प्रेम का अर्थ किसी को अपने जैसा बनाना नहीं, बल्कि उसकी भिन्नताओं के साथ उसे स्वीकार करना है
प्रेम संसार का सबसे सुंदर, सबसे कोमल और सबसे आत्मीय भाव है। यह वह अनुभूति है, जिसमें दो व्यक्ति एक-दूसरे के निकट आते हैं, एक-दूसरे की उपस्थिति में अपने जीवन के अर्थ तलाशते हैं और परस्पर के सुख-दुःख को अपनी संवेदनाओं का हिस्सा बना लेते हैं। प्रेम में एक अद्भुत आकर्षण होता है। किसी का बोलना, मुस्कराना, सोचना, रूठना और यहाँ तक कि उसकी छोटी-छोटी आदतें भी हमें प्रिय लगने लगती हैं। उसकी पसंद हमारी पसंद से जुड़ने लगती है और उसकी प्रसन्नता हमारे हृदय में भी उल्लास भर देती है। किंतु प्रेम की इस सुंदर अनुभूति के बीच एक प्रश्न अक्सर अनदेखा रह जाता है क्या किसी से प्रेम करने का अर्थ यह है कि वह हमारे जैसा सोचने लगे, हमारी तरह व्यवहार करे और जीवन के प्रत्येक प्रश्न पर हमसे सहमत हो जाए?
निस्संदेह, इसका उत्तर नहीं है।
प्रेम का वास्तविक सौंदर्य विचारों की समानता में नहीं, बल्कि विचारों की भिन्नता के प्रति सम्मान में निहित है। दो व्यक्ति एक-दूसरे से गहरा प्रेम कर सकते हैं, फिर भी उनके विचार, दृष्टिकोण, रुचियाँ, मान्यताएँ और जीवन को देखने का नजरिया अलग-अलग हो सकता है। यह भिन्नता प्रेम की कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय व्यक्तित्व की स्वाभाविक विशेषता है। आखिर दो अलग-अलग व्यक्तियों का एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होना और फिर एक-दूसरे के साथ जीवन की यात्रा तय करना इस बात की गारंटी तो नहीं कि उनके मन में उठने वाले प्रत्येक विचार भी एक जैसे होंगे।
प्रेम दो व्यक्तियों के बीच का संबंध है, दो व्यक्तित्वों का विलय नहीं।
हम जिससे प्रेम करते हैं, उसके विचार हमें अक्सर इसलिए भी अच्छे लगते हैं, क्योंकि उन विचारों के साथ उस व्यक्ति की छवि, उसकी आत्मीयता और हमारी भावनाएँ जुड़ी होती हैं। उसकी कही हुई साधारण-सी बात भी हमारे लिए विशेष अर्थ रखती है। हम उसकी बातों को ध्यान से सुनते हैं, उसकी भावनाओं को समझने का प्रयास करते हैं और कई बार उसकी दृष्टि से दुनिया को देखने लगते हैं। लेकिन यह आत्मीयता तब तक ही मधुर रहती है, जब तक उसमें स्वेच्छा और सहजता बनी रहती है। समस्या उस समय जन्म लेती है, जब प्रेम के नाम पर विचारों की स्वतंत्रता को सीमित किया जाने लगता है।
जब कोई व्यक्ति यह अपेक्षा करने लगता है कि उससे प्रेम करने वाला हर बात में उसकी सहमति दे, उसकी मान्यताओं को ही अंतिम सत्य माने और उसके निर्णयों के सामने अपने विचारों को गौण कर दे, तब प्रेम का सहज प्रवाह धीरे-धीरे बाधित होने लगता है। संबंध में संवाद की जगह आग्रह ले लेता है, समझने की जगह समझाने की जिद आ जाती है और आत्मीयता के स्थान पर अधिकार की भावना पनपने लगती है।
यहाँ एक सूक्ष्म अंतर समझना आवश्यक है। किसी को अपने विचार बताना और किसी पर अपने विचार थोपना, दोनों अलग-अलग बातें हैं। अपने विचार साझा करना संवाद है, जबकि दूसरे की असहमति को स्वीकार न करना आग्रह है। अपनी बात के पक्ष में तर्क देना स्वाभाविक है, लेकिन दूसरे व्यक्ति को केवल इसलिए गलत ठहराना कि वह हमारी बात से सहमत नहीं है, प्रेम की गरिमा के विरुद्ध है।

प्रेम में संवाद होना चाहिए, विवाद का भय नहीं। प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता होनी चाहिए, प्रश्न उठाने पर नाराजगी नहीं। असहमति की गुंजाइश होनी चाहिए, असहमति को अपमान समझने की प्रवृत्ति नहीं।
वास्तव में, प्रेम का अर्थ यह नहीं कि हम सामने वाले की प्रत्येक बात को सही मान लें। प्रेम का अर्थ है कि हम उसकी बात को सुनने, समझने और उसके पीछे छिपे भाव को जानने का धैर्य रखें। हम असहमत हो सकते हैं, लेकिन असम्मानजनक नहीं। हम किसी विचार को स्वीकार नहीं कर सकते, लेकिन उस विचार को रखने वाले व्यक्ति के प्रति अपनी आत्मीयता समाप्त करना आवश्यक नहीं है।
कितनी विचित्र बात है कि हम अक्सर अपने प्रिय व्यक्ति से ही सबसे अधिक सहमति की अपेक्षा करते हैं। किसी अपरिचित व्यक्ति के अलग विचारों को हम सहजता से सुन लेते हैं, लेकिन अपने किसी प्रियजन की असहमति हमें बेचैन कर देती है। हमें लगता है कि यदि वह हमसे प्रेम करता है, तो उसे हमारी बात समझनी ही चाहिए; यदि वह हमारी बात नहीं मान रहा, तो शायद उसके प्रेम में कमी है।
यहीं हम प्रेम को समझने में भूल कर बैठते हैं।
किसी व्यक्ति का हमसे असहमत होना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह हमसे कम प्रेम करता है। संभव है कि उसका अनुभव अलग हो, उसकी परिस्थितियाँ भिन्न हों अथवा उसने जीवन के किसी प्रश्न को हमसे अलग दृष्टि से समझा हो। उसका अलग विचार उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व का परिचायक हो सकता है, न कि हमारे प्रति उसके लगाव की कमी का।
प्रेम का प्रमाण हर बात पर सहमति देना नहीं, बल्कि असहमति के बावजूद संबंध की गरिमा बनाए रखना है।
एक स्वस्थ संबंध में दोनों व्यक्तियों को स्वयं बने रहने का अवसर मिलता है। वहाँ किसी को अपनी पसंद बदलने, अपनी रुचियों को छिपाने या अपनी मान्यताओं का त्याग करने के लिए विवश नहीं होना पड़ता। वहाँ परिवर्तन संभव है, लेकिन वह प्रेम और समझ से उपजता है; भय, दबाव या भावनात्मक विवशता से नहीं। जब कोई व्यक्ति अपने प्रिय के विचारों से प्रभावित होकर स्वेच्छा से स्वयं में बदलाव लाता है, तो वह संबंध के विकास का संकेत है। किंतु जब वह केवल विवाद से बचने, नाराजगी सहने अथवा प्रेम खो देने के भय से अपनी बात दबाने लगता है, तो यह परिवर्तन नहीं, स्वयं से दूर होते जाने की प्रक्रिया है।
प्रेम का माधुर्य बहुत कोमल होता है। इसे बनाए रखने के लिए विश्वास, सम्मान और स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार किसी पौधे को बढ़ने के लिए मिट्टी, जल और प्रकाश चाहिए, उसी प्रकार प्रेम को जीवित रहने के लिए आत्मीयता के साथ-साथ खुला आकाश भी चाहिए। पौधे को यदि इस भय से बाँध दिया जाए कि कहीं उसकी शाखाएँ अपनी दिशा में न बढ़ जाएँ, तो उसकी स्वाभाविक वृद्धि बाधित हो जाती है। प्रेम में भी जब हम सामने वाले के विचारों, इच्छाओं और निर्णयों को अपनी अपेक्षाओं के साँचे में ढालने लगते हैं, तब उसके व्यक्तित्व का सहज विकास रुकने लगता है।
यहाँ यह भी समझना होगा कि किसी को स्वतंत्रता देना उससे उदासीन हो जाना नहीं है। प्रेम में परवाह आवश्यक है, लेकिन परवाह और नियंत्रण के बीच एक महीन रेखा होती है। परवाह कहती है “मैं तुम्हारी बात सुनना चाहता हूँ, क्योंकि तुम मेरे लिए महत्त्वपूर्ण हो।” नियंत्रण कहता है “तुम्हें मेरी बात माननी ही होगी, क्योंकि तुम मेरे लिए महत्त्वपूर्ण हो।” पहली भावना संबंध को गहरा करती है, जबकि दूसरी भावना धीरे-धीरे उसमें घुटन पैदा कर सकती है।
कई बार हम अपनी जिद को भी प्रेम का नाम दे देते हैं। हमें लगता है कि हम सामने वाले के हित में उसे समझा रहे हैं, उसका भला चाहते हैं, इसलिए उसे हमारी बात माननी चाहिए। संभव है कि हमारी मंशा सचमुच अच्छी हो, लेकिन अच्छी मंशा होने मात्र से किसी दूसरे व्यक्ति के जीवन पर हमारा अधिकार स्थापित नहीं हो जाता। किसी के लिए क्या उचित है, इसका निर्णय करने में उसके अनुभव, उसकी परिस्थितियों और उसकी इच्छाओं का भी महत्त्व है।
प्रेम में सलाह दी जा सकती है, आदेश नहीं। चिंता व्यक्त की जा सकती है, लेकिन चिंता के नाम पर किसी की स्वतंत्रता नहीं छीनी जानी चाहिए। अपनी असहमति रखी जा सकती है, मगर उसे स्वीकार कराने के लिए भावनात्मक दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए।

