शाम हुई है अब जाग सखी।
दूर स्वयं से मत भाग सखी।
नदी ताल गिरि कानन घाटी।
प्रकृति मनोहर अनुराग सखी।।
जगह प्रदूषित बाहर भीतर।
है सिसक रहा मन-काग सखी।।
चमक रहा बाजार दिनोदिन।
फीके रस राई-फाग सखी।।
सुपथ छोड़ संतान चले जब।
झुके पिता की यश-पाग सखी।
जीवन बीता सूत कातते।
चादर है शुचि बेदाग सखी।।
नेह सूत्र में बंधे सकल जन।
मलय सुवासित शुभ राग सखी।।

शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)