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मैं ताड़ी…. मादक नहीं स्वास्थ्यवर्द्धक  हूँ

    – सुरेश सिंह बैस शाश्वत

ताड़ी (पाम‌ वाईन) एक वानस्पतिक पेय है, जो ताड़ की विभिन्न प्रजाति के वृक्षों के रस से बनती है। तथा ताड़ी अप्रैल माह से जुलाई माह तक ताड़ के पेड़ के फल से निकलता है। ताड़ी उत्तर प्रदेश, झारखण्ड एवं बिहार जो कि भारत के राज्य हैं एवं नदी समुन्द्र के तटवर्ती इलाको में अधिकतर पाया जाता है। जहां तक मेरी नॉलेज में है छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में ताड़ी को ही सल्फी कहा जाता है। ताड़ी में अल्कोहल की मात्रा लगभग 8.1% है और इसे प्राकृतिक अल्कोहल और केरल में एक स्वास्थ्यवर्द्धक पेय माना जाता है। ताड़ के पेड़ों पर चढ़ने का यह कृषि कार्य समाज के एक विशेष संप्रदाय द्वारा किया जाता है। उन्हें एझावा या थिय्या कहा जाता है और केरल एवं‌ तमिलनाडु की लगभग 40% आबादी ऐसी है जो पीढ़ियों से यह कार्य करती आ रही है। ज्ञातव्य है कि ताड़ का वृक्ष लम्बे समय में तैयार होता है। ताड़ के बीज बोने और उसके पेड़ बनने से लेकर उससे ताड़ी प्राप्ति की अवस्था तक की प्रक्रिया में लगभग पचीस-तीस साल का समय लग जाता है। ताड़ी के पेड़ बीस से तीस फीट तक ऊँचे होते हैं और उस पर मटकी व अन्य बर्तन टाँग दिया जाता है। जिसमें ताड़ी रिसती रहती है। पेड के जिस स्थान से ताड़ी रिसती है वहाँ प्रतिदिन हत्थे से घिसाई करना पड़ती है, ताकि रिसने की गति कम न हो। उल्लेखनीय है कि सुबह के समय पेड़ से मिलने वाली ताड़ी मीठी एवं स्वादिष्ट होती है। इसको पीने पर नशा देरी से आता है। दोपहर में निकलने वाली ताड़ी थोड़ी कड़क और शाम के समय निकलने वाली तो अत्यंत ही नशीली रहती है। एक पेड़ से दस-बारह लोटी ताड़ी एक समय में निकल पाती है और एक लोटी की कीमत बीस से पचीस रुपए मिलती है।

सुबह निकलने वाली ताड़ी को नीरा कहते हैं, जोकि मीठे शरबत जैसी होती है। इन दिनों क्षेत्र में ताड़ी की अच्छी आवक होने लगी है। इन दिनों मुख्य रास्तों के किनारे जगह-जगह खुले में ताड़ी बिक रही है। ग्राम रंगपुरा निवासी तेरसिंह ने बताया कि वे रस्सी के सहारे ताड़ पर चढ़ते हैं और पेड़ के हत्थे के नीचे बँधी मटकियों में से ताड़ी निकालते हैं। अंचल में ताड़ी की अच्छी माँग रहती है। यहाँ ताड़ी के सीजन में बाहर से आने वाले मधुप्रेमी इसका मजा लेने से नहीं चूकते हैं। आदिवासियों के अलावा शहरी लोग भी भरपूर मात्रा में इसका सेवन करते हैं। कुछ लोगों का कहना है कि इस प्राकृतिक पेय को सीमित मात्रा में पिया जाए तो नुकसान नहीं करता, बल्कि पाचन क्रिया अच्छी रखता है। यहां पर मुझे अपने जीवन में घटी है घटना याद आ रही है जो करीब तीस साल पुरानी है। हुआ यूँ कि मुझे अपने दोस्त के घर वैवाहिक कार्यक्रम के लिए यूपी के पूर्वांचल इलाके में  एक हफ्ते के प्रवास पर गया था । इस दौरान दोस्त के छोटे भाई की शादी थी और उनके गांव से बारात अन्य गांव की ओर जाना था, लेकिन  बारात के पहले ही दिन मेरा पेट गड़बड़ हो चुका था।  लगातार तेल मसालेदार खाने के कारण हाजमा पूरी तरह बिगड़ गया। न भूख लग रही थी ना कुछ भी खाने का मन हो रहा था। कोई अगर पूछे खाने के लिए तो गुस्सा आने लग गया था। मैंने जब इस बात का रोना रोया तो मेरे दोस्त के ही एक रिश्तेदार ने कहा कि मैं आपकी समस्या का समाधान एक घंटे के अंदर हल कर सकता हूँ। जैसे हीं उसने यह कहा मैं तुरंत राजी हो गया और मैने कहा जो भी हो मेरा हाजमा ठीक कर दोगे…?तब उसने कहा चुटकियों में कर सकता हूँ।

मैं तुरंत ही इसके लिए तैयार हो गया उसने तत्काल मुझे मोटरसाइकिल में बैठाया और ले गया  उबड़खाबड़ रास्तों से होते हुए एक हरे भरे बाड़ी के बीच जहाँ मैंने देखा एक आदमी मटके मे कोई हल्का सफेद रंग का पेय पदार्थ रखा हुआ था। तो साहब दोस्त के रिश्तेदार ने उनसे एक गिलास मांगा और मुझे पीने के लिए दिया और कहा पी जाओ । मै परेशान…आव देखा न ताव, सारा गिलास खाली कर दिया। मैंने पाया कि इसका स्वाद चरपरा, खट्टा मीठा सा था। वास्तव में पीने के बाद ऐसा चमत्कार हुआ कि मेरा पेट घंटे डेढ़ घंटे में एकदम ठीक हो गया और मुझे खूब भूख लगने लगी । तो साहब मैंने उनसे पूछा यह क्या पदार्थ था तो उन्होंने हंसते हुए बताया यह और कुछ नहीं यह तो ताड़ी था। ताड़ी व्यवसाय से जुड़े लोग इन दिनों अलसुबह ही अपनी मोटरसाइकल पर केन बाँधकर दूर-दूर तक ताड़ी लेने के लिए निकल पड़ते हैं। एक मोटरसाइकल सवार अमूमन 100-125 लीटर ताड़ी प्रतिदिन लाकर विभिन्न बाजारों में बेच देता है। ग्रामीण क्षेत्र से लाकर बाजार में वह करीब चालीस पचास प्रतिशत अधिक भाव से बेचता है। मोटे अनुमान के अनुसार क्षेत्र में इन दिनों रोजाना हजारों रुपए का ताड़ी का व्यवसाय हो रहा है। पैकेज्ड पेय पदार्थों से पहले, प्रकृति से प्राप्त समान पेय पदार्थ, लंबे समय से देश भर के समुदायों और जनजातियों द्वारा पसंद किए जाते रहे हैं। उनमें से एक है ताड़ी, ताड़ के पेड़ के रस से निकाला गया एक पेय पदार्थ है जो मादक नहीं स्वास्थ्य वर्धक होता है।

हालांकि लोग इसे नशा करने के लिए भी पीते हैं। अधिक मात्रा में पीने से यह नशा भी करता है। उत्तर प्रदेश,महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा से लगे पश्चिमी मध्य प्रदेश के जनजाति बहुल क्षेत्रों में ताड़ के पेड़ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। आमतौर पर भील, भिलाला और पाटलिया जनजातियों के लोग इन ताड़ी के पेड़ों को अपने खेतों की मेड़ों पर उगाते हैं। इस क्षेत्र में एक लोकप्रिय कहावत है, ‘बाप ताड़ का पेड़ बोये और बेटा ताड़ी निकलके बेचे’ (पिता ताड़ का पेड़ बोता है और बेटा उस पेड़ से ताड़ी बेचता है)। एक पेड़ बीस-पचीस साल बाद ही इतना परिपक्व हो जाता है कि ताड़ी पैदा कर सके, और इन पेड़ों पर चढ़ने के लिए अभ्यास कौशल की आवश्यकता होती है; अधिकांश तीन मंजिला इमारतों जितने ऊंचे होते हैं। पीढ़ियों से, भील पिता अपने बेटों को यह जोखिम भरी लेकिन फायदेमंद तकनीक सिखाते रहे हैं, जिसमें पेड़ पर चढ़ते समय उनकी सहायता के लिए पैरों या कमर के चारों ओर एक मजबूत चमड़े की पट्टी का उपयोग किया जाता है। लोग ताड़ के पेड़ों पर ताड़ के खट्टे-मीठे, झागदार रस इकट्ठा करते हैं, जिसका वे बाद में उसी पेड़ की छाया में आनंद लेते हैं। सागौन, आम और महुआ के जंगलों से घिरे इन खेतों में, एक गिलास ताड़ी, एक मुट्ठी आग में भुने हुए हरे चने और कुछ मसालेदार सेव के साथ पीना – दिन की शुरुआत करने के लिए या रात को समाप्त करने के लिए बस इतना ही चाहिए। यहां ताड़ी आमतौर पर दो किस्मों में उपलब्ध होता है वंझ्या और फालन्या। वंझ्या जनवरी और फरवरी तक उपलब्ध रहता है, स्वाद के लिए आसान होता है और किण्वन के बाद इसमें अल्कोहल की मात्रा अधिक होती है। दूसरी ओर, फालन्या मार्च से मई तक उपलब्ध रहता है। निष्कर्षण प्रक्रिया, निश्चित रूप से, स्थानीय और सांस्कृतिक अनुकूलन को समायोजित करते हुए, देश भर में पाम वाइन के दोहन के समान है। ताड़ी टपर पेड़ के मुकुट को छीलता है और उसमें एक मिट्टी का बर्तन जोड़ता है – जिसे कुपलिया, वेरिया और कठोलिया सहित कई नामों से जाना जाता है। ताड़ी बाहर निकलती है और रात भर में एकत्र की जाती है। फिर सुबह होने से पहले पूरा बर्तन हटा दिया जाता है।

सुबह से पहले संग्रहण के बाद, ताड़ी को सूरज की रोशनी से दूर रखा जाना चाहिए; पेय में ग्लूकोज की मात्रा अधिक होती है और अगर इसे खुला छोड़ दिया जाए तो यह मधु मक्खियों को आकर्षित करता है। पेय का सेवन ऊर्जा और प्रतिरक्षा बूस्टर, पाचन में सहायता और अक्सर भूख को दबाने के रूप में किया जाता है, क्योंकि यह पेट को लंबे समय तक भरा और ठंडा रखता है। यह पर्याप्त मात्रा में सुक्रोज, प्रोटीन, एस्कॉर्बिक एसिड, अमीनो एसिड, विटामिन और फाइबर से भरपूर है। स्थानीय लोग सभी प्रकार की बीमारियों के घरेलू उपचार के रूप में ताड़ी पर भरोसा करते हैं। ताड़ी पीने के फायदे हैं वजन बढ़ाने में सहायक 2. ताड़ी के लाभ करें कब्ज को दूर 3. ताड़ी है पेट दर्द में लाभकारी 4. ताड़ी पीने के लाभ दिलाएं बुखार से राहत 5. ताड़ी के फायदे बनाएं हड्डियों को मजबूत 6. ताड़ी का उपयोग बढ़ाएं आँखों की रोशनी .7 ताड़ी हृदय के लिए लाभप्रद 8. ताड़ी के गुण बचाएं कैंसर 9. ताड़ी त्वचा के लिए बहुत ही लाभदायक होती है। 

   – सुरेश सिंह बैस शाश्वत

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