करवाचौथ का ये त्योहार,
याद दिलाता है हर बार।
पति पत्नी की प्रीति सुदृढ़ हो,
सुखमय मधुमय हो संसार।
मेंहदी रचे और कंगना खनके,
पायल की रुनझुन झंकार।
मांग सिंदूर की लाली दमके,
मन में सजे प्रियतम का प्यार।
अपने आराध्य चंद्र को नारी,
देती है निर्मल जल अर्घ्य।
विनती करे कर जोड़ के तुमसे
दीर्घायु हों पिया सुयोग्य।
दोनों इक दूजे बिन अधूरे,
जैसे चांद चांदनी के बिन।
जीवन को हर चाह अधूरी,
जैसे राग रागिनी के बिन।
शुभ विवाह की मधु स्मृतियां,
अंतर्मन को कर गईं विह्वल।
प्रीति दुल्हन सी सजी आज फिर,
दोनों बने फिर नवल युगल !!!

लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

