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संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। यही वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है जहां राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श होता है, सरकार जवाबदेह बनती है, विपक्ष जनभावनाओं को स्वर देता है और कानूनों के माध्यम से देश के विकास की दिशा तय होती है। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज संसद संवाद और सहमति का मंच बनने के बजाय टकराव, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी और राजनीतिक हठधर्मिता का अखाड़ा बनती जा रही है। मानसून सत्र में जिस प्रकार लगातार गतिरोध बना हुआ है, उससे केवल संसदीय कार्यवाही ही बाधित नहीं हो रही, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी आहत हो रही है। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच गतिरोध समाप्त करने के लिए हुई बातचीत भी किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। यह स्थिति बताती है कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक आग्रहों में इतने उलझ गए हैं कि राष्ट्रहित पीछे छूट गया है। विपक्ष की ओर से यह शर्त रखी जा रही है कि जब तक कुछ विशेष मुद्दों पर सरकार सदन में बयान और चर्चा के लिए तैयार नहीं होती, तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी जाएगी। दूसरी ओर सरकार भी अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर अडिग है। परिणाम यह है कि संसद का बहुमूल्य समय निरर्थक विवादों की भेंट चढ़ रहा है।

लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति को अराजकता में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं है। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना भी है। सरकार को कठघरे में खड़ा करना विपक्ष का अधिकार है, परंतु संसद को ठप कर देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में विरोध की भी मर्यादा होती है। जब विरोध संसद को चलने ही न दे, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दायित्वों की उपेक्षा बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों से यह चिंताजनक प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है कि संसद सत्र प्रारंभ होने से पहले ऐसे मुद्दे राजनीतिक रूप से उछाले जाते हैं, जिनके आधार पर पूरे सत्र को बाधित किया जा सके। परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं अथवा कई विधेयक लंबित रह जाते हैं। इससे सबसे अधिक नुकसान देश को होता है। संसद का प्रत्येक मिनट करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि से संचालित होता है। यदि वह समय केवल शोर-शराबे और नारेबाजी में बीत जाए तो यह करदाताओं के धन और लोकतांत्रिक विश्वास-दोनों का अपमान है।

लोकतंत्र में संवाद ही समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है। महात्मा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक भारतीय राजनीति की श्रेष्ठ परंपरा संवाद, सहमति और संवेदनशीलता की रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने दुराग्रह छोड़कर संवाद की मेज पर बैठें। संसद की गरिमा इस बात में नहीं कि कौन किसे अधिक कठघरे में खड़ा करता है, बल्कि इस बात में है कि राष्ट्रहित के प्रश्नों पर कितनी गंभीरता से विचार किया जाता है। विशेष रूप से कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल आंदोलन और विरोध का नाम नहीं है। विपक्ष की भूमिका सरकार को गिराने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र को संभालने की होती है। यदि प्रत्येक मुद्दे पर संसद को बाधित करने की रणनीति अपनाई जाएगी तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि विपक्ष के पास वैकल्पिक नीति और दृष्टि का अभाव है। लोकतंत्र में जनता केवल विरोध नहीं, समाधान भी चाहती है। यदि विपक्ष स्वयं संवाद से दूरी बनाएगा तो ‘संवाद से समाधान’ का आदर्श केवल नारा बनकर रह जाएगा।
सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र में बहुमत का अर्थ मनमानी नहीं होता। सरकार को भी विपक्ष की उचित मांगों को सुनना चाहिए और जहां संभव हो, सहमति का मार्ग निकालना चाहिए। संसद किसी एक दल की नहीं, पूरे राष्ट्र की संस्था है। इसलिए सरकार को भी संवेदनशीलता, धैर्य और व्यापक दृष्टिकोण का परिचय देना होगा। किंतु यदि संवाद का प्रत्येक प्रयास केवल राजनीतिक शर्तों और हठधर्मिता में उलझ जाए तो समाधान की संभावनाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। आज सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक परिपक्वता की है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। हर मुद्दे को चुनावी लाभ-हानि के चश्मे से देखा जा रहा है। संसद में बहस कम और राजनीतिक संदेश अधिक दिए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। संसद का उद्देश्य जनकल्याणकारी नीतियों पर विचार करना है, न कि चुनावी रणनीतियों का मंच बन जाना।
देश आज आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, रोजगार, शिक्षा, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक समरसता जैसी अनेक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय संसद का प्रत्येक दिन अत्यंत मूल्यवान है। यदि यह समय केवल राजनीतिक टकराव में व्यतीत होगा तो विकास की गति अवश्य प्रभावित होगी। कानूनों में विलंब, नीतिगत निर्णयों की देरी और संसदीय अस्थिरता का सीधा प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि संसद में कितना शोर हुआ, बल्कि इस बात में है कि वहां कितने सार्थक विचार सामने आए। स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष प्रतिद्वंद्वी अवश्य होते हैं, किंतु शत्रु नहीं। दोनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए। यदि राजनीतिक दल इस मूल भावना को भूल जाएंगे तो लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। विपक्ष अपने विरोध को रचनात्मक बनाए, सरकार अपने संवाद को व्यापक बनाए और दोनों मिलकर संसद की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करें। लोकतंत्र का भविष्य टकराव में नहीं, संवाद में सुरक्षित है। संसद की गरिमा नारेबाजी से नहीं, विचार-विमर्श से बढ़ती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यदि संसद ही गतिरोध का प्रतीक बन जाएगी तो जनता का विश्वास कमजोर होगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय की पुकार है कि राजनीति चुनावों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे बढ़े। पक्ष और विपक्ष दोनों यह स्मरण रखें कि वे किसी दल के नहीं, पहले भारत के प्रतिनिधि हैं। संसद की प्रत्येक घड़ी राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है। उसे हठ, अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ाना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। यदि लोकतंत्र को सशक्त बनाना है, संसद की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करनी है और भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो केवल एक ही मार्ग है-संवाद, सहमति और राष्ट्रहित। यही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही संसदीय मर्यादा का सर्वोच्च आदर्श।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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