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पहाड़ी लोक संस्कृति का सुरभित पवन प्रवाह है बराली एक्सप्रेस

पहाड़ी

बचपन में स्वप्न हैं, सवाल हैं और कल्पनाएं भी। चुनौतियां हैं तो उनसे जूझने और पार पाने का जज्बा भी। प्रश्न हैं तो उत्तर खोजने की जद्दोजहद भी।  वास्तव में बचपन सीखने-सिखाने की पाठशाला है, चित्रांकन का कैनवास है और रचनात्मकता का  अनंत फलक भी। इसलिए बचपन हर व्यक्ति की स्मृतियों में स्वर्ण काल बन इतराता रहता है और जब जगमोहन चोपता जैसा रचनाधर्मी व्यक्तित्व अपने पहाड़ी जीवन के अतीत की यात्रा कर अपने बचपन की खट्टी-मीठी स्मृतियों को उकेरता है तो वह ‘बराली एक्सप्रेस’ बन चल पड़ती है जिसकी खिड़की से दिखते हैं अस्सी के दशक के तमाम मनोहारी दृश्य, जिनमें शामिल हैं पहाड़ी गांव, गदेरे, घराट, बुग्याल, सीढ़ीदार खेत सेरे, काफल के जंगल, झरने, खेती-बारी, छानी-छप्पर, डांग, आसमान से गिरती बर्फ और पिघली बर्फ को घर लाकर उसमें धनिया मिर्च का लून (नमक ) लगा बर्फ के गोले खाते बच्चे। साथ ही सुनाई पड़ते हैं लोकगीत और लोकवाद्यों की थापों पर नाचते-हुलसते लोग। 

         मैं बात कर रहा हूं समय साक्ष्य, देहरादून से जगमोहन चोपता की हालिया प्रकाशित कृति ‘बराली एक्सप्रेस’ की, जिसके 120 पृष्ठों में उत्तराखंड के चमोली जनपद के चोपता गांव के एक बच्चे ‘जेसी’ के बचपन के रोचक 37 किस्से गुंथे हैं। जेसी इन कहानियों का नायक होकर भी किसी अन्य पात्र पर हावी नहीं हुआ है बल्कि सभी के साथ घुलामिला है। ‘बराली एक्सप्रेस’ में पहाड़ी लोकजीवन सांसें ले रहा है, हर पृष्ठ में पहाड़ की धड़कन का ग्राफ अंकित है।

पाठक जिसने पहाड़ी जीवन को निकट से देखा-जिया नहीं है, वह भी ‘बराली एक्सप्रेस’ की सवारी कर पहाड़ी जीवन, चुनौतियों एवं उसके संघर्ष एवं प्रकृति से रागात्मक सम्बंध से सहज परिचित हो जाता है। वह पहाड़ के सौंदर्य एवं उदारता को अनुभव कर पहाड़ी जीवन की कर्मठता एवं जिजीविषा के प्रति आदर व्यक्त करता है तो लोकोत्सव में सहभागी भी बनता है।‌ कह सकते हैं कि जगमोहन चोपता की कृति ‘बराली एक्सप्रेस’ पहाड़ एवं मैदान को जोड़ने का एक साहित्यिक सेतु है जिससे आवाजाही करके पाठक पहाड़ी लोक जीवन से वाबस्ता हो बर्फ, बुग्याल, पहाड़ी खेती के तौर-तरीकों, सामूहिकता, सामुदायिक आत्मीयता, गढ़वाली लोकभाषा की मिठास एवं दैनंदिन जीवन की रससिक्त जीवट कथा को आत्मसात करता है।‌

       इन कहानियों से आपको जोड़ूं तो ‘बराली एक्सप्रेस’ पहले स्टेशन ‘बराली के सरसों के सेरे’ से  चलकर अंतिम स्टेशन ‘रेडियो’ तक पहुंचती है। इस पूरी यात्रा में पाठक पहाड़ी रहवासियों के खेतिहर औजारों को धार देने वाले पत्थरों ‘पयूण्या’ से मिल चैत्र महीने में बेटियों की ससुराल भेजने वाले पकवान ‘औव’ का स्वाद चखता है जिसे परिवार के बच्चे पूरे गांव में बांटते फिरते हैं। फिर वह, बाघ-बघेरू से अपने पशुओं की सुरक्षा के लिए आयोजित ‘अंग्यार पूजा’ जिसमें बाघ का रूप धरे एक ग्वाले को कंटीली झाड़ियों की बाड़ से घेर उस पर कंडों की आग बरसाते हैं, में शामिल हो ‘बुरांश’ के लाल फूलों को निहारते-खाते आगे बढ़ ‘गेहूं की मगोसार’ का हिस्सा बनता है जो गेहूं कटाई के बाद जानवरों के चरने के लिए छोड़े गये खेत होते हैं। यहां वह जेसी के साथ गौरैया, कौवा, घुघुते, पितपनोडी चिड़ियों के घोंसले और अंडों से पहचान बना ‘गेहूं की देंई’ में पहुंच गेहूं की बालियों पर गोल घूमते बैलों के पीछे चलता हुआ कच्चे गेहूं को भूनकर तैयार की गयी उमी खा आराम करता है। इस बीच गिद्धों की रोचक कहानी स्वर्णपंखी गरुण जाग, बराली क्रिकेट मैदान और काफल के जंगल के मनहर दृष्य निकल जाते हैं। ‘रामलीला’ के संवाद और लखपत सिंह रावत लग्गी भाई के स्वांग सुन श्रोताओं के ठहाकों से पाठक की तंद्रा टूटती है और स्वयं को ‘चोपता गदेरा’ पर पाता है जहां बच्चे धमाचौकड़ी करते और पत्थरों तले हाथ डाल मछली पकड़ते हैं।

‘बराली के आम’ चूसने और गुठली को सेही के लिए दावत हेतु छोड़ पाठक, जेसी और उसके पिता के संवाद का मूक श्रोता बनता है जिसमें ‘कम्युनिस्टों का डर’ और रूस की कहानियां’ सुन बसग्याल’ के मौसम का आनंद लेता है जिसे हम मैदानी लोग बसंत कह झूम उठते हैं। ‘काखड़ी चोर’ दूसरों की छानी से ककड़ी चुराने की रोचक कथा है तो ‘मां और जड़ी बूटियां’ परम्परागत वैद्यकी ज्ञान का आख्यान। धान कटाई, न्यार लगाना, बैंगन की बलि खेती-किसानी से जुड़ी कहानियां हैं जो ग्राम्य संस्कृति, कृषि कला और रीति-रिवाजों से पाठक को जोड़ती है। ‘गाड़ी’ गांव-घर में उपलब्ध बोतलों के ढक्कन, तार एवं अन्य बेकार वस्तुओं से गाड़ी एवं खेल के अन्य सामान बनाने के वर्णन के साथ गदेरे में मछली फांसने हेतु गोदा लगाने की तरकीब से रूबरू कराती है।

‘बर्फ’ बताती है कि फरवरी में बर्फ पिघलने के साथ पहाड़ों में लकड़ियों के बीनने, चौलाई और तिल के लड्डू बनाने तथा पहाड़ से गमछे में लपेटकर लाई गयी बर्फ में नीबूं का रस एवं धनिया मिर्च वाला नमक मिलाकर खाने का कैसा स्वाद पाठक के मुंह में घुलने लगता है। इसी में यखुट्या लगने अर्थात एक पांव वाले भूत की मजेदार कहानी भी है। इस तरह ‘छाया’ कहानी में पौष-माघ में बेटी के मायके आने पर छाया पूजने का क्रम शुरू होता है तो ‘भमौर और भालू’ में जंगल में भमौर फल बीनने गये जेसी की भेंट भालू से होने का लोमहर्षक वर्णन है। आगे फुलफुल खाजा, होली जैसे पारम्परिक पर्व है।

‘घुस्घुसी डांग’ एक प्रकार प्राकृतिक फिसल पट्टी है जिस पर बच्चे फिसलते हैं तो ‘झांझी’ में एक शराबी की मजेदार कहानी है। शेष कहानियां च्या पकौण्या, पत्र, राजपूत गुरुजी, रामबहादुर, पंचखाली मोटर, उत्तराखंड आंदोलन, मतदान भी रुचिपूर्ण हैं जिनमें अलग राज्य बनने, गांव तक सड़क निर्माण होने, एक नेपाली श्रमिक द्वारा एक दिन स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाने और ऐन मतदान के वक्त पिता द्वारा पोलिंग बूथ में जेसी को मतदान प्रक्रिया से परिचित कराने के वर्णन हैं।

      ये सभी कहानियां छोटी हैं किंतु कथ्य से गम्भीर संदेश सहेजे पाठकों के सम्मुख सवाल खड़ा करती हैं कि विकास के नाम पर लोक संस्कृति पर मंडरा रहे खतरे से लोक जीवन के रंगों को बचाये रखने को कौन कमर कस आगे बढ़ता है। इसमें श्रम के प्रति निष्ठा एवं महत्व को रेखांकित कर बच्चों के मन में श्रम के प्रति सम्मान का भाव भी भरने का प्रयत्न दिखता है। मुझे ‘बराली एक्सप्रेस’ में एक अव्यक्त चिंता की भी आहट सुनाई देती है और वह आहट है बच्चों से उनके बचपन के छिन जाने का संकट। बच्चों के स्वातंत्र्य, उन्मुक्त हास्य, मनोरंजन पर काले घने बादल छाये हुए हैं। इन बादलों को चीरती प्रकाश की कोमल रेखाएं बच्चों के चेहरों को हंसी-खुशी से प्रदीप्त करें, ऐसी भावना ‘बराली एक्सप्रेस’ की ध्वनि में समाहित है।

पुस्तक की भूमिका में हैं शिक्षिका कवियत्री रेखा चमोली कहती हैं, “बरेली एक्सप्रेस बचपन का एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें लोक है, प्रकृति है, जनजीवन और परंपराएं हैं। एक-दूसरे के सुख-दुख में हिस्सेदारी है तो कुछ ऐसे सवाल भी हैं जो अभी भी अनुत्तरित हैं। इसमें जिस भी तरह का सुख-दुख, आनंद, सवाल और निष्कर्ष आए हैं, वे बहुत ही सरलता से पाठक के सामने एक दृश्य बनाते हैं।

पाठक उस दृश्य में कभी खुद को खोजता है तो कभी लेखक से पूछे सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश करता है तो कभी मन मसोसकर रह जाता है। इसके पाठ कभी उसके मन में कसक भर देते हैं तो कभी उत्सुकता और सवाल।” कहना नहीं होगा कि लेखक जगमोहन चोपता ‘बराली एक्सप्रेस’ के माध्यम से बच्चों के प्रकृति से सहकार-सानिध्य, हमउम्र साथियों के साथ सीखने-सिखाने की प्रक्रिया बनते तमाम खेल एवं गतिविधियां, स्वतंत्रता, सामाजिक चेतना, रीति-रिवाजों में सहभागिता एवं लोक से संवाद के द्वारा संवारते-महकाते बचपन का पक्ष रखने में सफल हुए हैं तो वहीं लोक संस्कृति और बचपन पर आसन्न संकट को एक बड़े खतरे के रूप में पाठक तक पहुंचा सके हैं।

      पाठक इन कहानियों से गुजरते हुए अपने बचपन को जीने लगता है और उसके मुख मंडल पर हंसी एवं खुशी की लकीरें उभरने लगती हैं। कृति साहित्यानुरागियों के मध्य अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा पढ़ी-सराही जायेगी, इसमें दोराय नहीं। मुद्रण स्वच्छ है, कागज ठीक है पर गुणवत्ता बढ़ाना बेहतर होता।‌

वर्तनी की अशुद्धियों से बचा जा सकता था। गढ़वाली का यत्र-तत्र खूब प्रयोग हुआ है, कहीं-कहीं कोष्ठक में हिंदी अर्थ दिया गया है, पर बेहतर होता कि परिशिष्ट अंतर्गत गढ़वाली के प्रयुक्त सभी शब्दों के अर्थ और परिभाषा दी जाती। विनोद उप्रेती का आवरण चित्ताकर्षक है, वहीं अंदर के पृष्ठों पर मोहन चौहान के रेखांकन कथा से पाठक को जोड़ने का हेतु बनते हैं। कृति ‘बराली एक्सप्रेस’ अपने कथ्य से पाठक को खींचती है।‌ निश्चित रूप से ‘बराली एक्सप्रेस’ बच्चों, अभिभावकों एवं शिक्षकों के लिए उपयोगी है जो उन्हें समृद्ध करेगी।

प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
प्रमोद दीक्षित मलय शिक्षक, बाँदा (उ.प्र.)
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