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सीएसआईआर का स्वदेशी बायो-बिटुमेन: कृषि अवशेषों से टिकाऊ सड़कों की दिशा में निर्णायक पहल

सतत अवसंरचना विकास और चक्रीय अर्थव्यवस्था को गति देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) ने अपनी अभिनव तकनीक “लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास से बायो-बिटुमेन – कृषि अवशेष से सड़कों तक” के औद्योगिक स्तर पर उपयोग हेतु प्रौद्योगिकी हस्तांतरण कार्यक्रम आयोजित किया। यह पहल न केवल भारत की वैज्ञानिक क्षमता को रेखांकित करती है, बल्कि कृषि, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों के बीच एक समन्वित मॉडल प्रस्तुत करती है।

इस अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस तकनीक को “ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी” बताते हुए कहा कि यह कृषि को उच्च मूल्य वाली अवसंरचना परियोजनाओं से जोड़ने का माध्यम बनेगी। उन्होंने रेखांकित किया कि बायो-बिटुमेन का उपयोग किसानों के लिए अतिरिक्त आय सृजन का स्रोत बनेगा और पराली जलाने जैसी समस्याओं को कम करने में सहायक होगा।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी तथा पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) जितेंद्र सिंह ने इस पहल को आत्मनिर्भर भारत के दृष्टिकोण का सशक्त उदाहरण बताया। उनके अनुसार, यह तकनीक “अपशिष्ट से संपदा” (Waste to Wealth) के सिद्धांत को व्यवहार में परिणत करती है और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण को गति प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि बायो-बिटुमेन पारंपरिक बिटुमेन के साथ अनुकूलता, टिकाऊपन और कम कार्बन उत्सर्जन के मानकों पर खरा उतरता है, जिससे इसे राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं में व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है।

सीएसआईआर की महानिदेशक एवं डीएसआईआर की सचिव एन. कलैसेल्वी ने इसे पेट्रोलियम-आधारित सामग्रियों से जैव-आधारित विकल्पों की ओर एक संरचनात्मक बदलाव बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीएसआईआर का लक्ष्य केवल अनुसंधान तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को जमीनी स्तर पर लागू कर राष्ट्रीय विकास में योगदान देना है।

प्रौद्योगिकी का वैज्ञानिक आधार और कार्यप्रणाली

बायो-बिटुमेन तकनीक, जिसे सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान और सीएसआईआर-भारतीय पेट्रोलियम संस्थान द्वारा संयुक्त रूप से विकसित किया गया है, लिग्नोसेलुलोसिक बायोमास—जैसे फसल अवशेष और कृषि अपशिष्ट—को कच्चे माल के रूप में उपयोग करती है।

यह प्रक्रिया मुख्यतः ऊष्मा-रासायनिक रूपांतरण (Thermo-chemical conversion) पर आधारित है, जिसके माध्यम से जैव-द्रव्यमान को एक ऐसे बाइंडर में परिवर्तित किया जाता है, जो पारंपरिक पेट्रोलियम-आधारित बिटुमेन के समान कार्य करता है।

प्रमुख विशेषताएं:

  • पारंपरिक बिटुमेन के समकक्ष प्रदर्शन
  • कम कार्बन उत्सर्जन
  • नवीकरणीय स्रोतों पर आधारित उत्पादन
  • आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता में कमी

आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

यह तकनीक बहुआयामी प्रभाव उत्पन्न करने की क्षमता रखती है:

1. कृषि क्षेत्र पर प्रभाव

  • फसल अवशेषों का व्यावसायिक उपयोग
  • किसानों के लिए अतिरिक्त आय स्रोत
  • पराली जलाने में कमी

2. पर्यावरणीय लाभ

  • ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी
  • वायु प्रदूषण नियंत्रण
  • संसाधनों का पुनर्चक्रण

3. अवसंरचना क्षेत्र में योगदान

  • टिकाऊ और दीर्घकालिक सड़क निर्माण
  • लागत में संभावित कमी
  • स्वदेशी तकनीक का उपयोग

नीतिगत और रणनीतिक महत्व

यह पहल सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा सड़क निर्माण में अपनाए जाने के लिए तैयार की गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरकार इस तकनीक को नीतिगत स्तर पर समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध है।

साथ ही, यह पहल भारत की प्रमुख रणनीतियों के अनुरूप है:

  • आत्मनिर्भर भारत अभियान
  • राष्ट्रीय जैव-ऊर्जा मिशन
  • नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य
  • चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल

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