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त्रिभाषा फार्मूला है भारत की शिक्षा का नया क्षितिज


भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि भाषाओं, बोलियों, संस्कृतियों और परंपराओं का विराट संगम है। यहां भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि पहचान, संस्कृति, संवेदना और सामाजिक चेतना का आधार भी है। ऐसे बहुभाषी देश में शिक्षा व्यवस्था को किस भाषा में संचालित किया जाए और बच्चों को कौन-कौन सी भाषाएं पढ़ाई जाएं, यह प्रश्न लंबे समय से बहस और राजनीति का विषय रहा है। इसी संदर्भ में “त्रिभाषा फार्मूला” भारतीय शिक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण अवधारणा के रूप में सामने आया। आज नई शिक्षा नीति-2020 और सीबीएसई के ताजा निर्णय ने इसे नए स्वरूप में पुनः प्रासंगिक बना दिया है। नौवीं कक्षा में दो भारतीय भाषाओं को अनिवार्य करने का निर्णय केवल एक शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि भारत की भाषाई आत्मा को मजबूत करने का दूरदर्शी प्रयास है। त्रिभाषा फार्मूला मूलतः 1964-66 के कोठारी आयोग की देन है। इसका उद्देश्य था कि भारत के छात्र तीन भाषाएं सीखें-पहली मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा, दूसरी हिंदी या अन्य भारतीय भाषा तथा तीसरी अंग्रेजी। इस व्यवस्था के पीछे भावना यह थी कि देश के विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच संवाद, समझ और राष्ट्रीय एकता को बढ़ाया जाए।

“त्रिभाषा फार्मूला” का उद्देश्य ही था कि उत्तर भारत के बच्चे दक्षिण भारत की कोई भाषा सीखें और दक्षिण भारत के विद्यार्थी हिंदी से परिचित हों। किंतु दुर्भाग्य से यह नीति अपने मूल उद्देश्य के अनुरूप सफल नहीं हो सकी। इस असफलता के पीछे सबसे बड़ा कारण राजनीतिक विवाद और भाषाई असंतुलन रहा। विशेषकर दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में इसे “हिंदी थोपने” के प्रयास के रूप में देखा गया। वहां यह भावना बनी कि केंद्र सरकार हिंदी को राष्ट्रभाषा के नाम पर क्षेत्रीय भाषाओं पर वर्चस्व दिलाना चाहती है। दूसरी ओर उत्तर भारत ने भी त्रिभाषा फार्मूले की आत्मा को गंभीरता से नहीं अपनाया। यहां अधिकांश राज्यों ने तीसरी भाषा के रूप में किसी दक्षिण भारतीय भाषा को अपनाने के बजाय संस्कृत को शामिल कर औपचारिकता पूरी कर ली। परिणाम यह हुआ कि जिस पारस्परिक भाषाई संवाद एवं सौहार्द की कल्पना की गई थी, वह विकसित नहीं हो सका। आज भी स्थिति यह है कि उत्तर भारत के अधिकांश निजी विद्यालयों में बच्चों को अंग्रेजी के साथ फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश और जापानी जैसी विदेशी भाषाएं पढ़ाई जाती हैं, लेकिन भारतीय भाषाओं की उपेक्षा की जाती है। कई प्रतिष्ठित स्कूलों में हिंदी तक को गौण बना दिया गया है। यह विडंबना ही है कि विदेशी भाषाएं आधुनिकता और प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती हैं, जबकि अपनी मातृभाषा या भारतीय भाषाएं “अतिरिक्त बोझ” बताई जाती हैं। यह मानसिकता भारतीय भाषाओं के प्रति हीनभावना को दर्शाती है। आश्चर्य है कि दो-तीन विदेशी भाषाएं पढ़ना अभिभावकों को अपने बच्चों पर अतिरिक्त बोझ नहीं लगता, लेकिन अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाएं सीखने के नाम पर वे सड़कों पर उतरने के लिए तैयार हैं। यह अनुचित है। सरकार को किसी भी हालत में झुकना नहीं चाहिए।

त्रिभाषा फार्मूला भारतीय भाषाओं विशेषतः हिंदी को प्रोत्साहन देने की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी और प्रासंगिक है। यह केवल भाषा सीखने की नीति नहीं, बल्कि भारत की भाषाई एकता और सांस्कृतिक सौहार्द को मजबूत करने का माध्यम है। इस व्यवस्था से उत्तर भारत के विद्यार्थी दक्षिण भारतीय भाषाओं से परिचित होंगे और दक्षिण भारत के विद्यार्थी हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं को समझ सकेंगे, जिससे भाषाई दूरी और क्षेत्रीय संकीर्णता कम होगी। साथ ही मातृभाषा आधारित शिक्षा बच्चों की समझ, संवेदनशीलता और अभिव्यक्ति क्षमता को भी विकसित करती है। आज वैश्वीकरण के दौर में विदेशी भाषाओं का ज्ञान उपयोगी अवश्य है, लेकिन अपनी भाषाओं की उपेक्षा किसी भी राष्ट्र के सांस्कृतिक आत्मविश्वास को कमजोर करती है। इसलिए त्रिभाषा फार्मूला भारतीय भाषाओं को सम्मान देने, हिंदी को संपर्क भाषा के रूप में मजबूत बनाने तथा भारत की बहुभाषी सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करने की दिशा में एक दूरदर्शी और आवश्यक पहल है।

सीबीएसई और केंद्र सरकार का ताजा निर्णय इसी मानसिकता को बदलने का प्रयास है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत यह स्पष्ट किया गया है कि बच्चों द्वारा चुनी गई तीन भाषाओं में कम-से-कम दो भारतीय भाषाएं होंगी। यह व्यवस्था किसी भाषा को थोपने की नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं को सम्मान और अवसर देने की नीति है। नई शिक्षा नीति का सबसे सकारात्मक पक्ष इसका लचीलापन है। इसमें किसी राज्य या विद्यार्थी पर कोई विशेष भाषा अनिवार्य नहीं की गई। छात्र अपनी रुचि और क्षेत्रीय आवश्यकता के अनुसार भाषा चुन सकते हैं। यह दृष्टिकोण पहले की तुलना में अधिक व्यावहारिक और लोकतांत्रिक है। त्रिभाषा फार्मूले की सबसे बड़ी उपयोगिता राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक समन्वय में दिखाई देती है। भाषा मनुष्य को केवल शब्द नहीं देती, बल्कि सोचने का तरीका, संस्कृति का बोध और समाज की संवेदनाएं भी प्रदान करती है। जब उत्तर भारत का छात्र तमिल, तेलुगु, मलयालम या कन्नड़ सीखेगा और दक्षिण भारत का छात्र हिंदी या अन्य उत्तर भारतीय भाषाओं को समझेगा, तब दोनों के बीच मानसिक दूरी स्वतः कम होगी। इससे भाषाई वैमनस्य और क्षेत्रीय संकीर्णता कमजोर होगी। भारत की विविधता को समझने और स्वीकारने की दृष्टि विकसित होगी।

इसके अतिरिक्त बहुभाषी शिक्षा बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए भी लाभकारी मानी गई है। यूनेस्को सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टें बताती हैं कि बहुभाषी बच्चे अधिक रचनात्मक, विश्लेषणात्मक और संवेदनशील होते हैं। मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा मिलने से बच्चों की अवधारणात्मक समझ मजबूत होती है और उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। यही कारण है कि विकसित देशों जैसे- जापान, चीन, फ्रांस, जर्मनी और रूस ने अपनी शिक्षा और प्रशासन को अपनी भाषाओं में संचालित किया और विज्ञान-तकनीक में अभूतपूर्व प्रगति की। भारत में भी यदि भारतीय भाषाओं को शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान का माध्यम बनाया जाए तो शिक्षा अधिक व्यापक और समावेशी बन सकती है। हालांकि त्रिभाषा फार्मूले को लागू करने में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी हैं। सबसे बड़ी समस्या प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है। यदि उत्तर भारत के स्कूलों में तमिल या तेलुगु पढ़ाई जानी है तो उसके लिए योग्य शिक्षकों और पाठ्य सामग्री की आवश्यकता होगी। इसी प्रकार दक्षिण भारत में हिंदी शिक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन चाहिए। दूसरी चुनौती विद्यार्थियों पर अतिरिक्त शैक्षणिक दबाव की है। कई अभिभावकों को आशंका है कि तीन भाषाएं सीखने से बच्चों पर बोझ बढ़ेगा और उनके परीक्षा परिणाम प्रभावित होंगे। लेकिन यह चिंता तब कम हो जाती है जब सरकार स्पष्ट करती है कि तीसरी भाषा का पाठ्यक्रम हल्का होगा, बोर्ड परीक्षा में उसे शामिल नहीं किया जाएगा और उसका मूल्यांकन आंतरिक होगा।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने त्रिभाषा फार्मूले को अधिक लचीले और व्यावहारिक स्वरूप में लागू करने पर बल दिया, ताकि भारत की भाषाई विविधता को सम्मान मिले और विद्यार्थियों में बहुभाषी क्षमता विकसित हो।’ भारत में करोड़ों लोग रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक संपर्क के कारण स्वाभाविक रूप से अनेक भाषाएं सीख लेते हैं। इसलिए भारतीय भाषाओं को बोझ बताना उचित नहीं कहा जा सकता। नई शिक्षा नीति का यह प्रयास इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारतीय भाषाओं को पुनः सम्मान देने की दिशा में कदम है। लंबे समय तक अंग्रेजी को आधुनिकता और सफलता का पर्याय मान लिया गया। परिणामस्वरूप भारतीय भाषाओं में ज्ञान-सृजन और उच्च शिक्षा का विकास बाधित हुआ।

यह भी आवश्यक है कि त्रिभाषा फार्मूले को राजनीतिक विवाद का विषय न बनाया जाए। भाषा किसी पर थोपने की वस्तु नहीं, बल्कि जोड़ने का माध्यम होनी चाहिए। यह नीति तभी सफल होगी जब इसमें पारस्परिकता, संवेदनशीलता और संतुलन रहेगा। अंततः कहा जा सकता है कि त्रिभाषा फार्मूला केवल भाषा शिक्षण की नीति नहीं, बल्कि भारतीय बहुलता को एकसूत्र में पिरोने का राष्ट्रीय अभियान है। नई शिक्षा नीति-2020 ने इसे अधिक लचीला, व्यावहारिक और समावेशी बनाकर नई आशा जगाई है। यदि इसे ईमानदारी, दूरदृष्टि और संतुलन के साथ लागू किया जाए तो यह भारत को भाषाई संघर्षों से निकालकर सांस्कृतिक समन्वय, राष्ट्रीय एकता और ज्ञान-समृद्धि की नई दिशा दे सकता है। भारतीय भाषाओं को सम्मान देना दरअसल भारत की आत्मा को सम्मान देना है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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