हां! मैं कविता हूं
भावनाओं के गर्भ से जन्मी
शब्दों की सौगात हूं
जिसमें अवगुंठित है
हृदय की पीड़ा भी
मधुर भावों की भीनी सुगंध भी
मैं कल्पना का
असीमित आगार हूं।
हां! मैं कविता हूं
सृजन की आवाज़ हूं
कवि के चिंतन से निकलकर
कागज़ पर उतरती
पावन गंगा सी प्रवाहित
अनंत विचारों की, उद्गारों की,
शांत, निर्मल रसधार हूं।
हां! मैं कविता हूं
मिट्टी, पानी, हवा, धूप की भांति
स्वतः निर्मित प्रकृति हूं
प्रेम में भीगी
मधुर फुहार हूं
अक्षर अक्षर में ध्वनित
स्नेहिल झंकार हूं।
हां! मैं कविता हूं
दोहा, मुक्तक, छंद, सोरठा,
चौपाई सी,
अनेक विधाओं से सज्जित
गीतों का अनुबंध हूं
अम्बर के असंख्य तारकों की भांति
अनगिनत भावों का
उद्गार हूं।
हां! मैं कविता हूं
सैनिकों के हृदयों में
देशप्रेम जाग्रत करने की
जोशभरी हुंकार हूं
वीर शहीदों के बलिदान,
सम्मान का
अनमोल श्रृंगार हूं !!!

स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य संग्रह “अन्तर्ध्वनि” समकालीन हिंदी काव्यधारा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है। हिंदी साहित्य में एम.ए. उपाधि प्राप्त करने के उपरांत लेखिका ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन को समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत का अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन सभी अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना इस कृति की पंक्तियों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है।

