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धर्म-स्थलों के हादसें-आखिर कब जागेगा तंत्र?

आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में मची भगदड़ में हुई दर्दनाक मौतों ने एक बार फिर हमारे प्रशासनिक ढांचे, सरकारों की संवेदनशीलता और तंत्र की जवाबदेही पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। हर बार ऐसी त्रासदी होती है, कुछ जानें जाती हैं, कुछ परिवार उजड़ते हैं, कुछ आंसू बहते हैं- फिर वही रटंत बयान, “जांच के आदेश दे दिए गए हैं”, “दोषियों पर कार्रवाई होगी”, “पीड़ित परिवारों को मुआवजा दिया जाएगा” और फिर सब कुछ धूल में मिल जाता है। सवाल यह है कि आखिर हम कब तक इस लापरवाही, इस प्रशासनिक नींद, इस जानलेवा कोेताही और इस संवेदनहीन व्यवस्था का शिकार बने रहेंगे? किसी धार्मिक स्थल पर भगदड़ की यह पहली घटना नहीं, लेकिन अफसोस है कि पुरानी गलतियों से सबक नहीं लिया जा रहा। ऐसी त्रासद, विडम्बनापूर्ण एवं दुखद घटनाओं के लिये मन्दिर प्रशासन और सरकारी प्रशासन जिम्मेदार है, एक बार फिर भीड़ प्रबंधन की नाकामी श्रद्धालुओं के लिये मौत का मातम बनी, चीख, पुकार और दर्द का मंजर बना। इस घटना के बाद जिस तरह से बयान दिए जा रहे हैं, वह पीड़ितों के जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

धर्म-स्थलों के हादसें-आखिर कब जागेगा तंत्र?

धार्मिक स्थल आस्था के केंद्र होते हैं, ऊर्जा के केन्द्र होते हैं, जहां लोग शांति और श्रद्धा पाने आते हैं, लेकिन यह कैसी विडंबना है कि इन पवित्र स्थलों पर भी लोगों को असमय मृत्यु का सामना करना पड़ता है। श्रीकाकुलम में जो कुछ हुआ, वह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक प्रणालीगत विफलता है। भीड़ प्रबंधन के नाम पर प्रशासन हर बार हाथ खड़े कर देता है। न पर्याप्त बैरिकेडिंग, न एंट्री-एग्जिट का संतुलन, न भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त पुलिसबल या वॉलंटियर, न मेडिकल सहायता का इंतजाम। मन्दिरों, त्योहारों और विशेष अवसरों पर श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ के बावजूद तैयारी का नामोनिशान नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है। श्रीकाकुलम में वेंकटेश्वर स्वामी का यह मंदिर कुछ महीने पहले ही खोला गया था और राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि जिले के अधिकारियों को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। हालांकि इससे यह जवाबदेही खत्म नहीं हो जाती कि एक धार्मिक स्थल पर क्षमता से कई गुना ज्यादा लोग जुटते चले गए और फिर भी स्थानीय पुलिस-प्रशासन को भनक कैसे नहीं लगी।

सरकार और मंदिर प्रबंधन की बातों से लग रहा है कि दोनों पक्ष घटना से पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। मंदिर का निर्माण ओडिशा के जिस शख्स हरि मुकुंद पांडा ने कराया है, उनका कहना है कि सीढ़ियों की रेलिंग टूटने से हादसा हुआ। लेकिन, यही वजह तो काफी नहीं। भगदड़ मचने के बाद श्रद्धालुओं को बाहर जाने का रास्ता नहीं मिल पाया, वह व्यवस्थापकों की लापरवाही का नतीजा है। मंदिर में आने-जाने का एक ही रास्ता था और जब भीड़ अनुमान से अधिक बढ़ती चली गई, तब भी पुलिस-प्रशासन को सूचित नहीं किया गया। इस पर पांडा का कहना कि इस घटना के लिए कोई जिम्मेदार नहीं, यह एक्ट ऑफ गॉड है- इक्कीसवीं सदी के वैज्ञानिक युग में इस तरह की सोच बेहद शर्मनाक है। यह उन लोगों की पीड़ा का मजाक उड़ाने जैसा है, जिन्होंने अपनों को खोया। यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि हाल के वर्षों में दुनिया भर में सामने आई ऐसी घटनाओं की कड़ी का नया खौफनाक मामला है, जहां भीड़ नियंत्रण में चूक एवं प्रशासन एवं सत्ता का जनता के प्रति उदासीनता का गंभीर परिणाम एवं त्रासदी का ज्वलंत उदाहरण है।

श्रीकाकुलम के मातम, हाहाकार एवं दर्दनाक मंजर ने सुरक्षा व्यवस्था की पोल ही नहीं खोली बल्कि सत्ता एवं धार्मिक व्यवस्थाओं के अमानवीय चेहरे को भी बेनकाब किया है। हर बार जांच, कठोर कार्रवाई करने, सबक सीखने की बातें की जाती हैं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। न तो शासन-प्रशासन कोई सबक सीख रहा है और न ही आम जनता संयम एवं अनुशासन का परिचय देने की आवश्यकता समझ रही है। भगदड़ की घटनाओं का सिलसिला कायम रहने से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की बदनामी भी होती है, क्योंकि इन घटनाओं से यही संदेश जाता है कि भारत का शासन-प्रशासन भगदड़ रोकने में पूरी तरह नाकाम है। सार्वजनिक स्थलों पर भगदड़ की घटनाएं दुनिया के अन्य देशों में भी होती है, लेकिन उतनी नहीं जितनी अपने देश में होती ही रहती हैं।

यह कोई पहली घटना नहीं है। अतीत में प्रयागराज कुंभ, अयोध्या, हरिद्वार में प्रसिद्ध मनसा देवी मंदिर, सबरीमला, वैष्णो देवी, पुलकेश्वरम, देवरी मंदिर जैसे अनेक स्थलों पर भी ऐसी भगदड़ें हो चुकी हैं। चिंता की बात यह है कि पिछले हादसों से कोई सबक सीखने को तैयार नहीं है। केवल आंध्र में ही इस साल यह तीसरी बड़ी दुर्घटना है। जनवरी में तिरुपति और अप्रैल में विशाखापत्तनम के सिम्हाचलम में भगदड़ से कई मौतें हुई थीं। पूरे देश में इस साल अभी तक भगदड़ की विभिन्न घटनाओं में 114 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हर बार सरकारें “सीख लेने” की बात करती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि सीखने की क्षमता हमारे तंत्र से जैसे गायब हो चुकी है। धार्मिक आयोजनों की भीड़ का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं होता। आज तकनीक का युग है सीसीटीवी, ड्रोन, डिजिटल टिकटिंग, भीड़-सेंसरिंग सिस्टम जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं। परंतु इनका उपयोग नहीं किया जाता क्योंकि धर्म और आस्था के नाम पर “प्रबंधन” को हमेशा भाग्य पर छोड़ दिया जाता है। जब तक कोई हादसा न हो, तब तक कोई अधिकारी मंदिर परिसर में झांकने तक नहीं आता।

और जब हादसा हो जाता है, तब “प्रेस कॉन्फ्रेंस” और “मुआवजा” की राजनीति शुरू हो जाती है। यह भी एक सामाजिक प्रश्न है कि क्या हमारी आस्था इतनी अंधी हो चुकी है कि हम सुरक्षा नियमों की अनदेखी कर देते हैं? क्या धार्मिक आयोजनों में अनुशासन और व्यवस्था का पालन करना हमारी श्रद्धा को कम कर देगा? श्रद्धा के नाम पर अराजकता, प्रशासनिक ढिलाई और अव्यवस्था का यह घातक संगम अब रुकना चाहिए। सरकारों को चाहिए कि वे भीड़ प्रबंधन को एक राष्ट्रीय नीति का हिस्सा बनाएं। हर बड़े धार्मिक स्थल पर स्थायी भीड़ नियंत्रण तंत्र विकसित किया जाए, जिसमें प्रवेश और निकास मार्ग स्पष्ट हों, आपातकालीन निकास गेट हों, प्रशिक्षित स्वयंसेवक हों, मेडिकल टीम और एम्बुलेंस की व्यवस्था हो। स्थानीय प्रशासन को नियमित तौर पर सुरक्षा मॉक ड्रिल करनी चाहिए।

आखिर दुनिया के सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश में हम भीड़ प्रबंधन को लेकर इतने उदासीन क्यों है? बड़े आयोजनों-भीड़ के आयोजनों में भीड़ बाधाओं को दूर करने के लिए, भीड़ प्रबंधन के लिए बुनियादी ढांचे में सुधार, सुरक्षाकर्मियों को पर्याप्त प्रशिक्षण प्रदान करना, जन जागरूकता बढ़ाना और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना अब नितान्त आवश्यक है। आज जरूरत है केवल मुआवजे और जांच की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की। कौन अधिकारी लापरवाह था, किस विभाग ने सुरक्षा प्रोटोकॉल की अनदेखी की, और क्यों भीड़ को अनियंत्रित छोड़ा गया- इन प्रश्नों का उत्तर दिए बिना जांच बेईमानी है। श्रीकाकुलम की यह त्रासदी एक और चेतावनी है। अगर अब भी सरकारें नहीं जागीं, तो आने वाले दिनों में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी, क्योंकि धार्मिक आस्था बढ़ रही है, पर प्रबंधन की मानसिकता वही पुरानी बनी हुई है। भीड़ केवल संख्या नहीं होती, वह जीवन है, वह परिवार है, वह उम्मीद है और जब वह कुचल जाती है, तो यह केवल एक हादसा नहीं, शासन की असफलता एवं सरकारी कोताही की द्योतक है।

तमिलनाडु के करूर में तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय की रैली में हुआ हादसा हो या फिर श्रीकाकुलम की घटना – कुछ गलतियां बार-बार दोहराई जा रही हैं। हादसों के बाद सबक लेने के बजाय जिम्मेदार लोग और संस्थाएं बचने का रास्ता तलाशने लगते हैं। सरकारों को समझना होगा कि भीड़ प्रबंधन भारत जैसे देश की जरूरत है। मुआवजे की घोषणा करके मामले को हल्का किया जा सकता है, लेकिन जवाबदेही तय हो और लापरवाही पर सजा मिले। क्या यह पुकार अब भी सत्ता के कानों तक नहीं पहुंचेगी?

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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