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पुस्तकें हैं जीवन का दीप, समाधान का सेतु

-विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस, 23 अप्रैल 2026-

हर वर्ष 23 अप्रैल को समूचा विश्व ज्ञान, सृजनशीलता और मानवीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर पुस्तकों का उत्सव मनाता है। यूनेस्को द्वारा 1995 में प्रारंभ किया गया यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि लेखकों के सम्मान, सृजनाधिकार की रक्षा और पठन संस्कृति के संवर्धन का वैश्विक संकल्प है। इस तिथि का चयन भी अत्यंत अर्थपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन विलियम शेक्सपियर और मिगुएल डी सर्वांटेस जैसे महान साहित्यकारों का अवसान हुआ, जिनकी रचनाओं ने मानव सभ्यता को नई दिशा दी। वर्ष 2026 में इस दिवस का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति अपनी रुचियों के अनुसार पढ़े और पठन को आनंदमय अनुभव बनाए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि पढ़ने को बोझ नहीं, बल्कि आत्मविकास और आत्मानंद का माध्यम माना जाए। इसी क्रम में मोरक्को की राजधानी रबात को वर्ष 2026 के लिए विश्व पुस्तक राजधानी घोषित किया गया है, जो इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पुस्तक संस्कृति किसी एक देश की नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा धरोहर है। पुस्तकें केवल कागज और शब्दों का संयोजन नहीं होतीं, वे जीवन का साक्षात अनुभव कराती हैं। वे समय, समाज और संवेदनाओं का जीवंत इतिहास होती हैं। महान कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि उच्च शिक्षा केवल जानकारी प्रदान नहीं करती, बल्कि जीवन को संतुलित और शांतिपूर्ण बनाती है।

यही कार्य पुस्तकें करती हैं, वे मनुष्य के भीतर विवेक, करुणा और सहिष्णुता का विकास करती हैं। संकट के समय में पुस्तकें सच्चे मित्र की तरह साथ निभाती हैं, यह तथ्य वैश्विक महामारी के दौर में स्पष्ट रूप से देखने को मिला, जब लोगों ने अकेलेपन और अनिश्चितता के बीच पुस्तकों में ही आश्रय पाया। भारत में पुस्तक संस्कृति का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों ने न केवल भारतीय समाज को दिशा दी, बल्कि समूचे विश्व को ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय ज्ञान के ऐसे केंद्र थे, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर लिखी गई पांडुलिपियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा। यह परंपरा केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और दर्शन के विविध आयाम समाहित थे।

जीवन के अंधकारमय क्षणों में पुस्तकें सचमुच एक दीपक की तरह मार्ग को प्रकाशित करती हैं। जब मनुष्य समस्याओं, तनाव और द्वंद्व से घिर जाता है, तब पुस्तकें उसे नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। वे केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में उसकी चेतना को जागृत करती हैं। पुस्तकें हमें यह सिखाती हैं कि हर समस्या का समाधान बाहर नहीं, भीतर की समझ और दृष्टि में छिपा होता है। चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने भी कहा था कि “अज्ञानता मन का अंधकार है और ज्ञान ही उसका प्रकाश।” इसी प्रकार महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने जीवन की सरलता और संतुलन पर बल देते हुए बताया कि सच्चा ज्ञान वही है जो मन को शांत और संतुलित बनाए।

पुस्तकें इसी संतुलन की साधना कराती हैं-वे हमें सोचने, समझने और धैर्यपूर्वक निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती हैं। आधुनिक भारत में भी पुस्तक संस्कृति को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित सर्वोदय साहित्य भंडार तथा आचार्य तुलसी द्वारा स्थापित आदर्श साहित्य संघ जैसे संस्थानों ने नैतिक और प्रेरणादायक साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों का संवर्धन भी रहा है। वर्तमान समय में जब तकनीकी साधनों का विस्तार हुआ है, तब भी पुस्तकों की उपयोगिता और महत्ता में कोई कमी नहीं आई है। यद्यपि अध्ययन के अनेक नए माध्यम विकसित हुए हैं, फिर भी मुद्रित पुस्तकों का आत्मीय स्पर्श और उनकी गहराई अद्वितीय है। पुस्तकें मनुष्य के विचारों को विस्तार देती हैं, उसे सही और गलत का बोध कराती हैं तथा जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।

भारत में पुस्तक संस्कृति को प्रोत्साहित करने में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कई उल्लेखनीय पहलें हुई हैं। उन्होंने उपहार के रूप में पुष्पगुच्छ के स्थान पर पुस्तक देने का संदेश देकर समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान की भावना को प्रबल किया है। इसके साथ ही देशभर में पठन-पाठन और पुस्तकालयों के विकास को लेकर विभिन्न अभियान चलाए गए हैं, जिनका उद्देश्य युवाओं में अध्ययन के प्रति रुचि जागृत करना है। यह प्रयास केवल साक्षरता बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और सशक्त समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। महान वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि एक अच्छी पुस्तक अनेक मित्रों के समान होती है।

वास्तव में पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास में अत्यंत सहायक होती हैं। वे व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं, समाज की विसंगतियों को समझने का दृष्टिकोण देती हैं और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। प्रसिद्ध लेखिका टोनी मोरिसन का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि यदि वह पुस्तक उपलब्ध नहीं है जिसे आप पढ़ना चाहते हैं, तो आपको स्वयं उसे लिखना चाहिए। यह विचार सृजनशीलता और आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करता है। आज के त्वरित सूचना युग में जब ध्यान भटकाने वाले साधनों की भरमार है, तब गहन अध्ययन और मनन की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। पुस्तकें ही वह माध्यम हैं जो मनुष्य को एकाग्रता, धैर्य और गहराई प्रदान करती हैं। वे केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि जीवन को दिशा देती हैं और व्यक्ति को बेहतर मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करती हैं।

पुस्तकें मानसिक शांति और भावनात्मक स्थिरता का आधार भी हैं। जब जीवन की भागदौड़ मन को विचलित करती है, तब एक अच्छी पुस्तक ध्यान के समान कार्य करती है, जो मन को एकाग्र और शांत बनाती है। महान चीनी चिंतक मेन्शियस ने कहा था कि मनुष्य का स्वभाव मूलतः शुभ होता है, उसे केवल सही दिशा की आवश्यकता होती है। पुस्तकें वही दिशा प्रदान करती हैं। वे अकेलेपन में सच्चा साथी बनती हैं, दुःख में सहारा देती हैं और निराशा में आशा का संचार करती हैं। पुस्तक के माध्यम से हम अनेक महापुरुषों के अनुभवों से जुड़ते हैं, उनके संघर्षों को समझते हैं और अपने जीवन के लिए प्रेरणा प्राप्त करते हैं। वास्तव में पुस्तकें जीवन-निर्माण का कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। उनकी छाया में बैठकर मनुष्य ज्ञान, विवेक, शांति और समाधान सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वे हमारे भीतर ऐसी मानसिकता का विकास करती हैं, जिसमें हम हर परिस्थिति में समाधान खोजने लगते हैं। पुस्तकें हमारे विचारों को व्यापक बनाती हैं, हमारी संवेदनाओं को परिष्कृत करती हैं और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में अग्रसर करती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि पुस्तकें केवल जीवन को प्रकाशित ही नहीं करतीं, बल्कि उसे सार्थक, संतुलित और समृद्ध भी बनाती हैं।

विश्व पुस्तक दिवस मनाते हुए यह स्पष्ट है कि पुस्तकें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आधारशिला हैं। वे समाज में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं। ऐसा परिवर्तन जो किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से उत्पन्न होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम पुस्तक संस्कृति को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं, घर-घर में अध्ययन का वातावरण निर्मित करें और आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के इस अमूल्य स्रोत से जोड़ें। विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस हमें यही प्रेरणा देता है कि हम पढ़ने की आदत को विकसित करें, पुस्तकों के प्रति सम्मान की भावना को जागृत करें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जो ज्ञान, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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