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विष्णुदेव साय के बहाने आदिवासी राजनीति साधी

ललित गर्ग –

विष्णुदेव साय को छत्तीसगढ़ का मुख्यमंत्री घोषित करके भारतीय जनता पार्टी ने एक तीर से अनेक निशाने साधे हैं। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जीवंत आदिवासी समाज को उन्नति के नये शिखर एवं राजनीति में समुचित प्रतिनिधि देने के लिये प्रतिबद्ध है। द्रौपदी मुर्मू को भारत का राष्ट्रपति बनाकर उन्होंने इस समुदाय की आशाओं पर खरे उतरने की कोशिश की है। निश्चित ही विष्णुदेव साय के मुख्यमंत्री बनने से आदिवासी समुदाय में खुशी जगी है, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ पड़ोसी राज्य झारखंड और ओडिशा में भी भाजपा को लाभ मिलेगा, वही मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान के आदिवासी समुदाय के लोगों भी प्रभावित किया जा सकेगा। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से विष्णुदेव साय का निर्णय नया राजनीतिक धरातल तैयार करेगा एवं नयी राजनीतिक दिशाओं को उद्घाटित करेगा।

जमीन से जुड़े, विनम्र, ईमानदार एवं सादगीप्रिय विष्णुदेव साय को मुख्यमंत्री बनाने का निर्णय निश्चित ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह एवं भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा की दूरगामी सोच एवं राजनीतिक परिपक्वता से जुड़ी साहसिक एवं करिश्माई राजनीति की निष्पत्ति है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में विष्णुदेव साय इसलिए बड़ा नाम है, क्योंकि अब तक चार बार के सांसद, तीन बार के विधायक और छत्तीसगढ़ में भाजपा के अध्यक्ष की कमान एवं केंद्र सरकार में राज्य मंत्री भी रह चुके हैं। 26 साल की उम्र में ही पहली बार विधायक बनने वाले विष्णुदेव के दिवंगत दादा बुधनाथ साय 1947 से 1952 तक विधायक रह चुके हैं। उनके दिवंगत ताऊ नरहरि प्रसाद साय भी दो बार विधायक और एक बार सांसद रह चुके हैं। विष्णुदेव साय ने ताज़ा चुनाव कुनकुरी विधानसभा सीट से लड़ा था, जिसमें उन्होंने 25 हजार 541 वोट से जीत दर्ज की। कम बोलने और बेहद विनम्र माने जाने वाले विष्णुदेव साय को, पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का बेहद करीबी माना जाता है। निश्चित ही उनकी मुख्यमंत्री की पारी ऐतिहासिक, अविस्मरणीय एवं राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण बनेगी। 21 फरवरी 1964 को एक आदिवासी परिवार में जन्में विष्णुदेव साय ने अपनी 10वीं तक की पढ़ाई कुनकुरी के लोयला हायर सेकेंडरी स्कूल से की है।
अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा भी था, विष्णुदेवजी हमारे अनुभवी कार्यकर्ता हैं, नेता हैं, सांसद रहे, विधायक रहे, प्रदेश अध्यक्ष रहे। एक अनुभवी नेता को भाजपा आपके सामने लाई है। आप इनको विधायक बना दो, उनको बड़ा आदमी बनाने का काम हम करेंगे।’ अमित शाह ने बड़ा आदमी बनाने का अपना वायदा इतना जल्दी पूरा कर दिया है। वैसे भी 32 फ़ीसद आदिवासी जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ की विधानसभा में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 29 सीटों में से 17 पर भाजपा के कब्ज़े के बाद माना जा रहा था कि किसी आदिवासी विधायक को भाजपा मुख्यमंत्री या उप मुख्यमंत्री बना सकती है। प्रधानमंत्री मोदी ने सत्ता में आने के बाद से ही भ्रष्टाचार को बड़ा मुद्दा बनाया है। भ्रष्टाचार में लिप्त विपक्षी पार्टी के नेताओं के घरों पर ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स की रेड हो रही है। झारखंड के कांग्रेस के सांसद धीरज साहू के घर पर इनकम टैक्स की रेड और 500 करोड़ रुपए की बरामदी हुई है। इसलिये भाजपा ईमानदार नेताओं को आगे लाना चाहती है, विष्णुदेव साय जमीन से जुड़े हैं, आदिवासी हैं और लंबे समय से राजनीतिक जीवन में रहने के बावजूद भ्रष्टाचार के आरोपों से दूर हैं। ऐसे में वे भाजपा के इस कैटेगरी में एकदम फिट बैठे और मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार भी। ईमानदारी के साथ विनम्रता भी उनकी बड़ी विशेषता है। एक दिन पहले उन्होंने कहा-“विनम्रता को कमज़ोरी नहीं मानना चाहिए। मैं तो इसे अपनी ताक़त मानता हूं और मेरी कोशिश रहेगी कि आजीवन विनम्र बना रहूं।”

राजनीतिक स्वार्थ के चलते आजादी के बाद से जंगलों और पहाड़ी इलाकों में रहने वाले आदिवासियों को हमेशा से दबाया और कुचला जाता रहा है जिससे उनकी जिन्दगी अभावग्रस्त ही रही है। कांग्रेस ने आदिवासी के नाम पर सत्ता तो अनेक बार हासिल की, लेकिन उनके कल्याण के लिये कोई ठोस काम नहीं किये। जबकि आदिवासी समुदाय को कांग्रेस विचारधारा का ही माना जाता रहा है, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने अपनी सूझबूझ एवं विवेक से आदिवासी लोगों का दिल जीता है। वर्ष 2007 में मुख्यमंत्री रहते नरेन्द्र मोदी गुजरात के आदिवासी इलाके कवांट में जैन संत गणि राजेन्द्र विजयजी के नेतृत्व में एक समारोह में 15 हजार करोड़ की वनबंधु योजना की शुरुआत की। इनदिनों इन्हीं जैन मुनि की चर्चा चुनाव सभाओं में एवं गुजरात की एक सभा में प्रधानमंत्री ने की। उनके मन में आदिवासी कल्याण की भावना है। राजनीति जोड़तोड की दृष्टि से देखा जाये तो कांग्रेस जहां मुस्लिम वोटों का ध्रूवीकरण एवं तुष्टिकरण कर रही है तो भाजपा के लिये आदिवासी समुदाय ही रोशनी बनते हुए दिख रहे हैं। निश्चित ही आगामी लोकसभा चुनाव में इन आदिवासी वोटों की महत्वपूर्ण भूमिका बनने वाली है।
जब भाजपा हिन्दू राष्ट्र बनाने की ओर अग्रसर है, ऐसे में आदिवासी समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। आदिवासियों में एक बड़ी समस्या धर्मपरिवर्तन की है। प्रलोभनों एवं साम्प्रदायिक ताकतों के कारण कई आदिवासी अपने धर्म को बदलकर आदिवासी समाज से बाहर हो रहे हैं जिसमें ईसाई धर्म को सर्वाधिक स्वीकार गया है।  ईसाई मिश्नरियों ने भारत के आदिवासी क्षेत्र छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, ओडिशा, अंडमान निकोबार, झारखंड, गुजरात, महाराष्ट्र में धर्मांतरण के लिये विद्यालयों एवं छात्रावासों में सफल अभियान चलाया है। ऐसे में आदिवासी की अपनी संस्कृति एवं उनका अस्तित्व खतरा में आ गया। आदिवासी अर्थात जो प्रारंभ से वनों में रहता आया है। करीब 400 पीढ़ियों पूर्व सभी भारतीय वन में ही रहते थे और वे आदिवासी थे परंतु विकासक्रम के चलते पहले ग्राम बने फिर कस्बे और अंत में नगर, महानगर। यही से विभाजन होना प्रारंभ हुआ। जो वन में रह गए वे वनावासी, जो गांव में रह गए वे ग्रामवासी और जो नगर में चले गए वे नगरवासी कहलाने लगे। भारत में लगभग 25 प्रतिशत वन क्षेत्र है, इसके अधिकांश हिस्से में आदिवासी समुदाय रहता है। लगभग नब्बे प्रतिशत खनिज सम्पदा, प्रमुख औषधियां एवं मूल्यवान खाद्य पदार्थ इन्हीं आदिवासी क्षेत्रों में हैं। भारत में कुल आबादी का लगभग 11 प्रतिशत आदिवासी समाज है। इसी बड़ी आबादी को प्रभावित करने के लिये द्रोपदी मुर्मू को राष्ट्रपति बनाना एवं विष्णुदेव को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की परिपक्व राजनीति को दर्शाता है। विष्णुदेव साय का निर्णय राज्य में आदिवासी वोटर्स को ध्यान में रखते हुए सामने आया है। इससे पहले भी आदिवासी वोटर को साधने के लिए भाजपा ने कई सकारात्मक घोषणाएं की है। ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा एक सोची-समझी रणनीति के तहत आगे बढ़ रही है।

स्वतंत्रता आन्दोलन में आदिवासी समाज की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ऐसे अनेक महान् आदिवासी हुए हैं जिन्होंने भारत की मिट्टी एवं उसके स्वतंत्र अस्तित्व-आजादी के लिए अपना बलिदान एवं महान योगदान दिया। ऐसे महान वीर आदिवासियों से भारत का इतिहास समृद्ध है, जिनमें अप्पा साहब, तात्या टोपे, डा. बी.आर. अम्बेडकर, जयपाल सिंह मुण्डा, शहीद वीर नारायण सिंह, शहीद गंडाधुरा, शहीद रानी दुर्गावाती, शहीद बीरसा मुंडा, शहीद सिद्धों, कानु, शहीद तिलका मांझी, शहीद गेंद सिंह, झाड़ा सिरहा जैसे महान आदिवासियों ने अपना बलिदान देकर समाज एवं देश के लिये एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। फिर क्या कारण है कि इस जीवंत एवं मुख्य समाज को देश की मूल धारा से काटने के प्रयास निरन्तर किये जा रहे हैं। आजादी के बाद बनी सभी सरकारों ने इस समाज की उपेक्षा की है। यही कारण है कि यह समाज अनेक समस्याओं से घिरा है। भाजपा आदिवासी समाज के अस्तित्व एवं अस्मिता को धुंधलाने के प्रयासों को नियंत्रित करने एवं सक्रिय होकर आदिवासी कल्याण की योजनाओं को लागू करने में जुटी है। निश्चित तौर पर लोकसभा चुनाव में आदिवासी वोट काफी अहम होगा। भाजपा ने छत्तीसगढ़ में फिर आदिवासी कार्ड खेला है। विष्णुदेव साय प्रभावी आदिवासी नेता हैं और आदिवासी समुदाय में उनकी बड़ी पकड़ है। भाजपा रणनीति के तहत आदिवासी एवं पिछड़े वर्ग को साधने की कोशिश शुरू कर दी है जिसके चमत्कारी परिणाम आयेंगे।

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