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शक्ति स्वरूपा

साहस है समाया सबमें ही,
वह नर हो या हो नारी तुम।
नर से यूं कदम मिलाकर के,
अपनी पहचान बनाती तुम।

तुम ही दुर्गा, तुम ही लक्ष्मी,
तुममें बसता देवत्व महान।
तुम नारी हो, कमज़ोर नहीं,
तुममें पलता है स्वाभिमान।

तुम सरस्वती, तुम हो काली,
तुम चामुंडा का प्रहार हो।
तुम अनुसूया, तुम सावित्री,
तुम सीता का अवतार हो।

लक्ष्मीबाई सा शौर्य तुम्हीं,
मीरा सा अतुलित प्रेम हो।
पद्मावती सा जौहर तुममें,
दुर्गावती सा पराक्रम हो।

इतिहास साक्षी है तुमने,
हर मुश्किल को संभाला है।
जब कोई विपदा आई तो,
अदम्य साहस दिखलाया है।

यदि कोई देखे कुदृष्टि से,
रणचंडी का लो अवतार।
चपला बनके टूट पड़ो तुम,
खंडित करो धरा का भार।

अपनी रक्षा स्वयं करो तुम,
शक्ति का बनो रूप साकार।
बुलंद हौसलों का परिचय दे,
बनो जगत का तुम उपहार !!!

स्मृति श्रीवास्तव
स्मृति श्रीवास्तव
अन्तर्ध्वनि
अन्तर्ध्वनि

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