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सेवा, संघर्ष और सामाजिक परिवर्तन के द्योतक

27 फरवरी विश्व एनजीओ दिवस

प्रतिवर्ष 27 फरवरी को मनाया जाने वाला विश्व एनजीओ दिवस विश्वभर में गैर-सरकारी संगठनों के योगदान को मान्यता देने और उनकी भूमिका पर विचार करने का अवसर प्रदान करता है। आज के समय में जब शासन-व्यवस्था जटिल होती जा रही है और सामाजिक चुनौतियाँ बहुआयामी रूप ले चुकी हैं, तब एनजीओ लोकतंत्र की एक सशक्त सहायक शक्ति के रूप में उभरे हैं।

भारत में सेवा और लोककल्याण की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। ‘दान’, ‘सेवा’ और ‘परमार्थ’ की भावना हमारे सांस्कृतिक मूल्यों में रची-बसी है। आधुनिक अर्थों में एनजीओ भले ही स्वतंत्रता-उत्तर काल में संगठित रूप से विकसित हुए हों, किंतु उनके बीज समाज-सुधार आंदोलनों में पहले से विद्यमान थे।

स्वाधीनता संग्राम के दौरान सामाजिक जागरण की धारा को दिशा देने वाले संगठनों और महापुरुषों जैसे महात्मा गांधी ने सेवा और स्वावलंबन की जो चेतना जगाई, वही आज के अनेक स्वैच्छिक संगठनों की प्रेरणा है। गांधीजी के ‘रचनात्मक कार्यक्रम’ ने ग्रामोदय और समाजोदय की जो अवधारणा दी, वह आज भी एनजीओ कार्यप्रणाली का आधार है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में सरकारी योजनाओं का अंतिम छोर तक पहुँचना एक चुनौती है। आधुनिक वैश्विक कल्याण संस्थान (ट्रस्ट) जैसे सैकड़ों एनजीओ निम्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शिक्षा और साक्षरता – वंचित वर्गों तक शिक्षा की पहुँच।स्वास्थ्य सेवाएँ – ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता।महिला सशक्तिकरण-स्व-सहायता समूह, कौशल विकास। पर्यावरण संरक्षण- जल, जंगल, जमीन की रक्षा।मानवाधिकार और सामाजिक न्याय : हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ बनना।ग्रामीण भारत में कार्यरत अनेक संगठन ‘सरकार और समाज’ के बीच सेतु का कार्य करते हैं। वे नीतियों के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी सहायक होते हैं।

हाल के वर्षों में एनजीओ क्षेत्र पर कई प्रकार के प्रश्न भी उठे हैं। वित्तीय पारदर्शिता, विदेशी अनुदान विनियमन, और जवाबदेही को लेकर।(एफसीआरए) जैसे कानूनों ने विदेशीऊ अनुदान प्राप्त करने की प्रक्रिया को नियंत्रित किया है, जिससे पारदर्शिता सुनिश्चित हो सके।परंतु यह भी आवश्यक है कि नियमन और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बना रहे, ताकि वास्तविक सामाजिक कार्य बाधित न हो।

लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता; वह निरंतर संवाद, सहभागिता और उत्तरदायित्व की प्रक्रिया है। एनजीओ नागरिक समाज की उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो सरकार की नीतियों पर रचनात्मक सुझाव देती है, विसंगतियों को उजागर करती है और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज़ बनती है।भारतीय संदर्भ में, जहाँ सामाजिक-आर्थिक विषमता गहरी है, वहाँ एनजीओ सामाजिक न्याय की दिशा में महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं।

विश्व एनजीओ दिवस केवल प्रशंसा का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममूल्यांकन का भी क्षण है। यह प्रश्न उठाना आवश्यक है।क्या एनजीओ अपने मूल उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं?क्या वे पारदर्शिता और नैतिकता के मानकों का पालन कर रहे हैं?

भारत के विकास पथ पर एनजीओ की भूमिका निर्णायक हो सकती है, बशर्ते सेवा की भावना, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व सर्वोपरि रहें। अंततः, राष्ट्र निर्माण केवल सरकार का दायित्व नहीं-यह समाज की सामूहिक चेतना का परिणाम है। और इसी चेतना के संवाहक हैं हमारे स्वैच्छिक संगठन। कुलमिलाकर विश्व एनजीओ दिवस हमें यही संदेश देता है।”संगठित सेवा ही सशक्त समाज की आधारशिला है।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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