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महात्मा गांधी: सत्य और अहिंसा से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने वाला संघर्ष

2 अक्टूबर महात्मा गांधी जयंती

महात्मा गांधी: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की वह शख्सियत, जिसका प्रभाव विश्वभर में दिखाई दिया

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास असंख्य ज्ञात और अज्ञात सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान से निर्मित हुआ है। इस संघर्ष में अनेक लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, जिनमें से बहुतों के नाम इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हो सके। इन सभी के योगदान के बीच महात्मा गांधी का नाम भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा भारत की स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार, सत्य, अहिंसा और मानव कल्याण के विचारों को समर्पित किया।

जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, तब देश के विभिन्न हिस्सों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक असंतोष व्याप्त था। किसानों, मजदूरों और आम जनता की अनेक समस्याओं ने स्वतंत्रता की मांग को व्यापक जन आंदोलन का रूप दिया। इसी दौर में महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाते हुए जनसाधारण को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गांधीजी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के आंदोलनों ने ब्रिटिश शासन को राजनीतिक चुनौती दी। जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सरदार वल्लभभाई पटेल और अन्य अनेक नेताओं के साथ मिलकर उन्होंने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन जैसे अभियानों के माध्यम से स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ा।

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सत्य और अहिंसा बने संघर्ष के प्रमुख आधार

गांधीजी के सार्वजनिक जीवन का आधार सत्य और अहिंसा था। उनका मानना था कि किसी अन्याय का विरोध हिंसा के माध्यम से ही किया जाए, यह आवश्यक नहीं है। वे सत्याग्रह को अन्याय के विरुद्ध नैतिक संघर्ष का माध्यम मानते थे। सत्याग्रह का मूल भाव सत्य के प्रति दृढ़ आग्रह और अन्याय के सामने बिना हिंसा के डटे रहना था।

गांधीजी के विचार में अहिंसा केवल राजनीतिक रणनीति नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक व्यापक सिद्धांत थी। वे इसे मानव कल्याण और सामाजिक सद्भाव से जोड़कर देखते थे। उनका विश्वास था कि अहिंसक संघर्ष के माध्यम से विरोधी के मन में परिवर्तन की संभावना पैदा की जा सकती है और बिना रक्तपात के भी बड़े राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन संभव हैं।

दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का प्रयोग

भारत आने से पहले गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के सिद्धांत का प्रयोग किया था। वहां भारतीय समुदाय को भेदभावपूर्ण कानूनों और अनेक प्रतिबंधों का सामना करना पड़ रहा था। ट्रांसवाल सरकार द्वारा एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट लागू किए जाने के बाद भारतीयों के सामने गंभीर कठिनाइयां उत्पन्न हुईं।

गांधीजी ने भारतीय समुदाय को संगठित किया और कानून के विरोध में अहिंसक आंदोलन प्रारंभ किया। अनेक लोगों ने गिरफ्तारी दी और आंदोलन धीरे धीरे व्यापक होता गया। गांधीजी स्वयं भी गिरफ्तार किए गए। आंदोलन के दबाव और बातचीत के बाद कुछ मुद्दों पर समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़ी। दक्षिण अफ्रीका में हुए इन अनुभवों ने गांधीजी के राजनीतिक चिंतन और सत्याग्रह की पद्धति को आगे विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारत में चंपारण से सत्याग्रह की नई शुरुआत

भारत लौटने के बाद गांधीजी ने किसानों और आम लोगों की समस्याओं को समझने के लिए देश के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया। वर्ष 1917 में चंपारण सत्याग्रह उनके भारतीय राजनीतिक जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल हुआ।

चंपारण में नील की खेती से जुड़े किसानों की समस्याओं और शोषण की शिकायतें सामने आई थीं। किसानों पर विभिन्न प्रकार के दबाव और आर्थिक बोझ होने की बात सामने आई। गांधीजी चंपारण पहुंचे और वहां किसानों की समस्याओं को समझने तथा उनके पक्ष को सामने रखने का प्रयास किया।

स्थानीय प्रशासन ने उन्हें क्षेत्र छोड़ने का आदेश दिया, लेकिन गांधीजी ने शांतिपूर्ण तरीके से इसका विरोध किया। उनके विरुद्ध मुकदमा चलाने की प्रक्रिया शुरू हुई, परंतु बाद में प्रशासन ने कार्रवाई वापस ले ली। इसके बाद किसानों की शिकायतों की जांच की गई और चंपारण का आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सत्याग्रह की प्रभावशीलता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बना।

अहमदाबाद में मजदूरों के समर्थन में आंदोलन

वर्ष 1918 में गांधीजी ने अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों और मिल मालिकों के बीच विवाद में भी हस्तक्षेप किया। विवाद मजदूरी और बोनस से संबंधित था। गांधीजी ने मजदूरों को संगठित किया और उनकी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने का प्रयास किया।

जब मजदूरों ने हड़ताल की, तब गांधीजी ने भी उनके साथ रहकर आंदोलन का नेतृत्व किया। परिस्थितियां कठिन होने पर उन्होंने उपवास का सहारा लिया। अंततः मिल मालिक और मजदूर समझौते के लिए तैयार हुए और विवाद का समाधान हुआ। इस घटना ने गांधीजी के श्रमिक आंदोलनों में हस्तक्षेप और अहिंसक दबाव की पद्धति को भी प्रमुखता दी।

रॉलेट एक्ट के विरोध में देशव्यापी सत्याग्रह

1919 में रॉलेट एक्ट के विरोध ने देश के राजनीतिक वातावरण को और अधिक प्रभावित किया। गांधीजी ने इसके खिलाफ देशव्यापी सत्याग्रह का आह्वान किया। 6 अप्रैल 1919 को देश के विभिन्न हिस्सों में विरोध और सभाएं आयोजित की गईं। बड़ी संख्या में लोगों ने इसमें भाग लिया।

गांधीजी लगातार आंदोलन को अहिंसक बनाए रखने की अपील करते रहे। हालांकि कई स्थानों पर हिंसक घटनाएं भी हुईं। इन घटनाओं से गांधीजी चिंतित हुए और उन्होंने आंदोलन को नियंत्रित करने तथा अहिंसा के सिद्धांत पर जोर दिया। इस दौर में उनकी गिरफ्तारी ने भी व्यापक जन प्रतिक्रिया को जन्म दिया। अंततः गांधीजी ने सत्याग्रह को स्थगित कर दिया।

असहयोग आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को बनाया जन आंदोलन

1920 में नागपुर में कांग्रेस के अधिवेशन में असहयोग आंदोलन को व्यापक रूप दिया गया। इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के साथ असहयोग करके उसके प्रशासनिक और राजनीतिक आधार को कमजोर करना था। आंदोलन के अंतर्गत सरकारी उपाधियों और सम्मान का त्याग, सरकारी संस्थानों का बहिष्कार, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और वैकल्पिक राष्ट्रीय संस्थाओं को प्रोत्साहन जैसे कार्यक्रम शामिल किए गए।

गांधीजी के आह्वान पर बड़ी संख्या में विद्यार्थियों, वकीलों, व्यापारियों, महिलाओं और आम नागरिकों ने आंदोलन में भाग लिया। अनेक लोगों ने सरकारी संस्थानों से दूरी बनाई। मोतीलाल नेहरू और चित्तरंजन दास जैसे प्रमुख वकीलों ने भी वकालत छोड़कर आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। रवींद्रनाथ ठाकुर ने जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में अपनी ‘सर’ की उपाधि वापस कर दी थी।

विदेशी कपड़ों के बहिष्कार और स्वदेशी के प्रचार ने आंदोलन को सामाजिक और आर्थिक आयाम भी दिया। महिलाओं ने भी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की और अनेक लोगों ने अपने संसाधनों से स्वतंत्रता आंदोलन को सहयोग दिया। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को व्यापक जन आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।

चौरी चौरा की घटना और आंदोलन की वापसी

असहयोग आंदोलन के दौरान चौरी चौरा की घटना ने आंदोलन की दिशा बदल दी। वहां प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हिंसक संघर्ष हुआ और पुलिस थाने में आग लगा दी गई, जिसमें पुलिसकर्मियों की मृत्यु हुई। गांधीजी इस घटना से अत्यंत व्यथित हुए क्योंकि उनके लिए अहिंसा आंदोलन की मूल शर्त थी।

उन्होंने माना कि जब आंदोलन हिंसा की ओर बढ़ रहा है तो उसे जारी रखना उचित नहीं होगा। इसलिए उन्होंने असहयोग आंदोलन वापस लेने का निर्णय किया। यह निर्णय उस समय विवाद का विषय भी बना, क्योंकि आंदोलन से जुड़े अनेक लोग इसे जारी रखना चाहते थे। इसके बावजूद गांधीजी अपने अहिंसात्मक सिद्धांत पर कायम रहे।

10 मार्च 1922 को गांधीजी को गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया। उन्हें छह वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई। हालांकि असहयोग आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता प्राप्त नहीं करा सका, लेकिन उसने भारतीय राजनीति में व्यापक जनभागीदारी को बढ़ाया और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।

महात्मा गांधी का योगदान केवल राजनीतिक आंदोलन तक सीमित नहीं था। सत्य, अहिंसा, स्वदेशी, सामाजिक सुधार और जनभागीदारी के उनके विचारों ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को एक विशिष्ट दिशा दी। उन्होंने यह दिखाया कि राजनीतिक संघर्ष में आम जनता की भागीदारी और नैतिक आधार कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

2 अक्टूबर को महात्मा गांधी की जयंती के अवसर पर उनके जीवन और विचारों को याद करना केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को स्मरण करना नहीं है, बल्कि सत्य, अहिंसा, सामाजिक सद्भाव और सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों की प्रासंगिकता पर विचार करने का अवसर भी है। गांधीजी का जीवन भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है, जिसने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के साथ साथ विश्व के अनेक अहिंसक आंदोलनों को भी प्रभावित किया।

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
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