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रेलगाड़ी ने मानव जीवन में रफ्तार को शामिल किया

-16 अप्रैल रेलवे स्थापना दिवस पर विशेष-

जब रेलगाड़ी का अविस्कार नहीं हुआ था, उसके पूर्व तक सिर्फ बैलगाड़ी टमटम, टांगे, बग्गी, एक्का और रिक्शा सायकल ही आने जाने के लिये मुख्य साधन थे। विशिष्ट और धनी वर्गों में मोटर गाड़ी का भी प्रचलन था पर अधिसंख्य सर्व साधारण वर्ग के लिये ये वाहन उनकी पहुंच से बाहर ही थे। रेलगाड़ी के आविर्भाव ने ही आम मनुष्य को तेज रफ्तार और भागती जिन्दगी का उपहार दिया। रेलगाड़ी के आने से सामान्य जन जीवन में क्रांति सी आ गई मनुष्य के जीवन का ऐसा कोई भी पक्ष नहीं हैं जिससे रेलगाड़ी ने प्रभावित न किया हो। जहां इसके पहले मनुष्य को कहीं आने जाने के लिए कई दिन, और तो और महिनों लग जाते थे, वहीं रेलगाड़ी जैसे वाहन के आने से सामान्य आवागमन में बहुत तेजी आ गई दिन और महिने के सफर घण्टों और मिनटों में तय होने लगे।

यह रेलगाड़ी की ही तो करामात है कि आज टनों भारी और आवश्यक समान शीघ्र ही आवश्यकतानुसार स्थान पर पहुंचा दिये जाते हैं। उद्योग व्यापार को भी रेलगाड़ी ने ही फलने फूलने  के बेहतर अवसर प्रदान किये हैं। रेलगाड़ी  जैसी महानतम अविष्कार को मूर्तरुप में इंग्लैंड के एक वैज्ञानिक जार्ज स्टीफन (जेम्सवॉट) ने 18 वीं सदी में किया था। एक प्रयोग के दौरान उन्होंने जब भाप के रेल दबाव की शक्ति को देखा तभी उनके दिमाग में बिजली सी कौंध गयी थी।तब उन्होंने भाप कीअपरिमित शक्ति को उसी दिन पहचान लिया। और बस उसी दिन  से वे रेलगाड़ी के अविस्कार के युगांतकारी प्रयास में लग गये, और अंततः उनका भागीरथी प्रयास  एक दिन रंग लाया । जब उन्होंने कुछ दूर तक सफलतापूर्वक रेलगाड़ी जो भाप से चलती थी, उसको सार्वजनिक रूप से चलाकर दिखाया। तब इसे स्टीम इंजन से चलाया गया था।

प्रारंभिक काल में रेल के इंजन में कई खामियां थी, जिसे धीरे धीरे दूर कर लिया गया। आज अत्याधुनिक दौरे में पांच सौ किलोमीटर से भी ज्यादा रफ्तार में रेलें दौड़ रही हैं। भाप का कोयले के द्वारा चलने वाला रेल इंजन तो अब संग्रहालय में रखने की चीज हो गई हैं। वे अब दिखाई ही नहीं देते अब तो डीजल और इलेक्ट्रानिक शक्ति से चलित शक्तिशाली रेल इंजनें दुनिया भर में दौड़ रही है। भारतीय रेल का इतिहास 16 अप्रैल सन 1853 से प्रारंभ होता है। देश में पहली रेल 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बौरी बंदर स्टेशन से जो कि अब छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के नाम से से है, और थाने के बीच चलाई गई थी। इस ट्रेन में लगभग 400 यात्रियों ने उसे समय सफर किया था। पहली ट्रेन ने लगभग 34 किलोमीटर लंबे रेलखंड पर सफर तय किया था। भारत में उस समय ट्रेन की शुरुआत देश के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उस ट्रेन में कुल 14 बोगी लगे हुए थे, जिसमें तीन शामिल बोगी का नाम सिंध, मुल्तान और साहिब रखे गए थे ।

इस सफर को तय करने में कुल 1 घंटे 15 मिनट लगे थे। इस ट्रेन का निर्माण मध्य रेलवे के ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे ने किया था । यह तो था भारत में रेल के शुरुआत की कहानी। अब तो रेलवे इतना आगे बढ़ गया है कि जर्मनी, फ्रांस और जापान में तो स्पर्धा सी चल रही है कि किस देश में सबसे तेज रेलगाड़ी (ट्रेन) चले। भारत में भी काफी तेज रेलगाड़ियां हो गई है। सारे देश में रेलवे लाइनों का जाल सा बिछ गया है। जो देश की तरक्की की निशानियां हैं। भारत के लिये ये ट्रेनें एक प्रकार से आधुनिक कामधेनु है जो देश की संपन्नता को बढ़ाने में उत्तरोत्तर सहायक सिद्ध हो रही हैं। जेम्सवाट ने जब इसकी कल्पना की होगी तो उसने  उस वक्त इसके चमत्कारिक और क्रांतिकारी उपयोगिता की कल्पना भी न की होगी। ठीक उसी प्रकार जार्ज स्टीफन जब सन् 1825 में दुनिया के सबसे पहले रेल को जब जन्म (अविष्कार) दे रहा होगा तो उसे भी पता नहीं रहा होगा कि उसके हाथों से भविष्य में दुनिया का कायापलट होने जा रहा है।

 स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात रेलवे में ज्यादा ध्यान दिया गया। भारत में ही एशिया का सबसे बड़ा रेलइंजन बनाने का कारखाना चितरंजन में स्थापित है। वहीं डीजल इंजन बनाने का एक वृहद कारखाना बनारस में स्थापित है जिसे डीजल लोकोमोविट वर्कशाप के नाम से जाना जाता है। यह यात्री डिब्बे बनाने एवं मरम्मत के मुख्य केन्द्र स्थान हैं। सन् 1925 में हमारे देश में पहली बार बिजली से चलने वाली रेलगाड़ियां शुरु हुई। पहले पहल ये सीमित स्थानों में ही चलती रही फिर धीरे धीरे वे सारे देश में चलने लगी। अभी भी कई स्थानों में बिजली से चलने वाली ट्रेनों को चलाने का प्रबंध किया जा रहा है। भारत की सबसे तेज चलने वाली रेलगाड़ी वंदे भारत है जिसकी गति 140- 150 किलोमीटर प्रतिघंटा है। रेलवे के  प्रशासन एवं संपूर्ण नियंत्रण का दायित्व बीस रेलवे जोन पर है, जो दिल्ली सहित मुख्य नगरों से  संचालित होती है। भारतीय रेलवे के खाते में दो महानतम उपलब्धि दर्ज है। पहला ये सारी  दुनिया के रेलवे नक्शे में सबसे बड़े रेलवे  के रुप में एवं दूसरा भारतीय रेलवे से तकरीबन चालीस लाख लोगों को रोजगार – प्राप्त होता है। (नोट: अधिसंख्य लोगों के रोजगार में रहने के कारण भारतीय रेल देश का सबसे बड़ा उद्योग कहलाता है। )

भारतीय रेल बीस क्षेत्रों में बंटी हुई है। जिसमें से एक बिलासपुर रेलवे जोन क्षेत्र है। बिलासपुर रेलवे जोन देश का  अठारहवाँ रेलवे जोन है भारतीय रेल के विभिन्न गेजों में ब्राड गेज (बड़ी लाइन) नैरो गेज (छोटी लाईन) एवं मीटर गेज हैं। मीटर गेज के इंजन टेल्को द्वारा जमदेशपुर में बनाये जाते हैं। कपूरथला नगर एवं रायबरेली में रेल डिब्बे बनाने का कारखाना लगाया गया है। चितरंजन स्थित लोकोमोटिव कारखाने में भाप के इंजन 2351 बनाने के बाद सन् 1971 से विद्युत चलित तथा डीजल इंजने बनने लगे हैं । वाराणसी के कारखाने में मार्च 1986 क 2089 डीजल इंजनों का निर्माण पूरा हो चुका था। भारतीय रेलवे द्वारा 1986 तक 16637 सवारी गाड़ी के डिब्बे बनाने की क्षमता थी, जो आज काफी बढ़ चुकी है । भारतीय रेलवे से भारत की अर्थव्यवस्था को संतुलित रखने में करहद्र तक क्षमता है। आगे भी वे हमारे भाग्य को चमकाने के लिए निरंतर दौडती भागती रहेंगी,भागती ही रहेंगी…बस भागती रहेंगी।

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