अक्षय तृतीया 30 अप्रैल, 2025 पर विशेष
अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। अक्षय शब्द का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। संस्कृत में, अक्षय शब्द का अर्थ है ‘समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता’, जबकि तृतीया का अर्थ है ‘चंद्रमा का तीसरा चरण’। इस त्यौहार के साथ-साथ एक अबूझा मांगलिक एवं शुभ दिन भी है, जब बिना किसी मुहूर्त के विवाह एवं मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक एवं मांगलिक ढांचांे में ढले अक्षय तृतीया पर्व में हिन्दू-जैन धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं का अनूठा संगम है। इस प्रकार अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों जैसे जप-तप, यज्ञ, पितृ-तर्पण, दान-पुण्य आदि का साधक को अक्षय फल प्राप्त होता है। भगवान आदिनाथ ने ही सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था, इसलिए इस दिन पर जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान करते हैं। रास्ते चाहे कितने ही भिन्न हों पर इस पर्व त्यौहार के प्रति सभी जाति, वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय और धर्मों का आदर-भाव अभिन्नता में एकता का प्रिय संदेश दे रहा है। आज के युद्ध, आतंक, आर्थिक प्रतिस्पर्धा एवं अशांति के समय में संयम एवं तप की अक्षय परम्परा को जन-जन की जीवनशैली बनाने की जरूरत है।

अक्षय तृतीया इस वर्ष 30 अप्रैल, 2025 को है। भगवान परशुराम का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था, इसलिये भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम का जन्मदिन मानते हैं। वैष्णव मंदिरों में उनकी पूजा की जाती है। महर्षि वेदव्यास ने इसी दिन से महाभारत लिखना शुरू किया था। अक्षय तृतीया के दिन महाभारत के युधिष्ठिर को अक्षय पात्र मिला था। इसकी विशेषता थी कि इसमें भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। इसी पात्र से वह अपने राज्य के गरीब व निर्धन को भोजन देकर उनकी सहायता करते थे। इसी आधार पर मान्यता है कि इस दिन किए जाने वाला दान-पुण्य का भी कभी क्षय नहीं होता है। इस दिन साधु-संतों के साथ ब्राह्मणों-गरीबों को भोजन कराकर व वस्त्र दान करने के साथ गायों को हरा चारा खिलाने का विशेष महत्व है। वहीं पक्षियों को परिंडे लगाकर दाने-पानी की व्यवस्था करने से विशेष लाभ मिलता है और भगवान श्री विष्णु की कृपा अपने भक्तों पर हमेशा बनी रहती है।

अक्षय तृतीया विवाहित या अविवाहित महिलाओं के लिए क्षेत्रीय रूप से महत्वपूर्ण है, जो अपने जीवन में पुरुषों की भलाई के लिए या भविष्य में उनकी सगाई होने वाले पुरुष के लिए प्रार्थना करती हैं। प्रार्थना के बाद, वे अंकुरित चने (अंकुरित), ताजे फल और भारतीय मिठाइयां वितरित करते हैं। यह दिन किसानों, कुंभकारों एवं शिल्पकारों के लिए भी यह बहुत महत्व का दिन है। बैलों के लिए भी बड़े महत्व का दिन है। प्राचीन समय से यह परम्परा रही है कि आज के दिन राजा अपने देश के विशिष्ट किसानांे को राज दरबार में आमंत्रित करता था और उन्हें अगले वर्ष बुवाई के लिए विशेष प्रकार के बीज उपहार में देता था। लोगों में यह धारणा प्रचलित थी कि उन बीजों की बुवाई करने वाले किसान के धान्य-कोष्ठक कभी खाली नहीं रहते। यह इसका लौकिक दृष्टिकोण है। अक्षय तृतीया पर महाराष्ट्र के लोग नया व्यवसाय शुरू करते हैं, घर खरीदते हैं और महिलाएं सोना खरीदती हैं। लोग इस त्यौहार को परिवार के साथ मनाते हैं और महाराष्ट्रीयन पूरन पोली (गुड़ और दाल के मिश्रण से भरी चपाती) और आमरस (आम की एक मोटी प्यूरी) से बने नैवेद्य जैसे भोजन का भोग लगाकर देवी-देवताओं की पूजा करते हैं।

