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कश्मीर पर अमेरिकी सुर बदलेः भारत का कद बढ़ा, पाक बेचैन


अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का 19 अगस्त 2026 को श्रीनगर में दिया गया यह बयान कि जम्मू-कश्मीर “भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा” है, सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यह ऐसे समय आया है जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की धारणाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नए समीकरण बन रहे हैं। गोर ने जम्मू-कश्मीर की निरन्तर सुधर रही सुरक्षा स्थिति की बात कही और अमेरिकी यात्रा संबंधी परामर्श पर पुनर्विचार के संकेत भी दिए। पाकिस्तान ने इस बयान पर अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब कर तीखा विरोध दर्ज कराया। इस पूरे घटनाक्रम को केवल कश्मीर के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत-अमेरिका संबंधों में आ रहे व्यापक परिवर्तन, दक्षिण एशिया की बदलती सामरिक संरचना और पाकिस्तान की घटती कूटनीतिक प्रभावशीलता के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।

अमेरिका की कश्मीर नीति में लंबे समय से एक प्रकार की सावधानी रही है। वाशिंगटन सामान्यतः भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व घोषित नीति भी जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति और राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता की वापसी का समर्थन करती रही है। इसलिए गोर का श्रीनगर में जाकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” कहना निश्चित रूप से भाषा के स्तर पर एक उल्लेखनीय परिवर्तन है। लेकिन इसे अमेरिका की पूरी कश्मीर नीति में तत्काल और औपचारिक परिवर्तन मानना भी जल्दबाजी होगी। किसी राजदूत का बयान और किसी सरकार की औपचारिक नीति में अंतर होता है। फिर भी कूटनीति में शब्दों का अपना महत्व होता है। विशेष रूप से तब, जब वही शब्द उस भूभाग में बोले जाएं जिसे पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। इस दृष्टि से गोर का बयान भारत के लिए मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है।

इस बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष जम्मू-कश्मीर की बदलती जमीन से जुड़ा है। गोर ने सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए यात्रा संबंधी अमेरिकी परामर्श में कमी लाने की संभावना जताई है। इसका अर्थ यह है कि वाशिंगटन अब कश्मीर को केवल सुरक्षा संकट या आतंकवाद की दृष्टि से देखने के बजाय पर्यटन, आर्थिक गतिविधियों और सामान्य जनजीवन की संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में भी देख रहा है। यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की नई रोशनी दिखाई देती है। दोनों देशों के संबंध अब केवल व्यापार या रक्षा तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, आपूर्ति-शृंखला और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे विषयों ने भारत को अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार और शुल्क जैसे मुद्दों पर मतभेद भी मौजूद हैं, फिर भी व्यापक सामरिक साझेदारी अपनी उपयोगिता बनाए हुए है। हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा का उद्देश्य भी तनावों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करना और व्यापार तथा ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना था।

इसलिए कश्मीर पर अमेरिकी भाषा को भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा मानना अधिक तार्किक होगा। अमेरिका के लिए भारत अब केवल दक्षिण एशिया का एक बड़ा देश नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति-संतुलन का प्रमुख आधार है। भारत के लिए भी अमेरिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण निर्भरता के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रखा है। यही कारण है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य शक्तियों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखता है। कश्मीर के संदर्भ में यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से असहज करने वाला है। इस्लामाबाद ने गोर के बयान को अस्वीकार करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और उसका अंतिम निर्धारण होना बाकी है। पाकिस्तान ने इसे अमेरिका की पूर्व स्थिति से विचलन बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया।
पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी विदेश नीति का केंद्रीय विषय बनाए रखना चाहता है, जबकि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। आतंकवाद, आर्थिक स्थिरता, चीन का बढ़ता प्रभाव, पश्चिम एशिया का संकट, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाएं आज बड़ी शक्तियों की चिंता के केंद्र में हैं। ऐसे वातावरण में केवल कश्मीर के प्रश्न को बार-बार अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तानी कोशिशों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। भारत ने दूसरी ओर लगातार यह रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े विषय भारत की संप्रभुता और द्विपक्षीय संबंधों के दायरे में आते हैं। गोर का श्रीनगर दौरा स्वयं इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि एक प्रमुख अमेरिकी राजनयिक ने जम्मू-कश्मीर की यात्रा की, वहां के निर्वाचित नेतृत्व से मुलाकात की और क्षेत्र की सुरक्षा तथा आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी की। यह पाकिस्तान की उस कोशिश के विपरीत है जिसमें वह कश्मीर को केवल विवाद और अस्थिरता के चश्मे से प्रस्तुत करना चाहता है।

फिर भी भारत को इस बयान से अत्यधिक उत्साहित होकर यह मान लेने से बचना चाहिए कि अमेरिका ने कश्मीर पर अपनी संपूर्ण नीति बदल दी है। अमेरिका की विदेश नीति परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है और वह भारत तथा पाकिस्तान दोनों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश करता है। आज भी वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान आतंकवाद-रोध, क्षेत्रीय सुरक्षा और अफगानिस्तान सहित कुछ विषयों में उपयोगी साझेदार है। अतः भारत के लिए इस बयान का वास्तविक महत्व किसी औपचारिक अमेरिकी नीति-परिवर्तन से अधिक उस कूटनीतिक वातावरण में है, जिसमें भारत की स्थिति को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कूटनीति में किसी देश का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि कितने देश उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं, बल्कि इससे तय होता है कि वैश्विक शक्तियों के हित उसके साथ कितने गहरे जुड़े हैं। आज भारत की आर्थिक क्षमता, विशाल बाजार, तकनीकी सामर्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाएं, युवा शक्ति और सामरिक स्थिति उसे विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती हैं। इसी बदलती वास्तविकता का प्रभाव कश्मीर पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है।
गोर का बयान इसलिए भारत के लिए एक उपलब्धि से अधिक एक संकेत है-संकेत इस बात का कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श धीरे-धीरे बदल रहा है। पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी है कि केवल पुराने नारों और कूटनीतिक दबाव से वह कश्मीर को विश्व राजनीति के केंद्र में नहीं रख सकता और अमेरिका के लिए यह उसके बदलते हितों के अनुरूप संतुलन साधने की कोशिश है। अंततः कश्मीर की स्थायी शांति केवल अंतरराष्ट्रीय बयानों से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास, सुरक्षा, जनभागीदारी और सीमा-पार आतंकवाद के अंत से सुनिश्चित होगी। भारत को इस नए कूटनीतिक वातावरण का उपयोग आक्रामक प्रचार के बजाय जिम्मेदार और आत्मविश्वासी राष्ट्र की तरह करना चाहिए। सर्जियो गोर का बयान इस बदलती तस्वीर की एक महत्वपूर्ण झलक है-जहां कश्मीर को लेकर भारत की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त करती दिखाई दे रही है और पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार

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