लोकनायक, राष्ट्र-दृष्टा और भारतीयता के शिखरपुरुष

-अटल बिहारी वाजपेयी की 101वीं जन्म-जयंती-25 दिसम्बर 2025-

भारत के आधुनिक इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल सत्ता या पद से नहीं, बल्कि अपने विचार, चरित्र और आचरण से राष्ट्र की चेतना को आकार देते हैं। भारतीय राजनीति का महानायक, भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता, भारत रत्न, प्रखर कवि, वक्ता और पत्रकार अटल बिहारी वाजपेयी ऐसे ही लोकनायक थे, जो राजनीति में रहते हुए भी राजनीति से बड़े दिखाई देते थे। उनकी 101वीं जन्म-जयंती केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन और संकल्प का क्षण है कि हम किस भारत का स्वप्न देखते हैं और उसे साकार करने में हमारी भूमिका क्या है? अटलजी की जन्म जयंती 25 दिसंबर को भारत सरकार प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाती है। अटलजी भारतीय राजनीति के दुर्लभ शिखर पुरुष थे, जिनमें विचार की दृढ़ता, व्यवहार की शालीनता और निर्णय की निर्भीकता एक साथ समाहित थी। वे सत्ता के शिखर पर भी विनम्र थे और विपक्ष की पंक्ति में भी गरिमामय। यही कारण है कि उन्हें केवल एक दल का नेता नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का नेता माना गया। वे ‘अजातशत्रु’ इसलिए नहीं कहे गए कि उनके विरोधी नहीं थे, बल्कि इसलिए कि विरोध के बीच भी वे सम्मान और संवाद का सेतु बनाए रखते थे।

लोकनायक, राष्ट्र-दृष्टा और भारतीयता के शिखरपुरुष

अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति को केवल सत्ता-प्राप्ति का साधन नहीं माना, बल्कि उसे राष्ट्र-निर्माण की साधना बनाया। जब राजनीति अवसरवाद, कटुता और अविश्वास की गिरफ्त में थी, तब अटलजी ने उसे मूल्यों, मर्यादा और संवैधानिक आस्था से जोड़े रखा। वे सत्ता में रहते हुए भी लोकतंत्र के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध थे, जितने विपक्ष में रहते हुए। अटलजी ने प्रखर राजनेता, अजातशत्रु, विचारक एवं समाज सुधारक एवं राष्ट्र-निर्माता के रूप में न केवल देश के लोगों का दिल जीता है, बल्कि विरोधियों के दिल में भी जगह बनाकर, अमिट यादों को जन-जन के हृदय में स्थापित कर हमसे जुदा हुए थे। अटलजी यह नाम भारतीय इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम पृष्ठ है, जिससे एक सशक्त जननायक, स्वप्नदर्शी राजनायक, आदर्श चिन्तक, नये भारत के निर्माता, कुशल प्रशासक, दार्शनिक के साथ-साथ भारत को एक खास रंग देने की महक उठती है। उनके व्यक्तित्व के इतने रूप हैं, इतने आयाम हैं, इतने रंग है, इतने दृष्टिकोण हैं, जिनमें वे व्यक्ति और नायक हैं, दार्शनिक और चिंतक हैं, प्रबुद्ध और प्रधान है, वक्ता और नेता हैं, शासक एवं लोकतंत्र उन्नायक हैं।

तीन बार प्रधानमंत्री रहना उनकी उपलब्धि नहीं, बल्कि उस भरोसे का प्रमाण है जो देश ने उनके चरित्र और दृष्टि पर किया। 1996 में अल्पमत की सरकार से लेकर 1999 में स्थिर गठबंधन सरकार तक की उनकी यात्रा यह दर्शाती है कि लोकतंत्र में संख्या से अधिक नैतिकता और नेतृत्व की विश्वसनीयता का महत्व होता है। संसद में उनका वह ऐतिहासिक वक्तव्य-“सरकारें आएँगी-जाएँगी, लेकिन देश और लोकतंत्र रहना चाहिए” आज भी भारतीय राजनीति के लिए पाथेय है। अटलजी का सबसे निर्णायक योगदान भारत को रणनीतिक आत्मविश्वास दिलाने में रहा। 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण केवल वैज्ञानिक या सैन्य उपलब्धि नहीं थे, वे भारत के आत्मसम्मान की उद्घोषणा थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत शांति का पक्षधर है, लेकिन अपनी सुरक्षा और संप्रभुता के प्रति किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगा। इन परीक्षणों के बाद जब वैश्विक दबाव और प्रतिबंधों का दौर आया, तब अटलजी का नेतृत्व और भी निखरकर सामने आया। उन्होंने न तो आक्रामकता दिखाई, न ही आत्मसमर्पण बल्कि धैर्य, संवाद और आत्मनिर्भरता के मार्ग पर चलते हुए देश को आर्थिक और कूटनीतिक रूप से सुदृढ़ किया। यही संतुलन उनके राजनेता होने की सबसे बड़ी पहचान है।

अटल बिहारी वाजपेयी को केवल कठोर निर्णयों का नेता मानना अधूरा मूल्यांकन होगा। वे उतने ही बड़े शांति-दूत भी थे। पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए लाहौर बस यात्रा उनकी दूरदृष्टि का प्रतीक थी, जहाँ साहस, संवेदना और संवाद एक साथ चलते हैं। कारगिल युद्ध के समय भी उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं का पालन करते हुए देश की सीमाओं की रक्षा की और दुनिया को भारत की जिम्मेदार शक्ति-छवि से परिचित कराया। अटलजी का विश्वास था कि युद्ध अंतिम विकल्प होना चाहिए, लेकिन जब राष्ट्र की अस्मिता पर आघात हो, तब निर्णायक कार्रवाई अनिवार्य है। यही सोच उन्हें यथार्थवादी आदर्शवादी बनाती है। विलक्षण प्रतिभा, राजनीतिक कौशल, कुशल नेतृत्व क्षमता, बेवाक सोच, निर्णय क्षमता, दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता के कारण कांग्रेस के सभी नेता उनका लोहा मानते रहे।

वाजपेयीजी बेहद नम्र इंसान थे और वह अहंकार से कोसों दूर थे। उनके प्रभावी एवं बेवाक व्यक्तित्व से पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी प्रभावित थे और उन्होंने कहा था कि अटलजी एक दिन भारत के प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। आज भारतीय जनता पार्टी की मजबूती का जो धरातल बना है, वह उन्हीं की देन है। वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक हैं। 1977 में जनता पार्टी सरकार में उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस दौरान संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिवेशन में उन्होंने हिंदी में भाषण दिया और वे इसे अपने जीवन का सबसे सुखद क्षण बताते थे। वे संसद में बहुत प्रभावशाली वक्ता के रूप में जाने जाते रहे हैं और महत्वपूर्ण मुद्दे पर उनके भाषण खासे गौर से सुने जाते रहे हैं, जो भारत के संसदीय इतिहास की अमूल्य धरोहर है।

अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भारत ने बुनियादी ढाँचे और तकनीक के क्षेत्र में नई छलांग लगाई। स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, ग्रामीण सड़कों का विस्तार, दूरसंचार क्रांति और निजी क्षेत्र की सहभागिता-ये सब उस ‘नए भारत’ की नींव थे, जिसकी कल्पना उन्होंने की थी। उन्होंने विकास को केवल आर्थिक आँकड़ों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे आम नागरिक के जीवन से जोड़ा। ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान’ का नारा उनके समन्वित विकास-दर्शन को दर्शाता है, जहाँ सुरक्षा, कृषि और ज्ञान एक-दूसरे के पूरक हैं। यह नारा आज भी भारत की विकास-यात्रा का सूत्रवाक्य बन सकता है। अटल विहारी वाजपेयी ने पांच दशक तक सक्रिय राजनीति की, अनेक पदों पर रहे, केंद्रीय विदेश मंत्री व प्रधानमंत्री- पर वे सदा दूसरों से भिन्न रहे, अनूठे रहे। घाल-मेल से दूर। भ्रष्ट राजनीति में बेदाग। विचारों में निडर। टूटते मूल्यों में अडिग। घेरे तोड़कर निकलती भीड़ में मर्यादित। वे भारत के इतिहास में उन चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं जिन्होंने सिर्फ अपने नाम, व्यक्तित्व और करिश्मे के बूते पर न केवल सरकार बनाई बल्कि एक नयी सोच की राजनीति को पनपाया, पारदर्शी एवं सुशासन को सुदृढ़ किया। पिछले कई दशकों में वह एक ऐसे नेता के रूप में उभरे जो विश्व के प्रति उदारवादी सोच और लोकतांत्रिक आदर्शों के प्रति प्रतिबद्धता को महत्व देते हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी की सबसे बड़ी विशिष्टता यह थी कि वे सत्ता में रहते हुए भी संवेदनशील बने रहे। उनके भीतर का कवि कभी मरा नहीं। उनकी कविताएँ केवल साहित्य नहीं, बल्कि राष्ट्र के संघर्ष, आशा और आत्मबल की अभिव्यक्ति हैं। उनकी पंक्तियाँ निराशा में संबल देती हैं और चुनौती में साहस-“हार नहीं मानूँगा,रार नहीं ठानूँगा” यह केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है, जो व्यक्ति को भी प्रेरित करता है और राष्ट्र को भी। अटलजी का राष्ट्रवाद संकीर्ण नहीं था। वह समावेशी, सांस्कृतिक और मानवीय था। वे भारत की प्राचीन सभ्यता पर गर्व करते थे, लेकिन आधुनिकता से भयभीत नहीं थे। वे परंपरा और परिवर्तन के बीच सेतु थे। उनका हिंदुत्व आक्रामक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मविश्वास से उपजा हुआ था, जो सबको साथ लेकर चलने की प्रेरणा देता है।

आज जब राजनीति में ध्रूवीकरण, अविश्वास और कटुता बढ़ रही है, अटल बिहारी वाजपेयी और भी अधिक प्रासंगिक हो जाते हैं। उनका जीवन सिखाता है कि शक्ति के साथ शालीनता, विचार के साथ विनम्रता और राष्ट्रवाद के साथ मानवीयता कैसे निभाई जाती है। उनकी 101वीं जन्म-जयंती हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम केवल उनके नाम का स्मरण न करें, बल्कि उनके मूल्यों को जीवन में उतारें-सत्यनिष्ठा, संवाद, सहिष्णुता और राष्ट्र-प्रेम को व्यवहार में लाएँ। अटल बिहारी वाजपेयी कोई बीता हुआ अध्याय नहीं, बल्कि भारत की आत्मा में धड़कता हुआ वह स्वर हैं, जो हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल सरकारों का नहीं, नागरिकों का भी दायित्व है। यदि हम उनके विचारों से प्रेरणा लेकर एक सजग, संवेदनशील और सशक्त भारत के निर्माण में जुटें, तो यही उनकी सच्ची जयंती होगी और यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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