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एआई के विवेकपूर्ण उपयोग से स्वास्थ्य सेवा में क्रांतिकारी सुधार संभव: सीआईआई फार्मा एंड लाइफ साइंसेज समिट 2025 में डॉ. जितेंद्र सिंह का संबोधन

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कॉन्फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) द्वारा आयोजित फार्मा एंड लाइफ साइंसेज समिट 2025 में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) का विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग आने वाले वर्षों में स्वास्थ्य सेवा तथा फार्मा उद्योग के लिए असाधारण वरदान सिद्ध हो सकता है।

एआई के विवेकपूर्ण उपयोग से स्वास्थ्य सेवा में क्रांतिकारी सुधार संभव: सीआईआई फार्मा एंड लाइफ साइंसेज समिट 2025 में डॉ. जितेंद्र सिंह का संबोधन

डॉ. सिंह ने रेखांकित किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत की प्रशासनिक और औद्योगिक नीतियों में एक उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। सरकार और उद्योग जगत के बीच संवाद अब केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि एक साझा दृष्टिकोण पर आधारित सहयोगात्मक मॉडल बन चुका है। उन्होंने कहा कि यह ‘समग्र सरकार–समग्र उद्योग’ दृष्टिकोण भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता को नई गति दे रहा है।

एआई: स्वास्थ्य सेवा में आवश्यकता, विकल्प नहीं

डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पष्ट कहा कि स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में एआई अब कोई वैकल्पिक साधन नहीं, बल्कि अनिवार्य तकनीक बन गया है। दवा खोज, चिकित्सा निदान, स्वास्थ्य सेवा वितरण और उपचार प्रबंधन—सभी क्षेत्रों में एआई निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

उन्होंने कहा कि एआई आधारित निदान मॉडल बीमारियों की पहचान के समय को दिनों से कम करके कुछ ही मिनटों तक ले आए हैं। इससे रोगियों को शीघ्र उपचार उपलब्ध होता है और स्वास्थ्य प्रणाली की दक्षता बढ़ती है।

टेलीमेडिसिन में एआई की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने बताया कि भारत में संचालित कई एआई-संचालित परियोजनाएँ दूरस्थ क्षेत्रों के मरीजों तक स्वास्थ्य सेवाएं उनकी स्थानीय भाषा और बोली में उपलब्ध करा रही हैं। इससे ग्रामीण और जनजातीय क्षेत्रों में चिकित्सा परामर्श का दायरा बढ़ा है और उपचार के परिणाम अधिक भरोसेमंद हुए हैं।

इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एआई को मानव-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ लागू करने की आवश्यकता है। तकनीक और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन ही भविष्य की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की सफलता तय करेगा।

जीन थेरेपी और जैव प्रौद्योगिकी में सरकारी–निजी साझेदारी का विस्तार

डॉ. सिंह ने बताया कि सरकार जीन थेरेपी, जैव प्रौद्योगिकी और वैक्सीन अनुसंधान जैसे उभरते क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के साथ सक्रिय सहयोग बढ़ा रही है।

बायोटेक्नोलॉजी विभाग (डीबीटी) द्वारा शुरू की गई कई पहलें अग्रणी निजी संस्थानों के साथ मिलकर सिंथेटिक एंटीबायोटिक्स, डीएनए और एचपीवी टीकों तथा उन्नत जैव-विनिर्माण तकनीकों के स्वदेशी विकास पर केंद्रित हैं। यह साझेदारी न केवल वैश्विक स्वास्थ्य आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद करेगी, बल्कि भारत को बायो-इनोवेशन के वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करेगी।

1 लाख करोड़ रुपये का अनुसंधान एवं विकास कोष: निजी क्षेत्र के लिए बड़ा अवसर

डॉ. सिंह ने उद्योग जगत के नेताओं से हाल ही में घोषित 1 लाख करोड़ रुपये के राष्ट्रीय अनुसंधान एवं विकास कोष का लाभ उठाने का आह्वान किया। यह कोष स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा तथा विज्ञान-प्रौद्योगिकी में अत्याधुनिक शोध परियोजनाओं को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास में पहली बार सरकार निजी उद्योगों को नवाचार के लिए प्रत्यक्ष वित्तपोषण उपलब्ध करा रही है। यह नीतिगत बदलाव भारत के अनुसंधान परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कदम है और इससे घरेलू नवाचार संस्कृति को प्रोत्साहन मिलेगा।

उपचारात्मक से निवारक स्वास्थ्य सेवाओं की ओर भारत का परिवर्तन

संबोधन में डॉ. सिंह ने भारत की स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में हो रहे व्यापक परिवर्तन को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारत अब उपचारात्मक स्वास्थ्य उत्पादों का आयातक न रहकर निवारक स्वास्थ्य तकनीकों का निर्यातक बन रहा है।

टीकों, बायोसिमिलर्स और किफायती चिकित्सा उपकरणों के क्षेत्र में भारत की वैश्विक उपस्थिति तेजी से बढ़ रही है। उच्च गुणवत्ता और किफायती समाधान प्रदान करने की क्षमता ने भारत को कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित किया है।

उद्योग जगत से सहयोग और नेतृत्व का आह्वान

अपने संबोधन के अंत में डॉ. सिंह ने उद्योग हितधारकों से आग्रह किया कि वे न केवल अपने क्षेत्रों में नेतृत्व करें, बल्कि नए सहयोगी अवसरों की पहचान कर राष्ट्रीय प्रगति में सक्रिय योगदान दें।

उन्होंने कहा कि विज्ञान, चिकित्सा और प्रौद्योगिकी अब अलग-अलग क्षेत्रों में नहीं, बल्कि एकीकृत इकोसिस्टम के रूप में विकसित हो रहे हैं। ऐसे में भारत के लिए यह आवश्यक है कि सभी हितधारक मिलकर वैश्विक स्वास्थ्य सेवा के भविष्य को आकार देने में अग्रणी भूमिका निभाएं।

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