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बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा

( छत्तीसगढ़ी गीत व कविता )

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बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा,
मोर माटी के महक मं बसथे मोर दुनिया।
अरपा माई के लहर कहे- आ बेटा, आ…
बिलासा दाई के अंचरा मं मिलथे मया…
बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा,
मोर जनम-जनम के नाता, मय बिलासपुरिया…।

बिलासा के माटी अउ, अरपा माई के धार,
खेलत-खेलत बीत गे मोर बचपन के संसार।
नंगे पांव रेत मं, दौड़त रहेव दिन-रात,
अरपा के किनारे-किनारे, बनगे जिनगी के बात।

ओखर रेत मं गिरेंव, ओखर रेत मं उठेवं,
मया के पहिली बोली, ओही माटी ले सुनेवं।
कभू धूप, कभू छांव, कभू बरसा के फुहार,
मोर हर सांस मं बसथे, मोर माटी के प्यार।

ओ अरपा माई… ओ अरपा माई…
तंय मोर पहिली गुरू हस दाई…
बिलासा दाई… बिलासा दाई…
तोर कोरा मं मोर दुनिया समाई…।

बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा,
मोर माटी के महक मं बसथे मोर दुनिया।
अरपा माई के लहर कहे..आ बेटा, आ…
बिलासा दाई के अंचरा मं मिलथे मया…
बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा…।

अरपा माई,ह मोला, जिनगी जीना सिखाइस,
लहर-लहर संघर्ष के, पाठ मोला पढ़ाइस।
कभू थकेव जब जिनगी ले, तंय हिम्मत देवस,
टूटत मन के कोना मं, नवा सपना बोवस।

तोर धार मं बहत-बहत, सीखेवं आगू जाना,
गिरके फेर उठना दाई, हार के नइ हारना।
तंय कहिस – बेटा चल, रस्ता लंबा हे तोर,
सच के संग चलबे त, उजियार होही भोर।

तोर लहर मं मोर आस हे,
तोर धार मं विश्वास हे,
अरपा माई, तंय मोर मया,
तंय मोर सांस हे…।

बिलासा माई, तंय त मोर, जननी हस दाई,
तोर कोख ले जनम मिलिस, धन्य होगे जिनगी मोर भाई।
तोर माटी मं पलेंव-बढ़ेंव, तोर अंचरा के छांव,
तोर गली, तोर चौरा, तोर मया – मोर पहिली ठांव।

मोर हंसी तोर आंगन मं, मोर सपना तोर आंखी,
मोर हर इक कहानी मं, तोर माटी के झांकी।
जतका दूर गेवं दाई, उतके तोला पायेंव,
दुनिया भर के रंग देखेवं, फेर तोर रंग मं समायेंव।

तोर माटी के तिलक लगाके,
मोर माथा धन्य होगे,
बिलासा दाई के अंचरा मं,
मोर जीवन सार्थक होगे… ।

एक माई मोर नस-नस मं बहत हावय,
दूसर माई मोर छाती के धड़कन हावय।
एक माई हे अरपा, दूसर बिलासा दाई,
दूनों मं बसथे मोर दुनिया समाई।

अरपा अउ बिलासा..दूनों मोर माई आय,
एक हर जिनगी सिखाइस, एक हर जिनगी संवारिस।
दूनों के मया ले मोर, जीवन महकाय,
बिलासा अरपा के बेटा, मैं हवंव बिलसपुरिहा…।

मोर शहर के गली-गली, मोर अपन चिन्हारी,
मोर बोली मं बसथे दाई, तोर माटी के महतारी।
मंदिर के घंटी बाजे, अरपा के तीर मं,
मोर मन गीत गाये दाई, अपन शहर के पीर मं।

मोर सुख मं तंय हंसस, मोर दुख मं तंय रोवस,
मोर हर इक धड़कन मं, तंय अपन मया बोवस।
बिलासपुर मोर सपना, बिलासपुर मोर मान,
तोर नाम ले शुरू होथे, मोर हर इक बिहान।

जहां जनम मिलिस मोला,
ओही धरती मोर धाम,
बिलासा दाई के चरण मं,
मोर कोटि-कोटि प्रणाम…।

जनम पाएंव हंव दाई, बिलासा के धरती मं,
जिनगी के सुख पाएंव, तोर मया के छांव मं।
अब एकेच अरमान हे, जब जिनगी होही पार,
मोर माटी मोला बुलाही, अरपा के तीर अपार।

न मोला सोना चाही, न चाही महल-दुआर,
बस तोर माटी के खुशबू, रहे मोर संग हजार।
जब आखिरी सांस चलही, जब नैना होही बंद,
तोर माटी के अंचरा मं, मिल जावं मोला ठांव।

मोर आखिरी सांस घलो,
होवय इंही माटी मं,
मोर जनम अउ मोर धरम,
होवय इंही धरती मं…।

हे अरपा माई, जब दुनिया ले मैं जावंव,
मोर पांव के धूल ला, तोर तीर मं छोड़ जावंव।
बिलासा दाई के कोरा मं, मोला फिर सुला लेबे,
मोर जनम के ऋण ला दाई, अपन मया ले चुका लेबे।

मोर सांस के आखिरी सुर, तोर नाम ले निकलय,
मोर आंख के आखिरी नीर, तोर माटी मं गिरय।
नवा जनम अगर मिलही, मोर एकेच अरमान -म
फेर जनम लंव दाई, तोर धरती मं भगवान!

फेर बिलासा के माटी होवय,
फेर अरपा के धार,
फेर बिलासपुर मोर घर होवय,
फेर तोर मया अपार…।

बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा,
मोर माटी के महक मं बसथे मोर दुनिया।
एक माई मोर नस-नस मं, दूजी मोर धड़कन,
दूनों के चरण मं दाई, मोर कोटि-कोटि वंदन।

अरपा माई… मोला अपन लेबे,
बिलासा दाई… मोला कोरा देबे…
जब मैं दुनिया ले जावंव…
जब मैं दुनिया ले जावंव…
तुम्हरे माटी… तुम्हरे गोद…
मोर अंतिम ठांव होवय…

बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा…
बिलासा अरपा के बेटा मैं हवंव बिलसपुरिहा…
जनम तोर माटी मं…
जिनगी तोर माटी मं…

अउ आखिरी सांस घलो…
तोर माटी मं…
बिलासा… दाई…
अरपा… माई…
तोर मया मं…
मोर दुनिया समाई…॥

सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’ वरिष्ठ पत्रकार, लेखक, एवीके न्यूज सर्विस
सुरेश सिंह बैस ‘शाश्वत’
वरिष्ठ पत्रकार / साहित्यकार / अधिवक्ता, एवीके न्यूज सर्विस
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