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मां के मातृत्व भाव से ही संतान का कल्याण

 “गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमं गुरुः”भारतीय दर्शन की यह उक्ति माँ के सर्वोच्च स्थान को स्पष्ट करती है। सृष्टि के सृजन में जहाँ ब्रह्मा को रचयिता माना गया है, वहीं जीवन को जन्म देने, संवारने और संस्कारित करने का अद्वितीय दायित्व माँ को प्राप्त हुआ है। माँ केवल जन्मदात्री नहीं होती, वह अपने संपूर्ण अस्तित्व को मातृत्व में विलीन कर देती है। उसका जीवन, उसकी इच्छाएँ, उसके सपने—सब कुछ संतान के इर्द-गिर्द सिमट जाता है। अपने सुख, आराम और आकांक्षाओं का त्याग कर संतान के भविष्य को संवारना ही मातृत्व का वास्तविक स्वरूप है।

कहा जाता है कि संसार के मोह-माया से विरक्त होकर मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख हो सकता है, लेकिन एक माँ कभी नहीं। इतिहास और परंपराएँ इस सत्य की साक्षी हैं। गौतम बुद्ध ने जहाँ वैराग्य के मार्ग को अपनाया, वहीं यशोधरा ने मातृत्व के दायित्व को निभाते हुए अपने पुत्र का लालन-पालन किया। यह उदाहरण दर्शाता है कि मातृत्व त्याग का नहीं, बल्कि समर्पण का दूसरा नाम है।

माँ के भीतर अपार धैर्य, करुणा और त्याग की भावना निहित होती है। वह संतान के लिए हर कष्ट सहने को तत्पर रहती है—गर्भधारण से लेकर उसके पालन-पोषण और चरित्र निर्माण तक, माँ का योगदान अतुलनीय होता है। वह केवल शरीर ही नहीं, बल्कि विचार और संस्कार भी गढ़ती है। इतिहास साक्षी है कि महान व्यक्तित्वों के निर्माण में उनकी माताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। चाहे वे  महाराणा प्रताप हों, शिवाजी हों या नेपोलियन बोनापार्ट इन सभी के जीवन में उनकी माताओं के संस्कारों की गहरी छाप दिखाई देती है।

नेपोलियन बोनापार्ट का प्रसिद्ध कथन है—

“तुम मुझे योग्य माताएँ दो, मैं तुम्हें सुदृढ़ राष्ट्र दूँगा।”

यह कथन इस सत्य को रेखांकित करता है कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला माँ ही रखती है। वह अपने बच्चों को केवल शिक्षित ही नहीं करती, बल्कि उनमें नैतिकता, साहस और देशप्रेम के संस्कार भी रोपित करती है। माँ का हृदय करुणा का सागर होता है। वह परिवार के हर सदस्य के दुख-दर्द को अपने भीतर समेट लेती है। पति के कष्ट में भी उसके भीतर की माँ जागृत हो उठती है और वह हर परिस्थिति में परिवार के कल्याण के लिए समर्पित रहती है।

वास्तव में, माँ केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक भावना है—एक ऐसी शक्ति, जो सृष्टि को निरंतर आगे बढ़ाती है। जिस समाज और राष्ट्र की माताएँ शिक्षित, संस्कारित और जागरूक होती हैं, वह समाज सदैव उन्नति के पथ पर अग्रसर रहता है।

मदर्स डे केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि माँ के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि माँ के त्याग, प्रेम और संस्कार ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं। माँ के चरणों में ही स्वर्ग का वास है। और सच तो यह है कि “माँ ही जीवन की पहली गुरु, पहली मित्र और पहली प्रेरणा होती है।”

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”

     

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