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घटती कृषि भूमि और बढ़ती कालोनियां

भविष्य की खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट

देश में विकास और शहरीकरण की रफ्तार तेज़ी से बढ़ रही है। शहरों के साथ-साथ कस्बों और गांवों तक आबादी का विस्तार हो रहा है। नई-नई कालोनियों का निर्माण आज हर क्षेत्र में सामान्य दृश्य बन चुका है। पहली दृष्टि में यह विकास का संकेत प्रतीत होता है, किंतु इसके पीछे एक गंभीर समस्या भी उभर रही है कृषि भूमि और हरियाली का लगातार घटता दायरा।

आज अनेक स्थानों पर उपजाऊ कृषि भूमि को आबादी क्षेत्र घोषित कर कालोनियाँ विकसित करने की होड़ लगी हुई है। भूमि के बढ़ते दामों ने कई लोगों को खेती से अधिक लाभ भूमि के व्यापार में दिखाई देने लगा है। परिणामस्वरूप खेत-खलिहान सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी जगह प्लॉटिंग तथा मकानों का विस्तार तेजी से बढ़ रहा है।

इस स्थिति का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि इन कालोनियों में से बड़ी संख्या अवैध रूप से विकसित हो रही है। कई स्थानों पर न तो इनका मानचित्र स्वीकृत होता है और न ही बुनियादी सुविधाओं की कोई सुविचारित योजना होती है। ऐसी अव्यवस्थित कालोनियाँ भविष्य में सड़क, जल निकासी, पेयजल और स्वच्छता जैसी समस्याओं को जन्म देती हैं, जिसका बोझ अंततः प्रशासन और समाज दोनों को उठाना पड़ता है।

यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र का लगातार संकुचन होगा। इसका सीधा प्रभाव खाद्यान्न उत्पादन पर पड़ेगा। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यदि खेती की भूमि कम होती जाएगी तो भविष्य में खाद्य सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बन सकती है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करना तब कठिन हो जाएगा।

इसके साथ-साथ पर्यावरणीय असंतुलन का खतरा भी बढ़ेगा। खेतों और हरियाली के स्थान पर कंक्रीट के विस्तार से तापमान में वृद्धि, भूजल स्तर में गिरावट और प्राकृतिक संतुलन में बाधा जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं।

इस गंभीर विषय पर सरकार और समाज दोनों को संवेदनशीलता के साथ विचार करने की आवश्यकता है। अवैध कालोनियों पर प्रभावी नियंत्रण, भूमि उपयोग के नियमों का कठोर पालन और सुव्यवस्थित शहरी नियोजन आज समय की मांग है। साथ ही ऐसी नीतियाँ बनाई जानी चाहिए जिनसे किसानों को खेती में ही स्थिर और सम्मानजनक आय प्राप्त हो, ताकि वे अपनी भूमि बेचने के लिए विवश न हों।

समाज को भी यह समझना होगा कि कृषि भूमि केवल आर्थिक संसाधन नहीं है, बल्कि वह देश की अन्न सुरक्षा और पर्यावरण संतुलन की आधारशिला है। यदि आज हम इसके संरक्षण के प्रति सजग नहीं होंगे तो भविष्य में इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं।

विकास आवश्यक है, किंतु विकास का मार्ग ऐसा होना चाहिए जिसमें कृषि भूमि, पर्यावरण और भविष्य की आवश्यकताओं का संतुलन बना रहे। यही दूरदर्शी सोच आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भविष्य सुनिश्चित कर सकती है।

डा. पंकज भारद्वाज 
डा. पंकज भारद्वाज 
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