नदी सिखाती सतत चलें हम,
निर्झर-सा हो निर्मल जीवन।
सुमन सुगंध सदा बिखराते,
करें सुवासित उपवन कानन।।
बरगद-पीपल की छाया में,
जीवन को उत्साह मिला है।
पंछी करते कलरव निशिदिन,
सुख संतोष अथाह मिला है।।
पशु-पक्षी गिरि घाटी पर्वत,
धरा बनाते सुरभित सुंदर।
मानव के श्रम से सिंचित हो,
मुस्काते हैं मरुथल बंजर।।
कंकड़-कंटक बीन राह के,
मानवता के सुमन बिछा कर।
सकल जगत में खुशियां बांटें,
भेद-भाव के भवन गिराकर।।

शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)