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ब्रिक्स शक्ति-संघर्ष का अखाड़ा नहीं, सहयोग का सेतु बने


नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है, जब विश्व व्यवस्था गहरे संक्रमण से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का तनाव, आतंकवाद, व्यापारिक टकराव, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा की चिंता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तेज होती चुनौती और वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते प्रश्नों ने दुनिया के सामने अनेक अनुत्तरित सवाल खड़े कर दिए हैं। इसके साथ ही अमेरिका की व्यापार एवं रणनीतिक नीतियों से पैदा हो रहा दबाव भी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रहा है। ऐसे वातावरण में भारत की अध्यक्षता में होने वाला यह सम्मेलन केवल एक कूटनीतिक आयोजन नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था की दिशा तय करने का महत्वपूर्ण अवसर है। भारत ने अपनी अध्यक्षता का मूल मंत्र रखा है-लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के आधार पर भविष्य का निर्माण। ब्रिक्स अब 2006 में आरंभ हुई उस मूल अवधारणा से बहुत आगे निकल चुका है, जिसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में सामने आए थे और बाद में दक्षिण अफ्रीका भी इसमें शामिल हुआ। विस्तार के बाद यह 11 सदस्यीय समूह बन चुका है और इसका प्रभाव वैश्विक दक्षिण की राजनीति और अर्थव्यवस्था में लगातार बढ़ा है। वर्ष 2026 ब्रिक्स की स्थापना के दो दशक पूरे होने का वर्ष भी है। भारत के लिए यह अध्यक्षता इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वह ब्रिक्स को किसी पश्चिम-विरोधी या अमेरिका-विरोधी मंच के रूप में नहीं, बल्कि विकासशील एवं उभरती अर्थव्यवस्थाओं की रचनात्मक, संतुलित और बहुपक्षीय आवाज के रूप में स्थापित करना चाहता है।

ब्राजील में 2025 के ब्रिक्स सम्मेलन में वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूत करने, बहुपक्षीय व्यवस्था में सुधार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जिम्मेदार वैश्विक शासन, जलवायु वित्त, स्वास्थ्य, व्यापार और वित्तीय सहयोग जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण सहमति बनी थी। रियो घोषणा में संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था को अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया था। साथ ही स्थानीय मुद्राओं में वित्तीय लेन-देन, सीमा-पार भुगतान व्यवस्था और आपूर्ति शृंखला को मजबूत करने की दिशा में भी आगे बढ़ने की बात कही गई थी। भारत को 2026 की अध्यक्षता सौंपते हुए ब्राजील ने नई दिल्ली से इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अपेक्षा व्यक्त की थी। इस दृष्टि से दिल्ली सम्मेलन की पहली बड़ी कसौटी यही होगी कि ब्रिक्स घोषणाओं और वास्तविक उपलब्धियों के बीच की दूरी कितनी कम कर पाता है। भारत ने अध्यक्षता के दौरान 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए हैं। राजनीतिक एवं सुरक्षा सहयोग, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग तथा सांस्कृतिक एवं जन-जन संपर्क-इन तीनों क्षेत्रों में व्यावहारिक परिणामों पर जोर दिया गया है। इसलिए अब दुनिया की नजर इस बात पर होगी कि सम्मेलन के अंत में केवल लंबा संयुक्त घोषणापत्र सामने आता है या कुछ ऐसे ठोस फैसले भी होते हैं जिनका असर आने वाले वर्षों में दिखाई दे।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियों में से एक है। एआई ने चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, उद्योग, वित्त और शासन के क्षेत्र में अभूतपूर्व संभावनाएं खोली हैं, लेकिन इसके साथ रोजगार, डेटा सुरक्षा, गलत सूचना, साइबर सुरक्षा और तकनीकी असमानता के खतरे भी बढ़े हैं। ब्राजील सम्मेलन में भी एआई के वैश्विक शासन को लेकर व्यापक चिंता व्यक्त की गई थी। भारत अब ब्रिक्स देशों के बीच एआई, उन्नत कंप्यूटिंग, क्वांटम तकनीक और सेमीकंडक्टर जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में जोर दे रहा है। यदि ब्रिक्स तकनीक को कुछ शक्तिशाली देशों और कंपनियों के नियंत्रण से बाहर निकालकर विकासशील देशों की पहुंच तक ले जाने की प्रभावी व्यवस्था बना सके, तो यह उसकी बड़ी उपलब्धि होगी। दूसरी बड़ी चुनौती आर्थिक है। विश्व अर्थव्यवस्था में ब्रिक्स का वजन बढ़ रहा है, लेकिन समूह के भीतर आपसी व्यापार अभी भी उसकी संभावित क्षमता के अनुरूप नहीं है। भारत आपूर्ति शृंखलाओं को अधिक मजबूत और विविध बनाने, छोटे एवं मध्यम उद्योगों को वित्त उपलब्ध कराने तथा स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है। जयपुर में हुई ब्रिक्स व्यापार मंत्रियों की बैठक में ब्रिक्स इकनोमिक पार्टनरशिप 2030, एमएसएमई के लिए वित्तीय सुविधा और अधिक संतुलित व्यापार जैसे मुद्दों पर प्रगति हुई है।

यहां ‘डी-डॉलराइजेशन’ का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत का दृष्टिकोण अत्यंत व्यावहारिक है। भारत किसी नई साझा ब्रिक्स मुद्रा के निर्माण की जल्दबाजी में नहीं है। इसके बजाय सीमा-पार डिजिटल भुगतान की ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर जोर है, जिससे सदस्य देश अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में अपेक्षाकृत सुगम व्यापार कर सकें। यह दृष्टिकोण अमेरिकी डॉलर के खिलाफ किसी राजनीतिक मोर्चेबंदी से अधिक वित्तीय स्वायत्तता और लेन-देन की सुविधा का प्रयास है। परंतु ब्रिक्स की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी आंतरिक विविधता और मतभेद हैं। भारत और चीन के बीच सीमा एवं रणनीतिक अविश्वास की विरासत अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। रूस और पश्चिम के बीच संघर्ष, ईरान से जुड़े तनाव तथा पश्चिम एशिया की जटिल परिस्थितियां भी ब्रिक्स के लिए साझा राजनीतिक रुख बनाना कठिन बनाती हैं। विशेष रूप से पश्चिम एशिया के मौजूदा संकट में ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के अलग-अलग हित हैं। ऐसे में ब्रिक्स यदि हर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर एकमत नहीं हो पाता तो यह उसकी सीमाओं को उजागर करेगा।

यही कारण है कि भारत के सामने इस सम्मेलन में सबसे कठिन कूटनीतिक संतुलन है। उसे चीन और रूस के साथ सहयोग भी बढ़ाना है, लेकिन अमेरिका और यूरोप सहित पश्चिमी देशों से अपने आर्थिक एवं रणनीतिक संबंध भी बनाए रखने हैं। भारत का हित किसी एक शक्ति-धु्रव के साथ खड़े होने में नहीं, बल्कि बहुधु्रवीय विश्व में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता मजबूत करने में है। ब्रिक्स को यदि केवल ‘पश्चिम के विकल्प’ के रूप में प्रस्तुत किया गया तो उसकी स्वीकार्यता सीमित हो सकती है, लेकिन यदि वह वैश्विक दक्षिण के विकास, शांति, तकनीकी समानता और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व का मंच बनता है, तो उसका महत्व कहीं अधिक बढ़ेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उनका तर्क है कि बीसवीं सदी में बनाई गई संस्थाओं को इक्कीसवीं सदी की वास्तविकताओं के अनुरूप बदलना होगा। आज विश्व अर्थव्यवस्था में जिन देशों का योगदान बढ़ा है, यदि उन्हें निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता तो संस्थाओं की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता दोनों प्रभावित होती हैं। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की मांग इसी व्यापक संदर्भ का हिस्सा है। ब्रिक्स इस मांग को संगठित आवाज देने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
लेकिन सम्मेलन की सफलता का वास्तविक पैमाना अमेरिका की आलोचना या पश्चिमी व्यवस्था को चुनौती देना नहीं होगा। सफलता तब मानी जाएगी जब ब्रिक्स दुनिया को बेहतर विकल्प दे-ऐसा विकल्प जिसमें आर्थिक सहयोग हो, तकनीकी साझेदारी हो, ऊर्जा एवं खाद्य सुरक्षा हो, आतंकवाद के विरुद्ध साझा प्रतिबद्धता हो, आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा हो, पर्यावरणीय संतुलन हो और विकासशील देशों की वास्तविक भागीदारी हो। भारत की ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना तभी सार्थक होगी, जब ब्रिक्स शक्ति-संघर्ष का नया अखाड़ा बनने के बजाय सहयोग का नया सेतु बने। अंततः दिल्ली सम्मेलन भारत की कूटनीतिक क्षमता की भी परीक्षा है और ब्रिक्स की प्रासंगिकता की भी। दुनिया आज युद्ध से अधिक शांति, प्रतिस्पर्धा से अधिक सहयोग और प्रभुत्व से अधिक साझेदारी चाहती है। मानवता का भविष्य केवल हथियारों, अंतरिक्ष अभियानों या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की शक्ति में नहीं, बल्कि पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों के बीच विश्वास, सह-अस्तित्व और साझा विकास में सुरक्षित है। यदि नई दिल्ली सम्मेलन घोषणाओं से आगे बढ़कर इस विश्वास को संस्थागत रूप देने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सका, तो यह भारत की अध्यक्षता की बड़ी उपलब्धि होगी। अन्यथा ब्रिक्स भी अनेक वैश्विक मंचों की तरह उम्मीदें जगाने वाला, लेकिन अपेक्षाओं पर अधूरा उतरने वाला संगठन बनकर रह जाएगा।

ललित गर्ग लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
ललित गर्ग
लेखक, पत्रकार, स्तंभकार
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