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न्याय होता हुआ दिखेः तारीख़ पर तारीख़ की संस्कृति बदले

देश के सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने 75 वर्ष का गरिमामय सफर पूरा किया है। यह केवल एक ऐतिहासिक पड़ाव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को परखने का अवसर भी है। न्यायपालिका ने इन आठ दशकों में अनेक युगांतरकारी फैसले दिये, जिन्होंने संविधान की मर्यादा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की। किंतु आज सबसे बड़ी चुनौती न्याय में विलंब की है। समय पर न्याय न मिले तो न्याय का वास्तविक अर्थ ही खो जाता है। शायद यही कारण है कि न्यायिक बिरादरी के आयोजनों में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य न्यायाधीशों ने एक स्वर से कहा कि अब ‘तारीख़ पर तारीख़’ की संस्कृति को समाप्त करने का समय आ गया है। जिला न्यायपालिका के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिये अदालतों में स्थगन की संस्कृति को बदलने के प्रयास करने की सख्त जरूरत है।

उन्होंने स्वीकारा कि अदालतों में बड़ी संख्या में लंबित मामलों का होना हम सभी के लिये बड़ी चुनौती है। सुप्रीम कोर्ट के 75 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि ये केवल एक संस्था की यात्रा नहीं है। ये यात्रा है भारत के संविधान और संवैधानिक मूल्यों की। ये यात्रा है एक लोकतंत्र के रूप में भारत के और परिपक्व होने की। भारत के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट पर, हमारी न्यायपालिका पर विश्वास किया है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के ये 75 वर्ष ‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’ के रूप में भारत के गौरव को और बढ़ाते हैं। आजादी के अमृतकाल में 140 करोड़ देशवासियों का एक ही सपना है विकसित भारत, नया भारत बनने का। नया भारत, यानी सोच और संकल्प से एक आधुनिक भारत।

हमारी न्यायपालिका इस विजन का एक मजबूत स्तम्भ है। भारत में लोकतंत्र और उदारवादी मूल्यों को मज़बूत करने में न्यायपालिका ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। संविधान का रखवाला, ग़रीबों के अधिकार एवं सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ़ कमज़ोर समूहों का योग्य संरक्षक और करोड़ों नागरिकों के लिए आखरी उम्मीद वाला संस्थान है सुप्रीम कोर्ट। कुछ अपवादों को छोड़कर पिछले 75 वर्षों में ज्यादातर समय भारतीय न्यायपालिका संविधान की रक्षा और क़ानून के शासन को बनाए रखने में सफल रही है। लेकिन भारतीय कानून व्यवस्था के सामने अनेक जटिल स्थितियां भी हैं, न्यायाधीशों की नियुक्ति, बढ़ते केसों की संख्या, जवाबदेही, भ्रष्टाचार एवं विलम्बित न्याय आदि। न्याय को लेकर अदालतों तक आम नागरिकों की पहुंच एवं खर्च के मुद्दों और इसी तरह की दूसरी चीज़ों के मामले में सुधार के बारे में न्यायपालिका की अपनी महत्वपूर्ण चिंताएं हैं। हमारे कानूनों की भावना है-नागरिक पहले, सम्मान पहले और न्याय पहले है।

इससे पहले जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में त्वरित न्याय की आवश्यकता पर बल दिया था ताकि महिलाओं में अपनी सुरक्षा को लेकर भरोसा बढ़ सके। निस्संदेह, हाल के वर्षों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे हमारे समाजशास्त्री और कानून लागू करवाने वाली विभिन्न एजेंसियां भी हैरान-परेशान हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराधों बढ़ोतरी से पूरा समाज हिला हुआ है। कोलकाता मेडिकल कॉलेज की महिला डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या की घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि अपराधियों के मन से कानून का भय लगभग समाप्त हो चुका है। यही कारण है कि अब न केवल कठोर कानून बल्कि त्वरित और निष्पक्ष न्याय की मांग बलवती हो रही है। आज न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती है-न्याय में विलंब। जिला अदालतों से लेकर उच्चतम न्यायालय तक करोड़ों मामले लंबित हैं। केवल जिला अदालतों में ही साढ़े चार करोड़ से अधिक मामले अटके पड़े हैं। यह स्थिति लोकतंत्र की आत्मा को आहत करती है, क्योंकि न्याय में विलंब, न्याय के इनकार के समान है।

दरअसल, लंबित मामलों के पीछे कई कारण हैं-न्यायाधीशों की अपर्याप्त संख्या, अदालती प्रक्रियाओं की जटिलता, अनावश्यक स्थगन, वकीलों द्वारा मुकदमों को खींचना और पुलिस-प्रशासन की लापरवाही। यही वजह है कि अपराधियों के मन से कानून का भय कम होता जा रहा है और आम नागरिक का भरोसा डगमगाने लगता है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ जिला एवं स्थानीय अदालतें हैं। यदि इन स्तरों पर शीघ्र और सस्ता न्याय नहीं मिलेगा, तो सुप्रीम कोर्ट की उपलब्धियां अधूरी मानी जाएंगी। सर्वाेच्च न्यायालय समय-समय पर स्वतः संज्ञान लेकर राहत देता रहा है-जैसे हाल ही में डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए राष्ट्रीय प्रोटोकॉल बनवाने की पहल। किंतु जिला स्तर पर ऐसी सजगता और सक्रियता नहीं दिखाई देती। इसलिए सुधार की असली शुरुआत निचले स्तर से ही करनी होगी।

भारतीय न्याय प्रणाली की विसंगतियां और सुधार की राह जटिल है, लेकिन असंभव नहीं है। दृढ़ संकल्प एवं कार्ययोजना के साथ आगे बढ़े तो आजादी के अमृतकाल में हम न्याय प्रणाली को युगांतरकारी मोड़ दे सकते हैं। देश में जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या बहुत कम है। तत्काल नियुक्तियों और प्रशिक्षण की व्यवस्था होनी चाहिए। ई-कोर्ट, ऑनलाइन सुनवाई, डिजिटल साक्ष्य प्रबंधन जैसे कदम न्याय प्रक्रिया को गति दे सकते हैं। अनावश्यक स्थगन पर अंकुश जरूरी है। क्योंकि स्थगन देने की परंपरा अपराधियों और वकीलों के लिये हथियार बन चुकी है। इस पर कड़ा नियंत्रण जरूरी है। पुलिस व जांच एजेंसियों को दायित्वशील एवं जिम्मेदार बनाना होगा। क्योंकि पुख्ता सबूतों और चार्जशीट समय पर दाखिल करने से ही मामलों में शीघ्र निर्णय संभव है। अदालतों के साथ-साथ वकीलों और पुलिस पर भी जवाबदेही तय करनी होगी। महिलाओं, बच्चों और संवेदनशील मामलों के लिये विशेष फास्ट-ट्रैक अदालतों को और मजबूती देनी होगी।

न्यायिक प्रकिया से जुड़े कामकाज की समीक्षा होनी जरूरी है। वहीं दूसरी ओर विभिन्न मुख्य न्यायाधीशों ने बार-बार निचली अदालतों में न्यायाधीशों की कमी का मुद्दा भी उठाया है। जाहिरा तौर पर संसाधनों की कमी भी न्यायिक प्रक्रिया की गति को प्रभावित करती है। कुछ लोग मानते हैं कि सख्त कानून के साथ ही त्वरित न्याय भी अपराधियों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बना पाएगा। यदि पुलिस व जांच एजेंसियां पुख्ता सबूतों के साथ अदालत में पहुंचें तो गंभीर मामलों में आरोप जल्दी सिद्ध हो सकेंगे। यही वजह है कि देश में शीर्ष स्तर पर भी यह धारणा बलवती हो रही है कि विभिन्न हितधारक सामूहिक जिम्मेदारी निभाएं, जिससे उस धारणा को तोड़ा जा सकता है कि न्याय देने वाली प्रणाली तारीख पर तारीख की संस्कृति को बढ़ावा देती है। विश्वास किया जाना चाहिए कि सर्वाेच्च न्यायालय की स्थापना के 75 वर्ष होने पर शीर्ष न्यायिक नेतृत्व लंबित मामलों के निपटारे के लिये नई प्रभावी रणनीति बनाएगा।

निस्संदेह, भारतीय न्यायिक व्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली जिला अदालतें भी इस दिशा में बदलावकारी पहल कर सकती हैं। जिससे आम आदमी का न्यायिक व्यवस्था में भरोसा और मजबूत हो सकेगा। अमेरिका जैसे देशों में किसी भी मामले के लिए अधिकतम अवधि तीन वर्ष तय है, जबकि भारत में 20-30 वर्षों तक मुकदमे चलते रहना आम बात है। इस विसंगति को दूर करने के लिए नियत अवधि और अधिकतम तारीखों की सीमा तय की जानी चाहिए। हाल ही में लागू हुए तीन नए आपराधिक कानूनों से न्यायिक प्रक्रिया में तेजी की उम्मीद है। यदि इन कानूनों का सही क्रियान्वयन हो, तो ‘तारीख पर तारीख’ की संस्कृति पर अंकुश लग सकता है।

सर्वाेच्च न्यायालय का 75 वर्ष का यह सफर लोकतंत्र के इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय है। इस अवधि में आपातकाल जैसे संकटों से लेकर सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, महिलाओं के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तक अनेक क्षेत्रों में इसने ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं। किंतु आने वाले 25 वर्षों में न्यायपालिका की असली परीक्षा इस बात पर होगी कि वह न्याय को त्वरित, सुलभ और सर्वसुलभ बना पाती है या नहीं? न्यायपालिका आज भी आम नागरिक के लिये अंतिम आशा की किरण है। परंतु इस भरोसे को जीवित रखने के लिए उसे अपनी कमजोरियों को दूर कर एक नए युग की शुरुआत करनी होगी-जहाँ न्याय केवल “होता हुआ” न रहे, बल्कि “दिखता हुआ” भी हो। यही सर्वाेच्च न्यायालय की 75 साल की यात्रा का वास्तविक उत्सव और सार्थक स्मरण होगा।

ललित गर्ग
ललित गर्ग
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