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बहनः संस्कृति, संवेदना और सशक्त भारत की आधारशिला

राष्ट्रीय बहन दिवस, 2 अगस्त 2026 और ‘बेटी तेरापंथ की सम्मेलन’ पर विशेष


रिश्तों की दुनिया में यदि कोई संबंध निस्वार्थ प्रेम, आत्मीयता, विश्वास, त्याग और आजीवन साथ का सबसे सुंदर उदाहरण है, तो वह बहन का रिश्ता है। बहन केवल परिवार की सदस्य नहीं होती, वह घर की संवेदना, संस्कारों की संरक्षिका, परिवार की आत्मा और समाज की मानवीय चेतना की वाहक होती है। राष्ट्रीय बहन दिवस इसी अनुपम रिश्ते के सम्मान, उसकी गरिमा और उसके जीवनदायी योगदान को स्मरण करने का अवसर है। प्रत्येक वर्ष अगस्त के प्रथम रविवार को मनाया जाने वाला यह दिवस हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि यदि परिवारों में बहनों का स्नेह और संस्कार जीवित रहेंगे, तभी समाज में समरसता और राष्ट्र में मानवीय मूल्यों की धारा प्रवाहित होती रहेगी।

आज जब भौतिकता, प्रतिस्पर्धा और आत्मकेंद्रित जीवनशैली रिश्तों की ऊष्मा को चुनौती दे रही है, तब राष्ट्रीय बहन दिवस केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस अमूल्य परंपरा का पुनर्स्मरण है, जहाँ नारी को परिवार की धुरी, संस्कृति की संवाहिका और भविष्य की निर्माता माना गया है। बहन का व्यक्तित्व केवल अपने भाई या परिवार तक सीमित नहीं रहता, वह आने वाली पीढ़ियों के संस्कारों का निर्माण करती है। उसके व्यक्तित्व में करुणा, सहनशीलता, सेवा, संयम और समर्पण जैसे गुण समाज को मानवीय बनाते हैं।  इसी व्यापक दृष्टि को साकार करने की दिशा में जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा द्वारा 1 अगस्त 2026 को जैन विश्व भारती, लाडनूं में राष्ट्रसंत आचार्य श्री महाश्रमणजी की मंगल सन्निधि में आयोजित ‘बेटी तेरापंथ की’ चौथा राष्ट्रीय सम्मेलन एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायी अध्याय बनकर उभरा। राष्ट्रीय बहन दिवस की भावना के अनुरूप आयोजित यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि नारी चेतना, बहन संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों के पुनर्जागरण का सशक्त अभियान था।

देश के विभिन्न राज्यों से हजारों बेटियों और बहनों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय नारी केवल परिवर्तन की साक्षी नहीं, बल्कि परिवर्तन की सबसे बड़ी वाहक है। सम्मेलन में उपस्थित प्रत्येक बेटी और बहन अपने साथ केवल उत्साह नहीं लाई थी, बल्कि संस्कार, सेवा, नेतृत्व और सामाजिक उत्तरदायित्व का एक नया संकल्प लेकर आई थी। यह दृश्य भारतीय संस्कृति के उस उज्ज्वल भविष्य का संकेत था, जिसमें नारी केवल सम्मान की पात्र नहीं, बल्कि समाज-निर्माण की सक्रिय भागीदार है। इस सम्मेलन की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि यहाँ नारी सशक्तिकरण को केवल अधिकारों की भाषा में नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, संस्कार, नेतृत्व और आध्यात्मिक चेतना के साथ जोड़ा गया। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए यह संदेश दिया गया कि वास्तविक सशक्तिकरण वही है जो व्यक्ति को आत्मविश्वासी बनाए, परिवार को सुदृढ़ करे, समाज को संगठित करे और राष्ट्र को ऊँचाइयों तक ले जाए।

राष्ट्रसंत आचार्य श्री महाश्रमणजी के प्रेरणादायी सान्निध्य ने इस सम्मेलन को आध्यात्मिक ऊँचाई प्रदान की। आचार्यश्री का संपूर्ण जीवन नारी गरिमा, नैतिक मूल्यों, शिक्षा, आत्मानुशासन और मानवीय चेतना के विकास के लिए समर्पित रहा है। उनके मार्गदर्शन में चल रहे अनेक कार्यक्रमों ने समाज में यह विश्वास जगाया है कि नारी केवल घर की शक्ति नहीं, बल्कि राष्ट्र के चरित्र निर्माण की आधारशिला है। उनके संदेशों में बार-बार यह भाव उभरता है कि यदि नारी शिक्षित, संस्कारित, आत्मविश्वासी और मूल्यनिष्ठ होगी तो परिवार, समाज और राष्ट्र स्वयं सुदृढ़ बन जाएगा। इस अवसर पर जैन श्वेताम्बर तेरापंथी महासभा के अध्यक्ष श्री महेंद्र नाहटा ने अत्यंत सारगर्भित विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ‘नारी के बिना राष्ट्र की प्रगति अधूरी है। जिस समाज ने अपनी बेटियों और बहनों को अवसर, सम्मान और संस्कार दिए हैं, वही समाज स्थायी विकास की दिशा में आगे बढ़ा है। आचार्य श्री महाश्रमणजी के मार्गदर्शन में चल रहे नारी उत्थान के विविध कार्यक्रम केवल महिलाओं को सशक्त नहीं बना रहे, बल्कि पूरे समाज में नैतिक जागरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का आधार बन रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि ‘बेटी तेरापंथ की’ केवल एक सम्मेलन नहीं, बल्कि ऐसी वैचारिक यात्रा है जो बेटियों और बहनों को आत्मगौरव, नेतृत्व, सेवा और संस्कार के माध्यम से राष्ट्र निर्माण की मुख्यधारा से जोड़ रही है।


वास्तव में भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है और भारतीय संस्कृति का सबसे सुंदर स्वरूप उसके पारिवारिक संबंधों में दिखाई देता है। बहन का रिश्ता केवल राखी के धागे तक सीमित नहीं है, वह विश्वास, सहयोग, प्रेरणा और नैतिक शक्ति का ऐसा सूत्र है जो परिवारों को टूटने नहीं देता। यदि हर बेटी अपने संस्कारों से एक परिवार को प्रकाशित करती है, तो हर बहन अपने व्यवहार से समाज में संवेदनाओं का विस्तार करती है। आज आवश्यकता केवल महिलाओं को अवसर देने की नहीं, बल्कि उन्हें निर्णय प्रक्रिया, सामाजिक नेतृत्व, सांस्कृतिक संरक्षण और राष्ट्रीय विकास के केंद्र में स्थापित करने की है। जब बेटियां शिक्षा, संस्कार, आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिक दृष्टि से समृद्ध होंगी, तभी भारत विश्वगुरु बनने की अपनी कल्पना को वास्तविकता में बदल सकेगा। आर्थिक विकास महत्वपूर्ण है, परंतु नैतिक विकास उसके बिना अधूरा है। और इस नैतिक विकास की सबसे बड़ी वाहक हमारी बेटियां और बहनें ही हैं।
राष्ट्रीय बहन दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि हम बहनों को केवल शुभकामनाएँ देकर अपने दायित्व की इतिश्री न समझें, बल्कि उन्हें शिक्षा, सम्मान, समान अवसर, सुरक्षा और नेतृत्व के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करें। परिवारों में बेटियों को निर्णय लेने का अवसर मिले, समाज में उनकी प्रतिभा को मंच मिले और राष्ट्र उन्हें विकास की साझेदार बनाएकृयही इस दिवस की सार्थकता है। ‘बेटी तेरापंथ की’ सम्मेलन ने यह सिद्ध कर दिया कि जब धार्मिक संस्कार, सामाजिक चेतना और आधुनिक नेतृत्व एक साथ चलते हैं, तब परिवर्तन केवल विचारों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह जीवन का आंदोलन बन जाता है। यह सम्मेलन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा और यह संदेश देता रहेगा कि बहन केवल रिश्ते का नाम नहीं, बल्कि संस्कृति की सबसे सशक्त प्रतिनिधि है।
भारतीय संस्कृति में बहन केवल एक पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि स्नेह, त्याग, मर्यादा, ममता और मंगलकामना की सजीव प्रतिमूर्ति मानी गई है। उसे घर की लक्ष्मी, कुल की गरिमा, संस्कारों की वाहक, प्रेम की पावन धारा और परिवार की आत्मीय शक्ति के रूप में सम्मानित किया गया है। बहन का स्नेह निःस्वार्थ होता है, उसका आशीर्वाद अमूल्य होता है और उसका विश्वास जीवन के कठिनतम क्षणों में भी संबल प्रदान करता है। वह भाई के जीवन में प्रेरणा, संवेदना, करुणा और आत्मीयता का ऐसा स्रोत है, जो रिश्तों को केवल रक्त से नहीं, बल्कि हृदय के अटूट बंधन से जोड़ता है। भारतीय परंपरा में बहन को शुभता, सौभाग्य, वात्सल्य और संरक्षण का प्रतीक माना गया है। रक्षाबंधन एवसं भाईदूज जैसे पावन पर्व इस पवित्र संबंध की गरिमा को और अधिक ऊँचा उठाते हैं, जहाँ बहन केवल रक्षा का सूत्र नहीं बाँधती, बल्कि अपने प्रेम, विश्वास और मंगलकामनाओं से भाई के जीवन को आलोकित करती है। बहन परिवार की संस्कृति की संवाहिका, मूल्यों की संरक्षिका और स्नेह की अविरल सरिता है। उसके सम्मान में जितने भी विशेषण कहे जाएँ, वे कम हैं, क्योंकि बहन वास्तव में ईश्वर की वह अनुपम देन है, जो जीवन को प्रेम, अपनत्व, संवेदना और पवित्रता से समृद्ध कर देती है।

आज राष्ट्रीय बहन दिवस पर संपूर्ण राष्ट्र को यह संकल्प लेना चाहिए कि हर बेटी को सम्मान मिलेगा, हर बहन को अवसर मिलेगा और हर नारी को उसके व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति का अधिकार मिलेगा। यही विकसित भारत की सबसे मजबूत नींव होगी। जिस दिन भारत की प्रत्येक बेटी आत्मविश्वास, संस्कार और नेतृत्व के साथ आगे बढ़ेगी, उसी दिन राष्ट्र की प्रगति नई ऊँचाइयों को स्पर्श करेगी। बहन का सम्मान केवल एक दिवस का उत्सव नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए। क्योंकि जहाँ बहनों का सम्मान होता है, वहाँ परिवारों में संस्कार खिलते हैं, समाज में संवेदनाएँ जीवित रहती हैं और राष्ट्र अपने उज्ज्वल भविष्य की ओर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है। यही राष्ट्रीय बहन दिवस का संदेश है, यही ‘बेटी तेरापंथ की’ सम्मेलन की उपलब्धि है और यही नए भारत के निर्माण का सबसे सशक्त मार्ग भी है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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