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हिंदी साहित्य और समाज को समृद्ध करता अणुव्रत का आंदोलन

‘अणुव्रत’ पत्रिका का अक्टूबर–नवंबर, 2025 का अंक ‘तुलसी सिंहनाद विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। 486 पृष्ठों के विस्तृत कलेवर में प्रकाशित यह एक साहित्यिक अंक नहीं, बल्कि एक सशक्त नैतिक दस्तावेज के रूप में सामने आता है। संपादक संचय जैन और सह-संपादक मोहन मंगलम के कुशल संपादन में प्रकाशित यह विशेषांक अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी (अणुविभा), राजसमंद द्वारा प्रकाशित होकर अपने उद्देश्य, दृष्टि और सामग्री की व्यापकता के कारण विशेष रूप से उल्लेखनीय बन पड़ा है। चार सौ रुपये मूल्य का यह अंक अपने विषय-विन्यास और वैचारिक समृद्धि के कारण संग्रहणीय और अध्ययन योग्य है।

इस विशेषांक को बार-बार पढ़ने पर यह अनुभव होता है कि यह मात्र लेखों, संस्मरणों और विचारों का संकलन नहीं, बल्कि एक जीवंत आंदोलन की धड़कन है, जो हिंदी साहित्य के माध्यम से समाज को दिशा देने का कार्य कर रहा है। ‘अणुव्रत’ पत्रिका के प्रति आकर्षण का मूल कारण भी यही है कि यह संयम, अनुशासन, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व जैसे मूल्यों को केंद्र में रखती है। यह केवल विचार नहीं देती, बल्कि जीवन-शैली का संकेत भी करती है। विशेष रूप से आचार्य तुलसी का गीत ‘संयममय जीवन हो’ इस पूरे अंक की आत्मा के रूप में अनुभव होता है, जो पाठक के भीतर एक नैतिक संवेदना को जागृत करता है।

अंक का प्रारंभ वर्ष 1955 में प्रकाशित ‘अणुव्रत’ पत्रिका के प्रवेशांक के उस पावन संदेश से होता है, जिसमें अहिंसा, समता, सौजन्य और सद्भावना की स्थापना का संकल्प व्यक्त किया गया है। यह संदेश न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि आज भी उतना ही प्रासंगिक प्रतीत होता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि अणुव्रत आंदोलन का मूल उद्देश्य जन-जन के जीवन में नैतिकता और अहिंसा को स्थापित करना है। यह उद्घाटन पूरे विशेषांक की वैचारिक दिशा निर्धारित करता है और पाठक को एक गंभीर चिंतन की भूमि पर ले जाता है।

यह विशेषांक आचार्य तुलसी के जीवन-दर्शन और उनके द्वारा प्रवर्तित ‘अणुव्रत’ आंदोलन को केंद्र में रखकर रचा गया है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल घटनाओं का विवरण नहीं देता, बल्कि उन घटनाओं के भीतर निहित विचार और दर्शन को भी सामने लाता है। अणुव्रत दर्शन के विविध आयामों को जिस क्रमबद्धता और विस्तार के साथ प्रस्तुत किया गया है, वह पाठक को केवल जानकारी नहीं देता, बल्कि आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है।

विशेषांक का मूल स्वर यह स्थापित करता है कि आज के अशांत और मूल्यहीन होते विश्व में शांति का मार्ग बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के अंतर्मन से होकर जाता है। अणुव्रत इसी अंतःशुद्धि का व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करता है। छोटे-छोटे नैतिक संकल्पों के माध्यम से बड़े सामाजिक परिवर्तन की परिकल्पना इस दर्शन की केंद्रीय विशेषता है। यह विचार विशेष रूप से प्रभावी तब लगता है, जब इसे बीसवीं शताब्दी के हिंसक परिवेश और वर्तमान वैश्विक संकटों के संदर्भ में देखा जाए। आज जब पश्चिमी देश युद्ध की विभीषिका से जूझ रहे हैं, तब अणुव्रत के विचार आवर प्रासंगिक हो जाते हैं।

इस अंक की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि यह धर्म को संप्रदायिक सीमाओं से मुक्त कर जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करता है। महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के आदर्शों की स्पष्ट प्रतिध्वनि इसमें सुनाई देती है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अणुव्रत भारतीय नैतिक परंपरा का आधुनिक और व्यावहारिक रूप है। धर्म को आचरण से जोड़ने की यह दृष्टि विशेषांक को व्यापक और समावेशी बनाती है।

अणुव्रत आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति इसकी सरलता और व्यवहारिकता है। यह विशेषांक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करता है कि यह आंदोलन किसी जटिल दार्शनिक विमर्श पर नहीं, बल्कि सहज जीवन-शैली पर आधारित है। नशामुक्ति, सामाजिक कुप्रथाओं का उन्मूलन, धार्मिक सहिष्णुता, पर्यावरण-संवेदनशीलता और संयमित उपभोग जैसे विषयों को जिस सहजता से प्रस्तुत किया गया है, वह इसे आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक बनाता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी, ग्रामीण समाज और सामान्य जन के लिए दिए गए सूत्र इसे एक सक्रिय सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।

इस विशेषांक का एक और उल्लेखनीय पक्ष इसका वैचारिक विस्तार है। इसमें अणुव्रत को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित न रखकर लोकतंत्र, शिक्षा, विदेश नीति और वैश्विक शांति जैसे व्यापक विषयों से जोड़ा गया है। यह दृष्टि इसे एक समग्र मानवीय दर्शन का स्वरूप प्रदान करती है। लोकतंत्र के संदर्भ में अधिकारों और कर्तव्यों के संतुलन पर दिया गया बल विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जो आज के राजनीतिक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक प्रतीत होता है।

‘तुलसी स्मृति’ खंड इस विशेषांक को भावात्मक और आत्मीय ऊँचाई प्रदान करता है। इसमें आचार्य महाश्रमण, आचार्य महाप्रज्ञ और कनकप्रभा जैसे विद्वानों के उद्गार आचार्य तुलसी के व्यक्तित्व के विविध आयामों को उजागर करते हैं। ये लेख केवल श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा के साक्ष्य हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि आचार्य तुलसी का प्रभाव आज भी उतना ही जीवंत है। भाषा और शैली की दृष्टि से यह विशेषांक अत्यंत सुसंस्कृत, प्रवाहमयी और प्रभावोत्पादक है। इसमें विचारों की गंभीरता और भावों की आत्मीयता का सुंदर संतुलन दिखाई देता है। कहीं भी अनावश्यक जटिलता नहीं है, बल्कि सरलता के भीतर गहनता का समावेश है, जो इसे व्यापक पाठक-वर्ग के लिए सुलभ बनाता है।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि ‘अणुव्रत’ पत्रिका का यह ‘तुलसी सिंहनाद विशेषांक’ एक ऐसा महत्वपूर्ण और प्रेरणास्पद प्रकाशन है, जो हिंदी साहित्य को समृद्ध करते हुए समाज में नैतिक चेतना का संचार करता है। यह विशेषांक अतीत की स्मृतियों, वर्तमान की चुनौतियों और भविष्य की संभावनाओं को एक सूत्र में पिरोता है। आज जब समाज मूल्य-संकट के दौर से गुजर रहा है, तब यह अंक एक मार्गदर्शक दीप की तरह सामने आया है और यह विश्वास जगाता है कि छोटे-छोटे नैतिक संकल्पों के माध्यम से भी एक बेहतर और संतुलित समाज की रचना संभव है।

  • पत्रिका का नाम : अणुव्रत (तुलसी सिंहनाद विशेषांक)
  • अंक : अक्टूबर-नवंबर,2025
  • संपादक : संचय जैन
  • सह संपादक : मोहन मंगलम
  • प्रकाशक- अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी (अणुविभा)
  • राजसमन्द (राज.)-313324
  • इस अंक का मूल्य : 400 रुपयेपृष्ठ संख्या : 486
डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
डॉ. उमेशचन्द्र सिरसवारी
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