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ईरान की उथल-पुथल एवं अमेरिका से टकराव गंभीर चुनौती

ईरान में बार-बार उभरती उथल-पुथल केवल किसी एक घटना, किसी एक फैसले या किसी एक पीढ़ी का आक्रोश नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक, वैचारिक और भू-राजनीतिक संरचना की परिणति है, जिसने 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से इस देश को आकार दिया है। आज जब सड़कों पर विरोध के दृश्य, सोशल मीडिया पर आक्रोश और पश्चिमी विश्लेषकों की ओर से सत्ता परिवर्तन की अटकलें तेज हैं, तब यह समझना जरूरी हो जाता है कि ईरान का संकट साधारण आंतरिक असंतोष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति-संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ प्रश्न है। ईरान की आंतरिक उथल-पुथल एवं अस्थिरता के साथ-साथ उसका अमेरिका के साथ टकराव युद्ध की स्थितियांे एवं वैश्विक असंतुलन का बड़ा कारण बन रहा है।

ईरान की उथल-पुथल एवं अमेरिका से टकराव गंभीर चुनौती

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता टकराव केवल द्विपक्षीय तनाव नहीं है, बल्कि इसके दुष्प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकते हैं। इस संघर्ष से पश्चिम एशिया में युद्ध का खतरा बढ़ता है, जिसका सीधा असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य में किसी भी तरह की अस्थिरता अंतरराष्ट्रीय व्यापार की धमनियों को बाधित कर सकती है, जिससे महंगाई और आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ेगा। इसके साथ ही यह टकराव क्षेत्रीय देशों को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से युद्ध में खींच सकता है, जिससे शरणार्थी संकट, आतंकवाद और साम्प्रदायिक तनाव गहराने की आशंका है। महाशक्तियों के परस्पर टकराव की स्थिति में विश्व राजनीति और अधिक धू्रवीकृत होगी, अंतरराष्ट्रीय सहयोग कमजोर पड़ेगा और शांति की जगह अविश्वास व सैन्य प्रतिस्पर्धा का वातावरण बनेगा, जिसका खामियाजा अंततः पूरी मानवता को भुगतना पड़ सकता है।

1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान में केवल शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी को सत्ता से हटाकर एक नई सरकार स्थापित नहीं की थी, बल्कि एक ऐसी वैचारिक-राजनीतिक संरचना रची थी, जिसमें धर्म, राजनीति और सुरक्षा-तंत्र एक-दूसरे में घुलमिल गए। ‘विलायत-ए-फकीह’ की अवधारणा के तहत सर्वाेच्च धार्मिक नेतृत्व को अंतिम राजनीतिक अधिकार सौंपा गया। इसी व्यवस्था के संरक्षण और विस्तार के लिए इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर यानी आईआरजीसी को खड़ा किया गया, जो समय के साथ केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक ताकत का भी केंद्र बन गया। यही कारण है कि ईरान की व्यवस्था को केवल सरकार या शासन कहकर नहीं समझा जा सकता; यह एक संपूर्ण तंत्र है, जिसे हटाने के लिए केवल विरोध-प्रदर्शन पर्याप्त नहीं होते।

ईरान ने पिछले चार दशकों में कई बड़े जनांदोलन देखे हैं। 2009 का ग्रीन मूवमेंट, 2017-18 की आर्थिक असंतोष की लहर, 2019 में ईंधन मूल्य वृद्धि के खिलाफ उग्र प्रदर्शन और 2022 में सामाजिक स्वतंत्रताओं को लेकर उठी आवाजेंकृहर बार यह माना गया कि शायद अब व्यवस्था डगमगाएगी। लेकिन हर बार वही सत्ता, वही ढांचा और वही शक्ति-संतुलन कायम रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि ईरान में सुरक्षा-तंत्र राज्य से अलग नहीं, बल्कि राज्य का ही विस्तार है। अरब स्प्रिंग के दौरान मिस्र या तुर्किए में सेनाओं ने अंततः राष्ट्र-राज्य को बचाने का रास्ता चुना, लेकिन ईरान में आईआरजीसी खुद को क्रांति और इस्लामिक रिपब्लिक का संरक्षक मानती है, न कि केवल सीमाओं की रक्षा करने वाली संस्था।

फिर भी यह कहना गलत होगा कि ईरान की व्यवस्था पर कोई दबाव नहीं है। वास्तव में, आज का दबाव पहले से कहीं अधिक जटिल और गहरा है। इसका सबसे बड़ा कारण है पीढ़ीगत बदलाव। ईरान की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है, जिसने 1979 की क्रांति न देखी है और न ही उससे भावनात्मक रूप से जुड़ा है। उनके लिए क्रांति कोई जीवित स्मृति नहीं, बल्कि इतिहास की किताबों का अध्याय है। उनकी आकांक्षाएं इंटरनेट, वैश्विक संस्कृति, शिक्षा, रोजगार और व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं से प्रेरित हैं। जब ये आकांक्षाएं एक सख्त सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था से टकराती हैं, तो असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है।

इस असंतोष को और तीखा बनाया है दशकों से चले आ रहे अमेरिकी और पश्चिमी प्रतिबंधों ने। इन प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। तेल निर्यात सीमित हुआ, विदेशी निवेश रुका, मुद्रा कमजोर पड़ी और महंगाई ने आम नागरिक की कमर तोड़ दी। विकास और आधुनिकीकरण की गति धीमी पड़ी, जिससे खासकर शहरी मध्यम वर्ग और युवा वर्ग में भविष्य को लेकर निराशा बढ़ी। आज ईरान के कई नागरिक यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका और इजराइल के साथ अंतहीन दुश्मनी का बोझ उन्हीं के कंधों पर डाला जाना जरूरी है। धीरे-धीरे यह वैचारिक टकराव राष्ट्रवादी गौरव से अधिक सामाजिक बोझ के रूप में देखा जाने लगा है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव इस पूरे परिदृश्य को और खतरनाक बना देता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाने के आदेश और सैन्य हस्तक्षेप के संकेतों ने पश्चिम एशिया को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ईरान आज 1979 के बाद से शायद सबसे गंभीर बाहरी दबाव का सामना कर रहा है। यह टकराव केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा भू-राजनीतिक खेल बन चुका है, जिसमें महाशक्तियां अपने-अपने हित साधना चाहती हैं।

अकसर यह धारणा बनाई जाती है कि बाहरी हस्तक्षेप से ईरान में सत्ता परिवर्तन संभव है। लेकिन इतिहास बताता है कि ईरान में विदेशी दखलअंदाजी ने हमेशा उल्टा असर डाला है। 1953 में मोसादेग सरकार के तख्तापलट से लेकर आज तक, ‘विदेशी साजिश’ का कथानक ईरानी राष्ट्रवाद को मजबूत करता रहा है। बाहरी समर्थन से होने वाले आंदोलनों को जनता का व्यापक और स्थायी समर्थन नहीं मिल पाता। यही वजह है कि विपक्षी नेतृत्व, जो अक्सर देश से बाहर बैठा होता है, ईरान के भीतर विश्वसनीय विकल्प नहीं बन सका। इसके अलावा, ईरान वेनेजुएला नहीं है। यह एक बड़ा, संगठित और रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण देश है, जिसकी पकड़ इराक, सीरिया, लेबनान और यमन तक फैली हुई है। यहां किसी भी प्रकार का सैन्य हस्तक्षेप पूरे पश्चिम एशिया को आग में झोंक सकता है। इजराइल, खाड़ी देश, अमेरिका और यूरोपीय शक्तियां-सब इसके प्रभाव में आएंगे। चीन और रूस भी एक अस्थिर ईरान नहीं चाहते, क्योंकि वह उनके क्षेत्रीय और वैश्विक हितों के खिलाफ होगा। यह बहुध्रूवीय संतुलन ईरान की व्यवस्था को एक अप्रत्यक्ष सुरक्षा कवच प्रदान करता है।

ईरान के भीतर आम नागरिकों का गुस्सा अब केवल आर्थिक कुप्रबंधन या भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं रह गया है। एक बड़ा वर्ग यह मानने लगा है कि शासन की प्राथमिकताएं आम लोगों की जरूरतों से कट चुकी हैं। जब नागरिक भोजन, रोजगार और सम्मानजनक जीवन की मांग कर रहे हों, तब बाहरी दुश्मनों के खिलाफ वैचारिक युद्ध और यहूदी-विरोधी राजनीति उन्हें खोखली प्रतीत होती है। कई ईरानी मानते हैं कि इसी नीति ने देश को अंतरराष्ट्रीय अलगाव में धकेला और आर्थिक बर्बादी को जन्म दिया। यदि ईरान में बाहरी मदद से सत्ता परिवर्तन की कोशिश होती है, तो इसके परिणाम केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। मध्य पूर्व में शक्ति-संतुलन बुरी तरह बिगड़ सकता है। शिया-सुन्नी तनाव, इजराइल-ईरान संघर्ष और वैश्विक ऊर्जा बाजार-सब पर इसका गहरा असर पड़ेगा।

भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण होगी। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक संबंध रहे हैं। चाबहार बंदरगाह से लेकर ऊर्जा सुरक्षा तक, ईरान भारत की विदेश नीति में अहम स्थान रखता है। ऐसे में भारत को अत्यंत सावधानी के साथ अपने रणनीतिक संतुलन को बनाए रखना होगा, ताकि वह किसी एक ध्रूव का मोहरा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। अंततः, ईरान की वर्तमान उथल-पुथल यह संकेत देती है कि व्यवस्था पर दबाव वास्तविक है, लेकिन तात्कालिक पतन की भविष्यवाणियां अक्सर जल्दबाजी साबित होती हैं। यह संघर्ष केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि पहचान, वैचारिक दिशा और भविष्य की कल्पना का संघर्ष है। ईरान का भविष्य संभवतः न तो अचानक क्रांति से बदलेगा और न ही केवल दमन से स्थिर रहेगा। यह एक लंबी, जटिल और अंतर्द्वंद्वों से भरी प्रक्रिया होगी, जिसके परिणाम न केवल ईरान, बल्कि पूरी दुनिया की राजनीति को प्रभावित करेंगे।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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