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सोशल मीडिया की सच्चाई और हमारी जिम्मेदारी

आज का युग सूचना-क्रांति का युग है, जहाँ खबरें अखबारों की सीमाओं से निकलकर सोशल मीडिया के तेज़ बहाव में बह रही हैं। एक क्लिक में लाखों लोगों तक पहुँचने वाली जानकारी, जितनी शक्तिशाली है, उतनी ही खतरनाक भी हो सकती है।

Facebook, WhatsApp, X (पूर्व Twitter) जैसे प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नई ऊँचाइयाँ दी हैं, परंतु इसके साथ ही अधूरी, भ्रामक और उद्देश्यपूर्ण सूचनाओं का प्रसार भी चिंताजनक स्तर तक बढ़ा है।

आज स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति बिना तथ्य-जांच के कोई भी पोस्ट साझा कर देता है, और देखते ही देखते वह “सत्य” का रूप ले लेती है। शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया पर बड़ी मात्रा में सामग्री निजी दायरे में साझा होती है, जो सार्वजनिक निगरानी से बाहर रहती है और सत्यापन को और कठिन बना देती है। और यही वह बिंदु है जहाँ से समस्या गंभीर होती है। अफवाहें जनमानस को भ्रमित करती हैं।‌ सामाजिक तनाव को बढ़ाती हैं और कभी-कभी कानून-व्यवस्था तक प्रभावित कर देती हैं। विशेषज्ञों ने यह भी पाया है कि सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार एक संगठित रूप ले चुका है, जिससे आर्थिक लाभ और सामाजिक प्रभाव दोनों साधे जाते हैं।

ऐसे में सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया गलत है बल्कि सवाल यह है कि हम उसका उपयोग कैसे कर रहे हैं। इस पर हमारी जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए?- किसी भी पोस्ट को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच करें भावनात्मक या उकसाने वाली खबरों से सावधान रहें।विश्वसनीय स्रोतों पर ही विश्वास करें। समाज में सकारात्मक और रचनात्मक सामग्री को बढ़ावा दें।

हम सबको यह समझना जरूरी है कि सोशल मीडिया एक दर्पण है।‌ यह वही दिखाता है जो हम उसमें डालते हैं। यदि हम जिम्मेदारी से इसका उपयोग करें, तो यह समाज को जागरूक और सशक्त बना सकता है; अन्यथा यह भ्रम और विभाजन का कारण भी बन सकता है।आवश्यकता है कि हम केवल “उपभोक्ता” नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनकर सोशल मीडिया का उपयोग करें।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
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