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‘भजन-राज’ यानी ‘भरोसे के शासन’ में राजस्थान के नये आयाम

राजस्थान की राजनीति में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह का हालिया दौरा किसी औपचारिक कार्यक्रम या शिष्टाचार भर तक सीमित नहीं था, वह एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत, एक भरोसे की सार्वजनिक मुहर और एक स्थायित्व का उद्घोष था। जाते-जाते मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की पीठ थपथपाकर अमित शाह ने यह जता दिया कि प्रदेश की कमान अब पूरी तरह ऐसे नेतृत्व के हाथों में है, जिस पर केंद्रीय आलाकमान को केवल विश्वास ही नहीं, बल्कि गहरा संतोष भी है। जिसे कभी राजनीतिक गलियारों में ‘सरप्राइज पैकेज’ कहकर देखा गया था, वही नेतृत्व आज राजस्थान की स्थिरता, सुशासन और भविष्य की ठोस नींव के रूप में स्थापित हो चुका है और राजस्थान की स्वर्णगाथा लिखने को तत्पर है।

‘भजन-राज’ यानी ‘भरोसे के शासन’ में राजस्थान के नये आयाम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक विशिष्ट और लगातार सफल रहा प्रयोग यह रहा है कि वे सत्ता और संगठन में नए चेहरों को निर्णायक जिम्मेदारियां सौंपने से नहीं हिचकते। पर्दे के पीछे वर्षों तक ईमानदारी और निष्ठा से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को अचानक मुख्यमंत्री, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष या राज्यपाल जैसे पदों पर आसीन करना मोदी की राजनीतिक शैली का साहसिक पक्ष रहा है। इन निर्णयों ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि राजनीति में अनुभव के साथ-साथ चरित्र, प्रतिबद्धता और संगठन के प्रति निष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। राजस्थान में भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाना भी ऐसा ही एक निर्णय था, जिसने आरंभ में अनेक लोगों को आश्चर्य में डाला। किंतु समय ने सिद्ध कर दिया कि यह निर्णय भावनात्मक नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक समझ और दूरदृष्टि पर आधारित था।

मुख्यमंत्री पद संभालते ही भजनलाल शर्मा ने यह साफ कर दिया कि वे सत्ता को साधन मानते हैं, साध्य नहीं। उनका एजेंडा कुर्सी बचाने का नहीं, बल्कि व्यवस्था बदलने का है। राजस्थान लंबे समय तक गुटीय राजनीति, शक्ति-संतुलन और पर्दे के पीछे चलने वाले समीकरणों से जूझता रहा है। सत्ता के भीतर ही सत्ता को चुनौती देने वाली प्रवृत्तियां यहां सामान्य रही हैं। भजनलाल शर्मा ने बिना किसी टकराव, बिना शोर-शराबे और बिना किसी को अपमानित किए, इन सभी प्रवृत्तियों को धीरे-धीरे अप्रासंगिक कर दिया। उन्होंने शासन को व्यक्ति-केंद्रित नहीं, बल्कि प्रणाली-केंद्रित बनाया। यही कारण है कि आज निर्णय तेजी से होते हैं, उन पर अमल भी होता है और उनकी जवाबदेही भी तय होती है।

उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी पहचान ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति है, जो केवल कागजों या भाषणों तक सीमित नहीं रही। विशेष रूप से पेपर लीक माफिया के खिलाफ की गई कार्रवाई ने सरकार की मंशा और मुख्यमंत्री के साहस को स्पष्ट रूप से उजागर किया। वर्षों से यह माफिया लाखों युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करता रहा, लेकिन राजनीतिक संरक्षण के चलते उस पर हाथ डालने का साहस कोई नहीं कर पाया। भजनलाल शर्मा ने सत्ता संभालते ही इस समस्या को जड़ से समाप्त करने का संकल्प लिया। एसआईटी के गठन, त्वरित जांच, बड़े नामों की गिरफ्तारी और बिना किसी दबाव के निष्पक्ष कार्रवाई ने यह सिद्ध कर दिया कि यह सरकार केवल घोषणाओं में नहीं, परिणामों में विश्वास रखती है। इससे न केवल युवाओं का भरोसा लौटा, बल्कि यह संदेश भी गया कि अब राजस्थान में कानून से बड़ा कोई नहीं है।

इसी प्रकार, दशकों से प्यास से जूझ रहे राजस्थान के लिए ईआरसीपी परियोजना पर मध्य प्रदेश के साथ हुआ ऐतिहासिक समझौता मुख्यमंत्री की राजनीतिक परिपक्वता और संवाद क्षमता का प्रमाण है। जिस योजना को वर्षों तक केवल चुनावी वादों और फाइलों में उलझाकर रखा गया था, उसे उन्होंने केंद्र सरकार के सहयोग और पड़ोसी राज्य के साथ सकारात्मक संवाद के जरिए वास्तविकता में बदलने का मार्ग प्रशस्त किया। यह निर्णय बताता है कि भजनलाल शर्मा टकराव की राजनीति के बजाय समाधान की राजनीति में विश्वास रखते हैं। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी उनकी सरकार ने स्पष्ट संदेश दिया है कि अपराध और अपराधियों के लिए अब कोई नरमी नहीं है। एंटी-गैंगस्टर टास्क फोर्स का गठन, संगठित अपराध के खिलाफ सख्त कार्रवाई और अपराधियों में कानून का भय-ये सभी कदम इस बात के प्रमाण हैं कि राज्य में सत्ता का इकबाल लौट रहा है। आम नागरिक खुद को सुरक्षित महसूस कर रहा है और अपराधी खुद को असुरक्षित। यह सुशासन का सबसे ठोस संकेत होता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘विकसित भारत’ की संकल्पना को राजस्थान में जमीन पर उतारने में भी मुख्यमंत्री की सक्रियता स्पष्ट दिखाई देती है। अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक शासन की योजनाएं पहुंचें, यह केवल नारा नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्राथमिकता बनी है। फैसलों में स्पष्टता, गति और निष्पक्षता-इन तीनों का संतुलन उनकी कार्यशैली को विशिष्ट बनाता है। यही कारण है कि विपक्ष भी आज ठोस आलोचना के बिंदु खोजने में असहज नजर आता है। भजनलाल शर्मा के शासन की चर्चा करते समय उनके चारित्रिक और व्यक्तिगत गुणों का उल्लेख अत्यंत आवश्यक है।

राजनीति में जहां दिखावा, आडंबर और अहंकार आम बात हो चली है, वहीं भजनलाल शर्मा अपनी सरलता, सहजता और सादगीपूर्ण जीवनशैली के लिए पहचाने जाते हैं। सत्ता में आने के बाद भी उनके व्यवहार, भाषा और जीवन-शैली में कोई कृत्रिम बदलाव नहीं आया। वे निर्णय लेते समय दृढ़ होते हैं, लेकिन संवाद में विनम्र रहते हैं। उनका राजनीतिक कौशल शोर में नहीं, बल्कि परिणामों में दिखाई देता है। वे जानते हैं कि कब कठोर होना है और कब संयम रखना है। यही संतुलन उन्हें भीड़ से अलग करता है। संगठन के प्रति उनकी निष्ठा, कार्यकर्ताओं के प्रति सम्मान और जनता के प्रति उत्तरदायित्व-ये सभी गुण उनके नेतृत्व को नैतिक आधार प्रदान करते हैं।

राजस्थान के अब तक के मुख्यमंत्रियों का शासन बहुआयामी अनुभवों से भरा रहा है, जिसमें प्रशासनिक दक्षता, सामाजिक न्याय, विकासात्मक प्राथमिकताओं और राजनीतिक स्थिरता-इन सभी के विविध रूप देखने को मिलते हैं। हीरालाल शास्त्री और जय नारायण व्यास जैसे प्रारंभिक मुख्यमंत्रियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं और प्रशासनिक ढांचे की नींव रखी। मोहनलाल सुखाड़िया का दीर्घकालीन शासन सिंचाई, पंचायतीराज और सामाजिक सुधारों के लिए स्मरणीय रहा, जिसे ‘आधुनिक राजस्थान’ की आधारशिला माना जाता है। बाद के वर्षों में हरिदेव जोशी, शिवचरण माथुर और अशोक गहलोत ने कल्याणकारी योजनाओं, सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा-स्वास्थ्य और विकेंद्रीकरण पर बल दिया, जबकि भैरोंसिंह शेखावत और वसुंधरा राजे के शासन में आधारभूत संरचना, औद्योगिक निवेश, सड़क-बिजली और प्रशासनिक सख्ती पर अधिक जोर दिखा।

इन सबके तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य में भजनलाल शर्मा का शासन अपेक्षाकृत नया होते हुए भी “सुशासन, अनुशासन और डिलीवरी” के संकल्प के साथ आगे बढ़ता दिखाई देता है। उनका फोकस प्रशासनिक चुस्ती, कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, केंद्र-राज्य समन्वय और योजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन पर है। पूर्ववर्ती मुख्यमंत्रियों के शासन जहाँ दीर्घ अनुभव और स्थापित नीतिगत पहचान के लिए जाने जाते हैं, वहीं भजनलाल शर्मा का शासन अपेक्षाओं, परिणामोन्मुखी कार्यसंस्कृति और नई कार्यशैली के परीक्षण के दौर में है। इस प्रकार राजस्थान की राजनीति में उनका कार्यकाल परंपरा और परिवर्तन-दोनों के बीच एक सेतु की तरह देखा जा सकता है, जहाँ पूर्व शासनों की उपलब्धियों से सीख लेकर भविष्य के लिए अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और प्रभावी शासन मॉडल गढ़ने का प्रयास परिलक्षित होता है।

आज राजस्थान में ‘भजन राज’ का अर्थ केवल सत्ता का संचालन नहीं, बल्कि भरोसे का शासन है। ऐसा शासन, जहां कार्यकर्ता खुद को गौरवान्वित महसूस करता है और आम नागरिक खुद को सुरक्षित। केंद्रीय आलाकमान की खुली छूट और अमित शाह की पीठ थपथपाहट ने मुख्यमंत्री को और अधिक ऊर्जा के साथ काम करने का संबल दिया है। यह संकेत साफ है कि भजनलाल शर्मा अब केवल एक प्रयोग नहीं, बल्कि एक स्थापित, विश्वसनीय और सक्षम नेतृत्व के रूप में स्वीकार किए जा चुके हैं। जो लोग अब भी किसी बड़े बदलाव या सत्ता-समीकरण के इंतजार में हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि भजनलाल शर्मा का नेतृत्व कोई संयोग नहीं, बल्कि राजस्थान को एक स्थिर, सुशासित और स्वर्णिम भविष्य की ओर ले जाने वाला सुविचारित संकल्प है। वे केंद्रीय नेतृत्व की कसौटी पर 24 कैरेट खरा उतरने के लिए प्रतिबद्ध हैं और उनके अब तक के कार्य इस प्रतिबद्धता की ठोस गवाही देते हैं।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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