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भारत में खाद्य मिलावट पर राष्ट्रीय विमर्श: अधिकार, चुनौतियाँ और सुधार की दिशा

नई दिल्ली में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा आयोजित “भारत में खाद्य मिलावट से निपटना: व्यापकता, चुनौतियाँ और सुधार” विषयक उच्चस्तरीय बैठक ने देश में खाद्य सुरक्षा के प्रश्न को एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। खाद्य एवं पोषण के अधिकार पर गठित कोर समूह की यह बैठक केवल एक औपचारिक समीक्षा नहीं थी, बल्कि यह उस व्यापक संकट की ओर संकेत करती है जो नागरिकों के स्वास्थ्य, अधिकारों और जीवन की गुणवत्ता को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहा है।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य और कानूनी ढांचा

एनएचआरसी के अध्यक्ष वी. रामासुब्रमणियन ने अपने उद्घाटन संबोधन में भारत के खाद्य सुरक्षा कानूनों की ऐतिहासिक यात्रा को रेखांकित किया। उन्होंने मद्रास मिलावट निवारण अधिनियम, 1918 से लेकर खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम 2006 तक के विकासक्रम का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि विधायी स्तर पर निरंतर प्रयास हुए हैं, किंतु इनका प्रभाव अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुँच पाया है।

उनका यह कथन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है कि “जीवन प्रत्याशा में वृद्धि तभी सार्थक है जब जीवन की गुणवत्ता भी बेहतर हो।” यह दृष्टिकोण भारतीय संविधान में निहित “जीवन के अधिकार” की व्यापक व्याख्या को पुष्ट करता है, जिसमें सुरक्षित और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता एक मौलिक तत्व है।

समस्या का बहुआयामी स्वरूप

खाद्य मिलावट केवल एक तकनीकी या नियामकीय समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और व्यवहारिक कारकों से जुड़ा जटिल मुद्दा है। बैठक में यह तथ्य सामने आया कि मिलावटी खाद्य पदार्थों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अक्सर वर्षों तक लंबित रहती है। कई मामलों में 10-15 वर्ष पुराने नमूनों पर आधारित मुकदमे आज भी चल रहे हैं, जिससे न्यायिक निष्पादन की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठते हैं।

एनएचआरसी के सदस्य बिद्युत रंजन सारंगी ने कृषि स्तर पर अत्यधिक कीटनाशक उपयोग को गंभीर चिंता का विषय बताया। यह संकेत करता है कि समस्या की जड़ उत्पादन प्रणाली में ही निहित है, न कि केवल बाजार या वितरण स्तर पर।

संवेदनशील समूहों पर प्रभाव

एनएचआरसी के महासचिव भरत लाल ने खाद्य मिलावट के प्रभाव को विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों के संदर्भ में रेखांकित किया। उनके अनुसार, एक बार जब मिलावटी उत्पाद आपूर्ति श्रृंखला में प्रवेश कर जाते हैं, तो उन्हें नियंत्रित करना लगभग असंभव हो जाता है। यह स्थिति सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के लिए गंभीर चुनौती प्रस्तुत करती है।

संस्थागत प्रयास और चुनौतियाँ

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के सीईओ राजित पुन्हानी ने खाद्य विक्रेताओं के पंजीकरण और लाइसेंसिंग प्रक्रिया को सरल बनाने के प्रयासों का उल्लेख किया। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राज्यों में निरीक्षण और निगरानी तंत्र में रिक्त पदों की समस्या प्रभावशीलता को सीमित करती है।

यह स्पष्ट है कि नियामकीय ढांचा मौजूद होने के बावजूद उसका क्रियान्वयन एक बड़ी बाधा बना हुआ है। निरीक्षण तंत्र, प्रयोगशालाओं की गुणवत्ता, और डेटा पारदर्शिता जैसे मुद्दे अभी भी सुधार की मांग करते हैं।

नीति और व्यवहार के बीच अंतर

बैठक में यह भी सामने आया कि उपभोक्ताओं की उदासीनता इस समस्या को और जटिल बनाती है। जब तक नागरिक स्वयं खाद्य सुरक्षा के प्रति जागरूक और सक्रिय नहीं होंगे, तब तक केवल सरकारी हस्तक्षेप पर्याप्त नहीं होगा।

श्रीमती विजया भारती सयानी ने बहुस्तरीय टास्क फोर्स, मोबाइल परीक्षण प्रयोगशालाओं और 24×7 हेल्पलाइन जैसी व्यावहारिक पहल सुझाईं। ये सुझाव संकेत करते हैं कि समस्या के समाधान के लिए विकेंद्रीकृत और त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली आवश्यक है।

तकनीकी और संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता

विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत सुझावों में कुछ प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आए:

  • खाद्य उत्पादों के संपूर्ण जीवनचक्र की वैज्ञानिक निगरानी
  • जैव निगरानी (Bio-monitoring) और एआई आधारित परीक्षण उपकरणों का विकास
  • स्कूल और कॉलेज स्तर पर खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं का उपयोग
  • खाद्य सुरक्षा डेटा और निरीक्षण रिपोर्ट की सार्वजनिक उपलब्धता
  • केंद्रीय समन्वय निकाय की स्थापना

आईआईटी दिल्ली की डॉ. ऋचा कुमार ने खेत स्तर पर निगरानी की आवश्यकता पर बल देते हुए रासायनिक मिलावट और कीटनाशकों पर कठोर नियंत्रण की मांग की। यह दृष्टिकोण “फार्म-टू-फोर्क” (Farm-to-Fork) रणनीति की ओर संकेत करता है।

शिक्षा और जागरूकता: दीर्घकालिक समाधान

विद्यालय शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की पहल के तहत खाद्य सुरक्षा को पाठ्यक्रम में शामिल करने और प्रयोगशालाओं के उपयोग का सुझाव एक दीर्घकालिक समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे न केवल जागरूकता बढ़ेगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियाँ अधिक जिम्मेदार उपभोक्ता बन सकेंगी।

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