भारत का संविधान समानता, सामाजिक न्याय और अवसरों की समता का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसी उद्देश्य से स्वतंत्रता के बाद अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा बाद में अन्य पिछड़ा वर्ग सहित विभिन्न वर्गों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की गई। उस समय इसका उद्देश्य उन समुदायों को शिक्षा, रोजगार और शासन-प्रशासन में अवसर प्रदान करना था जो सदियों से सामाजिक और शैक्षिक रूप से वंचित रहे थे।
समय के साथ देश बदला, समाज बदला और अनेक आरक्षित वर्गों के परिवार शिक्षा, प्रशासन, न्यायपालिका, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, राजनीति और व्यापार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति कर चुके हैं। ऐसे में एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है – क्या वर्तमान स्वरूप में आरक्षण व्यवस्था का समय-समय पर पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए?
यह प्रश्न किसी वर्ग का विरोध नहीं है, बल्कि सार्वजनिक नीति की समीक्षा का प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नीतियाँ स्थायी नहीं होतीं; बदलती परिस्थितियों के अनुरूप उनका परीक्षण और आवश्यक संशोधन लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

आज समाज के एक वर्ग का यह मत सामने आता है कि कई ऐसे परिवार, जो वर्षों से आरक्षण का लाभ लेकर आर्थिक और सामाजिक रूप से अत्यंत सक्षम हो चुके हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ भी उसी लाभ को प्राप्त कर रही हैं। दूसरी ओर अनेक आर्थिक रूप से कमजोर परिवार, जो आरक्षण के दायरे में नहीं आते, सीमित संसाधनों के बावजूद प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं। इस स्थिति ने अवसरों की समानता पर नई बहस को जन्म दिया है।
यह भी सत्य है कि डॉक्टर, इंजीनियर, न्यायिक अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और अन्य जिम्मेदार पदों पर नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति से समाज उच्चतम स्तर की दक्षता और उत्तरदायित्व की अपेक्षा करता है। इसलिए चयन प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो सामाजिक न्याय और उत्कृष्टता, दोनों के बीच संतुलन बनाए रखे। आज के वह वैविध्य और व्यापक आधुनिक परिवेश यह भी पूरी शिद्दत से देखने में आ रहा है कि दक्ष और योग्य व्यक्ति जिम्मेदार और अहम पद पर नहीं होने से गहरे नकारात्मक स्थिति उत्पन्न हो रहें है। यह ऐसा संकेत है जो हमें सावधान करने के लिए पर्याप्त है।

