बांट रहे समाज को

आसमान में नीर बहुत है। 
खेत-बाग में पीर बहुत है।।

संकट सहे हमेशा हंसकर।
माताओं में धीर बहुत है।।

बांट रहे वे नित समाज को।
तरकश में कटु तीर बहुत हैं।।

झूमते द्वार-गली दुशासन।
बढ़े नहीं अब चीर बहुत है।।

जल जंगल जन जमीं जानवर।
जीवन हित तकदीर बहुत है।।

गंगा यमुना मैली-मैली।
मिले स्वच्छता वीर बहुत हैं।।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय
शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »