देश में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और आधुनिक तकनीक को लेकर लगातार नए दावे किए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय, शोध संस्थान और निजी कंपनियां अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन कर रही हैं। इसी क्रम में हाल ही में आयोजित एक एआई समिट के दौरान प्रस्तुत एक “एआई डॉग” को लेकर विवाद खड़ा हो गया। इस प्रकरण ने न केवल संबंधित विश्वविद्यालय की साख पर प्रश्नचिह्न लगाया है, बल्कि शोध अनुदान और पारदर्शिता की व्यापक बहस भी छेड़ दी है।
बताया गया कि एक प्रमुख निजी विश्वविद्यालय, गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एआई से जुड़ी अपनी उपलब्धियों के प्रदर्शन के दौरान एक रोबोटिक डॉग प्रस्तुत किया। प्रारंभिक दावों में इसे स्वदेशी शोध एवं नवाचार का परिणाम बताया गया, किंतु सोशल मीडिया और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच चर्चा के बाद यह बात सामने आई कि यह उपकरण चीन से खरीदा गया था। विवाद बढ़ने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्वीकार किया कि प्रदर्शित उपकरण विदेशी था।
इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में देश के प्रधानमंत्री की उपस्थिति ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया। राष्ट्रीय मंच पर यदि किसी तकनीकी उपलब्धि को स्वदेशी नवाचार के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो उससे देश की प्रतिष्ठा जुड़ जाती है। ऐसे में तथ्य और प्रस्तुति के बीच किसी भी प्रकार का अंतर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।

