दीपों का उत्सव है आज आओ हम मिल दीप जलाएं तारों से आकाश सजा है हम अपनी वसुधा को सजाएं
भेद भाव की सब दीवारें आओ आज गिरा दें हम नफरत की सूखी धरती पर स्नेह सुधा बरसा दें हम
जो बिखरे हैं, जो टूटे हैं उनको आज गले से लगाएं इस पावन दीपोत्सव पर हम मानवता का धर्म निभाएं
अंधियारे का कलुष हटाएं उजियारे की राह दिखाएं जगमग जगमग जलता जाए प्रेम का ऐसा दीप जलाएं
दीपक, बाती,तेल और लौ, तालमेल की बात सिखाएं लहराए खुशियों का परचम, हम सब मिलकर धूम मचाएं !!
स्मृति श्रीवास्तव लेखक के बारे में : स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।