग होती है। समस्या तब पैदा होती है, जब हम पसंद को प्रेम और आकर्षण को स्थायी संबंध समझ बैठते हैं।

अक्सर दो लोग बातचीत करते-करते एक-दूसरे के करीब आते हैं। एक-दूसरे की बातें अच्छी लगती हैं, साथ अच्छा लगता है, परवाह करने से सुख मिलता है और धीरे-धीरे मन उस संबंध को कोई बड़ा नाम दे देता है। यहीं से अपेक्षाएं जन्म लेती हैं। एक पक्ष इसे प्रेम समझने लगता है, जबकि दूसरे के लिए वह केवल आत्मीयता, मित्रता या पसंद तक सीमित हो सकता है।

मनोविज्ञान में आकर्षण को संबंधों की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है, लेकिन दीर्घकालिक संबंध केवल आकर्षण से नहीं चलते। उनमें विश्वास, प्रतिबद्धता, पारस्परिक सम्मान, संवाद और कठिन परिस्थितियों में साथ निभाने की इच्छा भी आवश्यक होती है। मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट स्टर्नबर्ग के प्रेम के त्रिकोणीय सिद्धांत में भी अंतरंगता, जुनून और प्रतिबद्धता को प्रेम के प्रमुख घटक माना गया है। इसका अर्थ यह है कि केवल भावनात्मक आकर्षण को पूर्ण प्रेम मान लेना उचित नहीं है।

सबसे अधिक पीड़ा उस समय होती है, जब व्यक्ति ने किसी संबंध को अपने मन में जितनी ऊंचाई दे दी हो, सामने वाला उसे उतनी ऊंचाई पर मानता ही न हो। तब एक साधारण-सा वाक्य “मैं तुम्हें पसंद करता हूं, लेकिन प्रेम नहीं करता” पूरे भावनात्मक संसार को हिला सकता है। जिसे हम संबंध का आधार समझ रहे थे, वह दूसरे व्यक्ति के लिए शायद केवल एक खूबसूरत पड़ाव था।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है कि हर पसंद का अंत प्रेम में नहीं होता और हर प्रेम का अंत संबंध में नहीं होता। मनुष्य की भावनाएं समय, परिस्थितियों और अनुभवों के साथ बदल सकती हैं। किसी व्यक्ति के प्रति आज गहरा आकर्षण होना इस बात की गारंटी नहीं कि भविष्य में भी वही भाव बना रहेगा। इसी तरह किसी का पीछे हट जाना हमेशा छल या धोखा नहीं होता। कई बार व्यक्ति स्वयं अपनी भावनाओं को समझने के बाद यह महसूस करता है कि वह उस संबंध को आगे नहीं बढ़ाना चाहता।

इसलिए संबंधों में सबसे जरूरी है स्पष्टता। यदि सामने वाला किसी संबंध को केवल मित्रता या पसंद तक सीमित मानता है तो उसकी बात को स्वीकार करना चाहिए। अपनी कल्पनाओं के आधार पर दूसरे व्यक्ति की भावनाओं का अर्थ तय करना अंततः स्वयं को ही पीड़ा देता है।

हमारे समाज में भावनात्मक लगाव को अक्सर इतना महत्व दिया जाता है कि व्यक्ति दूसरे की छोटी-छोटी बातों में भी प्रेम के संकेत खोजने लगता है। संदेश का इंतजार, बार-बार बात करने की इच्छा, चिंता करना या साथ समय बिताना ये सब आत्मीयता के संकेत हो सकते हैं, लेकिन इन्हें अपने आप में प्रेम का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

स्वस्थ संबंध वही है जिसमें दोनों पक्षों की भावनाएं, सीमाएं और अपेक्षाएं स्पष्ट हों। जहां एक व्यक्ति संबंध को जीवन का केंद्र बना ले और दूसरा उसे केवल एक सामान्य आत्मीय रिश्ता समझे, वहां असंतुलन पैदा होना स्वाभाविक है।

इसलिए संबंधों को वरीयता देने से पहले उनके स्वरूप को समझना आवश्यक है। पसंद को प्रेम मानने की जल्दबाजी न करें, आकर्षण को प्रतिबद्धता न समझें और किसी की आत्मीयता को अपनी कल्पना के अनुसार प्रेम का नाम न दें। संबंध जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसकी वास्तविकता को स्वीकार करना भी है।

क्योंकि कभी-कभी रिश्ते का टूटना उतना दुखद नहीं होता, जितना उस रिश्ते के बारे में हमारी बनाई हुई धारणा का टूटना। और जब वह धारणा टूटती है, तभी पैरों तले की जमीन खिसकती महसूस होती है।

इसलिए प्रेम की सुंदरता को बनाए रखने के लिए भावनाओं के साथ-साथ विवेक और स्पष्टता भी जरूरी है। संबंधों को वही ऊंचाई दीजिए, जितनी ऊंचाई पर दोनों एक-दूसरे को स्वीकार करते हों।

डा. पंकज भारद्वाज संपादक पब्लिक इमोशन बिजनौर
डा. पंकज भारद्वाज
संपादक
पब्लिक इमोशन बिजनौर
Book Showcase

Best Selling Books

Shri Durgasaptashati Sachitra

By Gorakhpur Gita Press

₹100

Book 2 Cover

Stop Letting Everything Affect You

By Daniel Chidiac

₹190

Truth without apology

By Acharya Prashant

₹240

30 Days to Better English

By Norman Lewis

₹199

Translate »