दस सिर धारे लंकाधीश।
ज्ञान-ज्योति के बने प्रतीक॥
वेद-शास्त्र का था अधिकारी।
शिव-भक्ति उसकी अति प्यारी॥
संगीत-स्वर का था वरदान।
ज्योतिष में था पूर्ण प्रमाण॥
आयुर्वेद का गूढ़ विधान।
कंठ बसा था सकल ज्ञान॥
तप से पाया अतुलित मान।
जग करता था गुणगान॥
बल, बुद्धि, वैभव अपार।
मन में जागा अहंकार॥
दंभ बढ़ा, चित्त समाया।
विवेक दूर होता गया॥
मर्यादा का टूटे सेतु।
बन गया विनाशक हेतु॥
स्वर्ण-नगरी, रथ, धन, मान।
क्षण में मिटा सारा अभिमान॥
दस मुख केवल रूप न थे।
दस-दस चिंतन साथ रहे॥
एक दिशा जब सत्य छोड़ती।
जीवन-धारा वहीं मुड़ती॥
रावण केवल नाम नहीं।
मन से उसका ग्राम नहीं॥
लोभ जगे जब भीतर आकर।
रावण हँसता मन में जाकर॥
पद का मद जब शीश चढ़े।
सत्य स्वयं पग पीछे धरे॥
ज्ञान वही जो विनय सिखाए।
शक्ति धर्म के पथ ले जाए॥
सच्चा ज्ञानी वही महान।
त्याग बने जिसका सम्मान॥
रावण-दहन तभी सफल।
जले अहं का अंतर-बल॥
मन में करुणा, सत्य, विवेक।
यही विजय का दिव्य अभिषेक॥
विनय रहे हर श्वास समान।
यही मनुज का श्रेष्ठ प्रमाण॥
विद्या विनय संग रहे,
मिटे अहं का जाल।
भीतर रावण हार जाए,
तभी हैं जीते श्रीराम॥

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस