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8,200 वर्ष पूर्व ग्रीनलैंड की ठंडक से कमजोर पड़ा था भारतीय ग्रीष्म मानसून, वैज्ञानिक अध्ययन में हुआ खुलासा

लगभग 8,200 वर्ष पहले पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में हुई एक बड़ी घटना का प्रभाव भारत के मानसून पर भी पड़ा था। वैज्ञानिकों के एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र, विशेष रूप से ग्रीनलैंड और कनाडा के आसपास तापमान में अचानक आई गिरावट के कारण भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की तीव्रता कम हो गई थी। यह घटना जलवायु इतिहास में “8.2 हजार वर्ष की शीतलन घटना” के नाम से जानी जाती है और इसे होलोसीन काल की सबसे महत्वपूर्ण जलवायु घटनाओं में से एक माना जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस घटना के दौरान ग्रीनलैंड का तापमान लगभग 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था और वातावरण में मीथेन का स्तर करीब 80 पीपीबीवी कम हो गया था। मीथेन की यह गिरावट वैश्विक जल चक्र में बड़े बदलाव का संकेत देती है। यह घटना लगभग 8220 से 7600 कैलेंडर वर्ष बीपी के बीच हुई थी और इसका कारण उत्तरी अमेरिका की विशाल अगासिज़ झील से हडसन खाड़ी के माध्यम से उत्तरी अटलांटिक महासागर में अचानक बड़ी मात्रा में ताजे पानी का प्रवाह माना जाता है। इस हिमनदीय विस्फोट बाढ़ ने अटलांटिक महासागर की परिसंचरण प्रणाली को प्रभावित किया, जिसके कारण वैश्विक जलवायु पर व्यापक प्रभाव पड़ा।

भारत में इस ऐतिहासिक जलवायु घटना के प्रमाण विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के एक स्वायत्त संस्थान बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज के वैज्ञानिकों ने खोजे हैं। शोधकर्ताओं ने भारत के कोर मानसून जोन में स्थित छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले की तुमान झील से प्राप्त तलछट का विश्लेषण करके इस घटना के संकेत प्राप्त किए। अध्ययन के दौरान झील से लगभग 1.2 मीटर लंबी तलछट प्रोफाइल निकाली गई, जिसमें हजारों वर्षों से संरक्षित परागकण मौजूद थे।

पैलियोबॉटनी और पराग विश्लेषण की तकनीक का उपयोग करते हुए वैज्ञानिकों ने इन जीवाश्म परागकणों की पहचान की और अतीत की वनस्पति संरचना का पुनर्निर्माण किया। प्रत्येक प्रकार का पौधा विशिष्ट प्रकार के परागकण उत्पन्न करता है, इसलिए परागकणों का अध्ययन प्राचीन पर्यावरण और जलवायु परिस्थितियों को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। शोधकर्ताओं ने प्रत्येक नमूने में लगभग 300 स्थलीय परागकणों की पहचान और गणना की। इसके आधार पर उन्होंने हजारों वर्षों पहले की वनस्पति संरचना और मानसूनी परिस्थितियों का उच्च रिजोल्यूशन जलवायु अभिलेख तैयार किया।

अध्ययन से पता चला कि जब उष्णकटिबंधीय नम पर्णपाती वन के परागकण अधिक मात्रा में पाए जाते हैं तो यह मजबूत मानसून वर्षा का संकेत देता है, जबकि शुष्क पर्णपाती वन या घासीय पौधों के परागकणों की अधिकता कमजोर मानसून का संकेत देती है। वैज्ञानिकों ने 8.2 हजार वर्ष की अवधि के दौरान परागकणों के विश्लेषण में शुष्क वनस्पति के संकेत अधिक पाए, जिससे स्पष्ट होता है कि उस समय भारतीय मानसून कमजोर पड़ गया था।

इस शोध में रेडियोकार्बन डेटिंग और सांख्यिकीय आयु-गहराई मॉडलिंग जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया गया, जिसके माध्यम से वैज्ञानिकों ने लगभग 8,200 वर्षों की विस्तृत समयरेखा तैयार की। अध्ययन के परिणाम प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका “क्वाटरनरी इंटरनेशनल” में प्रकाशित हुए हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि 8.2 हजार वर्ष की शीतलन घटना के दौरान उत्तरी अटलांटिक और भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून के बीच एक मजबूत दूरसंचारीय संबंध मौजूद था। इसका अर्थ है कि पृथ्वी के एक क्षेत्र में होने वाला जलवायु परिवर्तन हजारों किलोमीटर दूर स्थित क्षेत्रों के मौसम और जलवायु प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। ग्रीनलैंड में आई इस ठंडक के कारण अटलांटिक महासागर की परिसंचरण प्रणाली में व्यवधान उत्पन्न हुआ, जिससे वैश्विक पवन प्रणालियों में परिवर्तन आया और उत्तरी गोलार्ध में मानसून कमजोर हो गया।

इस अध्ययन में भारत के अन्य क्षेत्रों से प्राप्त जलवायु अभिलेखों के साथ भी तुलना की गई। उत्तर पश्चिम भारत की रिवासा झील, छत्तीसगढ़ के कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान की कोटमसर गुफा से प्राप्त स्पेलियोथेम अभिलेख तथा कंवर आर्द्रभूमि से प्राप्त भूवैज्ञानिक आंकड़ों में भी इसी अवधि के दौरान मानसून के कमजोर होने के संकेत मिलते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह घटना केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी बल्कि व्यापक भौगोलिक क्षेत्र में इसका प्रभाव दिखाई देता है।

शोधकर्ताओं के अनुसार यह अध्ययन यह भी दर्शाता है कि मध्य होलोसीन काल में भी भारतीय मानसून अत्यंत संवेदनशील था और यह उच्च अक्षांशों में होने वाले महासागरीय परिवर्तनों तथा उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर की जलवायु परिवर्तनशीलता से प्रभावित हो सकता था। इस प्रकार के ऐतिहासिक जलवायु अध्ययन भविष्य में होने वाले संभावित जलवायु परिवर्तनों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान समय में वैश्विक जलवायु परिवर्तन और समुद्री परिसंचरण में संभावित बदलावों को देखते हुए ऐसे अध्ययनों का महत्व और बढ़ जाता है। अतीत की जलवायु घटनाओं का विश्लेषण हमें यह समझने में मदद करता है कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली किस प्रकार परस्पर जुड़ी हुई है और दूरस्थ क्षेत्रों में होने वाले परिवर्तन किस तरह मानसून जैसी महत्वपूर्ण मौसम प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं।

Source: https://www.sciencedirect.com/science/article/abs/pii/S1040618225004471?via%3Dihub

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