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संगीत जो आत्मा की भाषा और भारतीय संस्कृति की अनश्वर धड़कन है

21 जून विश्व संगीत दिवस पर विशेष

संगीत केवल सुरों का उत्सव नहीं, बल्कि मानव आत्मा की सबसे कोमल और सार्वभौमिक अभिव्यक्ति का पर्व है। संगीत वह शक्ति है जो भाषा, धर्म, सीमाएँ और संस्कृतियों की दीवारों को पार कर सीधे मनुष्य के हृदय तक पहुँचती है। जब शब्द मौन हो जाते हैं, तब सुर बोलते हैं; जब मन टूटता है, तब संगीत उसे सहलाता है; और जब जीवन थक जाता है, तब कोई मधुर धुन भीतर नई ऊर्जा जगा देती है। मानव सभ्यता के प्रारंभ से ही संगीत जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।

प्रकृति की ध्वनियों- बहती नदियों, वर्षा की रिमझिम, पक्षियों के कलरव और हवा की सरसराहट -से ही संगीत का जन्म माना जाता है। भारतीय दर्शन में संगीत को केवल कला नहीं, बल्कि साधना और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम माना गया है। हमारे यहाँ कहा गया है- “नाद ही ब्रह्म है।” अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि ध्वनि और स्पंदन से निर्मित है। भारत की संगीत परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में गिनी जाती है। सामवेद को भारतीय संगीत का मूल स्रोत माना जाता है। वैदिक ऋचाओं के उच्चारण से लेकर शास्त्रीय रागों तक, भारतीय संगीत ने हजारों वर्षों की यात्रा में अध्यात्म, संस्कृति और लोकजीवन को गहराई से प्रभावित किया है।

भारतीय संगीत मुख्यतः दो प्रमुख धाराओं में विकसित हुआ- हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत और कर्नाटक संगीत। उत्तर भारत में विकसित हिंदुस्तानी संगीत में ध्रुपद, खयाल, ठुमरी, टप्पा और ग़ज़ल जैसी विधाओं ने विशेष पहचान बनाई। वहीं दक्षिण भारत का कर्नाटक संगीत अपनी गहन रागात्मकता और आध्यात्मिकता के लिए प्रसिद्ध है। तानसेन, पंडित भीमसेन जोशी, एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी, लता मंगेशकर और पंडित रविशंकर जैसे महान कलाकारों ने भारतीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई।

भारत में संगीत केवल मंचीय कला नहीं, बल्कि जीवन का संस्कार है। जन्म से लेकर विवाह और धार्मिक अनुष्ठानों तक, हर अवसर पर संगीत की उपस्थिति दिखाई देती है। लोकगीतों में मिट्टी की खुशबू और जनजीवन की संवेदनाएँ बसती हैं। छत्तीसगढ़ के सुआ गीत, पंथी, करमा, ददरिया और राउत नाचा जैसे लोकसंगीत आज भी ग्रामीण संस्कृति की आत्मा बने हुए हैं। राजस्थान के मांड, बंगाल के बाउल, पंजाब के लोकगीत और उत्तरप्रदेश की बिरहा परंपरा भारतीय विविधता की मधुर पहचान हैं।

संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उपचार भी है। आधुनिक शोध बताते हैं कि मधुर संगीत मानसिक तनाव को कम करता है, स्मरण शक्ति को बढ़ाता है और मनुष्य के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। भारतीय संगीत चिकित्सा पद्धति में रागों के माध्यम से मानसिक शांति और स्वास्थ्य सुधार के प्रयास भी किए जाते रहे हैं। आज का समय डिजिटल और तेज़ गति का समय है। तकनीक ने संगीत को वैश्विक पहुँच दी है, लेकिन साथ ही बाज़ारवाद ने संगीत की आत्मा को भी प्रभावित किया है। त्वरित लोकप्रियता की होड़ में कई बार शब्दों की गहराई और सुरों की साधना पीछे छूटती दिखाई देती है। फिर भी सच्चा संगीत वही है जो मनुष्य को भीतर से संवेदनशील बनाए, जीवन में सौंदर्य और करुणा का संचार करे।

नई पीढ़ी को भारतीय संगीत की जड़ों से जोड़ना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संगीत शिक्षा को महत्व देना, लोककलाओं को संरक्षण देना और युवा कलाकारों को मंच उपलब्ध कराना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। क्योंकि जिस समाज में संगीत जीवित रहता है, वहाँ संवेदनाएँ जीवित रहती हैं। विश्व संगीत दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि संगीत केवल ध्वनि नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा है। यह मनुष्य को मनुष्य से, संस्कृति को संस्कृति से और हृदय को ईश्वर से जोड़ने वाला सबसे मधुर सेतु है। युद्ध, हिंसा और तनाव से भरी दुनिया में संगीत ही वह शक्ति है जो प्रेम, शांति और मानवता की रोशनी को जीवित रख सकती है।

जब थक जाए मन जीवन की भागती राहों में,
सुर बनकर उतरता संगीत मौन निगाहों में।
रागों की छाया में मिलती आत्मा को प्रीत,
ईश्वर की सबसे मधुर आवाज़ का नाम है संगीत।।

सुरेश सिंह बैस "शाश्वत"
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