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शिक्षकों पर है नई सृष्टि और दृष्टि गढ़ने की जिम्मेदारी

-विश्व शिक्षक दिवस- 5 अक्टूबर 2026-

शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं होता, वह मनुष्य के भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानकर उन्हें आकार देने वाला शिल्पकार होता है। वह केवल ज्ञान नहीं देता, जीवन को दिशा देता है; केवल परीक्षा के लिए तैयार नहीं करता, बल्कि परिस्थितियों से संघर्ष करने की क्षमता देता है। आज जब दुनिया अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रही है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई हमारी जीवन-शैली, कार्य-पद्धति, ज्ञान और संचार के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित कर रही है, तब शिक्षक की भूमिका कम नहीं, बल्कि पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। मशीनें सूचना दे सकती हैं, उत्तर खोज सकती हैं और अनेक कार्य मनुष्य से तेज कर सकती हैं, लेकिन संवेदना, विवेक, करुणा, नैतिकता और जीवन-मूल्यों का संस्कार मनुष्य ही दे सकता है। यही वह क्षेत्र है जहाँ शिक्षक की भूमिका अद्वितीय है। विश्व शिक्षक दिवस प्रतिवर्ष 5 अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिवस 1966 में आईएलओ-यूनेस्को की शिक्षकों की स्थिति संबंधी अनुशंसा को स्मरण करता है, जिसमें शिक्षकों के अधिकार, दायित्व, प्रशिक्षण, नियुक्ति, रोजगार तथा शिक्षण-कार्य की परिस्थितियों के लिए वैश्विक मानक निर्धारित किए गए थे। 1994 से विश्व शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है।

वर्ष 2026 का विश्व शिक्षक दिवस इसलिए विशेष है कि यह 1966 की उस ऐतिहासिक अनुशंसा की 60वीं वर्षगांठ है। इस वर्ष की थीम है-“शिक्षकों के साथ खड़े रहनाः पेशे की रक्षा, उसकी स्थिति को उन्नत करना और हमारे भविष्य को आकार देना।” यूनेस्को ने इस अवसर पर बदलती दुनिया में शिक्षकों के सामने डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, समावेशन, प्रवासन और विस्थापन जैसी नई चुनौतियों को रेखांकित किया है। इस थीम का संदेश अत्यंत गहरा है। शिक्षक को गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, उचित कार्य-परिस्थितियां, पेशेवर स्वायत्तता, सामाजिक सम्मान और अपनी प्रतिभा का उपयोग करने के अवसर भी चाहिए। यूनेस्को स्वयं यह रेखांकित करता है कि शिक्षकों को जिस तरह तैयार, समर्थित और सम्मानित किया जाता है, वह शिक्षा की गुणवत्ता और समानता से सीधे जुड़ा है।

आज का युग ज्ञान-विस्फोट का युग है। कभी विद्यार्थी के लिए शिक्षक ज्ञान का प्रमुख स्रोत होता था। आज एक मोबाइल फोन पर असंख्य पुस्तकें, व्याख्यान, पाठ्यक्रम और एआई आधारित उपकरण उपलब्ध हैं। ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि जब मशीनें उत्तर देने लगी हैं तो शिक्षक की आवश्यकता क्यों है? इसका उत्तर यही है कि शिक्षक का काम उत्तर देना भर नहीं, सही प्रश्न पूछना सिखाना है। एआई जानकारी दे सकता है, लेकिन उस जानकारी का उपयोग किस उद्देश्य से हो, यह विवेक शिक्षक विकसित करता है। मशीन बुद्धि को तेज कर सकती है, लेकिन मनुष्य को विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार बनाना अभी भी शिक्षक का ही कार्य है। एक बच्चा जब विद्यालय में प्रवेश करता है, तब उसके पास केवल जिज्ञासा होती है। शिक्षक उस जिज्ञासा को ज्ञान में, ज्ञान को विवेक में और विवेक को जीवन-मूल्यों में बदलता है।

एक अच्छा शिक्षक विद्यार्थी को केवल यह नहीं बताता कि क्या सही है, वह उसे सही और गलत के बीच स्वयं निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है। यही वास्तविक शिक्षा है, इसी से उन्नत एवं चरित्रसम्पन्न नागरिकों का निर्माण होता है। महात्मा गांधी ने शिक्षा के सर्वांगीण स्वरूप पर बल दिया था। भारतीय परंपरा में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य को संस्कारित और जिम्मेदार बनाना रहा है। ‘सा विद्या या विमुक्तये’-वही विद्या है जो मुक्ति प्रदान करे। यह मुक्ति केवल अज्ञान से नहीं, बल्कि भय, लोभ, क्रोध, अहंकार, हिंसा, ईर्ष्या और संकीर्णता से भी होनी चाहिए। यदि शिक्षा मनुष्य को अधिक ज्ञानवान तो बनाए, लेकिन अधिक मानवीय न बनाए, तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। आज समाज में हिंसा, तनाव, असहिष्णुता, पारिवारिक विघटन, मानसिक दबाव और सामाजिक अविश्वास की अनेक स्थितियां दिखाई देती हैं। इन समस्याओं का समाधान केवल कानूनों से संभव नहीं है। कानून बाहरी व्यवहार को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन मनुष्य के भीतर करुणा, संयम और सह-अस्तित्व की भावना शिक्षा ही विकसित कर सकती है। इसलिए शिक्षक वास्तव में शांति के निर्माता भी हैं। जिस कक्षा में विद्यार्थी दूसरे की बात सुनना, मतभेद का सम्मान करना, क्रोध को नियंत्रित करना और सहयोग करना सीखता है, वहीं से शांतिपूर्ण समाज की नींव पड़ती है।

आज आवश्यकता ऐसे शिक्षक की है जो विद्यार्थी को प्रतियोगिता के लिए तैयार करने के साथ सहयोग का महत्व भी समझाए; सफलता का अर्थ केवल अधिक धन या बड़ा पद नहीं, बल्कि बेहतर मनुष्य बनना भी बताए। वह बच्चे को यह समझाए कि तकनीक हमारे हाथ में साधन है, हमारा स्वामी नहीं। एआई का उपयोग ज्ञान और सृजन के लिए हो, मानवीय विवेक को समाप्त करने के लिए नहींकृ-संतुलन को समझाने की जिम्मेदारी शिक्षक की है। शिक्षक को आज स्वयं भी निरंतर सीखना होगा। जिस गति से तकनीक बदल रही है, उसमें शिक्षक यदि अपने ज्ञान को स्थिर कर लेगा तो विद्यार्थी से पीछे रह जाएगा। इसलिए आज का शिक्षक केवल ‘गुरु’ नहीं, स्वयं भी आजीवन विद्यार्थी है। यूनेस्को की वर्तमान पहल भी इसी बदलती परिस्थिति में शिक्षक के पेशेवर विकास और समर्थन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। शिक्षक की तुलना एक शिल्पकार से की जा सकती है। शिल्पकार पत्थर में छिपी प्रतिमा को देख लेता है और फिर धीरे-धीरे अनावश्यक अंश हटाकर उसे आकार देता है। उसी प्रकार शिक्षक विद्यार्थी के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानता है। किसी में विज्ञान की प्रतिभा होती है, किसी में साहित्य की, किसी में कला की, किसी में नेतृत्व की और किसी में सेवा की। शिक्षक का दायित्व सभी को एक ही साँचे में ढालना नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी की विशिष्टता को पहचानकर उसे विकसित करना है।

नई सृष्टि का निर्माण ईंट-पत्थरों से नहीं, नई चेतना वाले मनुष्यों से होगा। आने वाले समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता दुनिया की कार्य-व्यवस्था को कितना भी बदल दे, मनुष्य की करुणा, नैतिकता, कल्पनाशीलता और उत्तरदायित्व का महत्व बना रहेगा। इसलिए आज शिक्षक के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि वह विद्यार्थी को कितनी जानकारी दे सकता है, बल्कि यह है कि वह विद्यार्थी को कैसा मनुष्य बना सकता है। महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ का विचार था कि व्यक्तित्व-निर्माण अत्यंत कठिन कार्य है और जागरूक, निःस्वार्थ शिक्षक ही दूसरे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है। यही शिक्षक की असली तपस्या है। वह प्रतिदिन अनेक जीवनों को स्पर्श करता है और उसे पता भी नहीं होता कि उसकी कही हुई कोई छोटी-सी बात किसी विद्यार्थी के जीवन की दिशा बदल सकती है। आज विश्व शिक्षक दिवस हमें केवल शिक्षकों को धन्यवाद देने का अवसर नहीं देता, बल्कि यह आत्ममंथन का भी अवसर है कि हम शिक्षक को वह सम्मान, स्वतंत्रता और सहयोग दे रहे हैं या नहीं, जिसकी उसे आवश्यकता है। 1966 की अनुशंसा के छह दशक बाद भी यूनेस्को इस पेशे की स्थिति को पुनर्विचार का विषय बना रहा है, क्योंकि बदलती दुनिया ने शिक्षक के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

आज शिक्षक के हाथ में केवल चॉक और किताब नहीं, बल्कि आने वाली सभ्यता की दिशा है। वह तय कर सकता है कि एआई से समृद्ध होने वाली दुनिया अधिक मानवीय बनेगी या अधिक यांत्रिक; ज्ञान बढ़ने के साथ विवेक बढ़ेगा या नहीं; तकनीकी प्रगति के साथ करुणा और अहिंसा भी आगे बढ़ेंगी या नहीं। इसलिए 2026 की थीम-“शिक्षकों के साथ खड़े रहना” दरअसल भविष्य के साथ खड़े रहने का आह्वान है। शिक्षक को सशक्त करना नई पीढ़ी को सशक्त करना है। शिक्षक का सम्मान करना ज्ञान, संस्कार और मानवता का सम्मान करना है। और शिक्षक को उसकी गरिमा लौटाना उस नई सृष्टि की नींव मजबूत करना है, जिसमें विज्ञान के साथ संवेदना, बुद्धि के साथ विवेक, शक्ति के साथ करुणा और प्रगति के साथ शांति का सह-अस्तित्व हो। क्योंकि मशीनें भविष्य को तेज बना सकती हैं, लेकिन शिक्षक ही भविष्य को मानवीय बना सकते हैं।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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