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कहानी: वो मास्टरनी

मैं उसे ‘मास्टरनी’ कहकर ही पुकारता था। वैसे तो वो डिग्री कालेज में प्रोफेसर थी मगर मेरे प्यार के शब्दों में ‘मास्टरनी’ शब्द ही रच-बस गया था। उसका नाम था जाहनवी। वक्त्त और हालात से लड़ती वो अकेली लड़की मानों महाभारत के अभिमन्यु जैसी थी। जो वक्त्त के चक्रव्यूह में पूरी तरह से पफंस गई थी। निकल ही नहीं पा रही थी। मेरी उससे पहली मुलाकात में ही मुझे यूं लगा जैसे वो हमेशा मेरी ही थी। मुझसे उसका लगाव और आत्मीयता एकदम शु( भाव के साथ थी। उसने मुझे कभी किसी रिश्ते में नहीं बांधा किंतु मै उससे बेहद प्रेम करने लगा था। उसकी परिस्थितियों की वजह से नहीं बल्कि उसका मुझ पर विश्वास और आस्था देखकर। आत्मविश्वास से लबालब, हालात से जूझते हुए उसके मुंह से बार-बार ये निकलना ‘किसी के बाप से नहीं डरती’ मुझे उसकी तरपफ प्रभावित करता था।

उसकी कहानी एक आम लड़की से कुछ ज्यादा नहीं थी पर कुछ ऐसा अलग था उसमें जिससे वो खास बन जाती थी। पिता के घर से उठी उसकी डोली इस विश्वास के साथ विदा हुई थी कि ससुराल से ही अर्थी निकलेगी पर विधाता ने जो लिखा था उसे तो भुगतना ही पड़ता है। तीसरे दिन ही वो मायके भेज दी गई। पिता से लेकर माता व रिश्तेदारों ने कारण पूछा तो पता चला जिसे परमेश्वर समझकर सात पफेरे लिए थे वो तो बिल्कुल ही मंदबद्विु या यूं समझ लो बुद्विहीन ही था। पत्नी क्या होती है? उसे पता ही नहीं था। रिश्तों को वो समझता ही नहीं था। एकदम बालक जैसा।

तमाम सपनों और प्रियतम के प्यार की चाहत रखनी वाली जाहनवी ने कितने ख्बाव बुने थे। मगर सब चकनाचूर हो गए। पहली ही रात को पत्नी को प्रेम करने की जगह वो बालक बुद्वि तो अपनी मां के पल्लू से लिपटकर सो रहा था। जाहनवी पूरी रात रोती रही दरअसल, माता-पिता का इकलौता ये लाड़ला था, जिसकी शादी झूठ बोलकर जाहनवी के साथ करा दी गई। जाहनवी के गरीब पिता ने केवल उसका घर व सरकारी सेवारत माता-पिता ही देखे। तीन दिन तक जाहनवी की आंखों से आंसू नहीं रूके। इसी बीच किसी ने इस बात की खबर उसके पिता को कर दी। बेटी से मिलने पहुंचे पिता ने तुंरत ही कड़ा फैसला किया और घर ले आए। बाद में चार साल तक कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरकर बेटी को उस मंदबुद्वि से छुटकारा दिलाया। इसके बाद जाहनवी ने कभी भी शादी न करने का फैसला कर डाला।

अपने बूढ़े पिता का बेटा बनकर उनका सहारा बन गई। कॉलेज में पढ़ाने लगी। लेकिन बहुत ही स्पष्टवादिता और गलत का विरोध करने के कारण वो हमेशा आलोचना का शिकार बनती किंतु अपनी मेहनत और योग्यता से काम करती। इसी बीच परिवार ने उसे बहुत जख्म दिए। जमीन-जायदाद के मुकदमों में उलझाकर उसे कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाने को मजबूर कर दिया। समाज के तमाम गिद्व की दृष्टि भी जाहनवी पर थी। कई लोगों ने जीवन में प्रवेश करना चाहा किंतु जाहनवी ने इन सभी का बहादुरी से जबाव दिया और अपना स्वाभिमान हमेशा अपने पिता को माना। परिवार के लिए जीने और मरने की उसकी सौंगध ने उसे जीवन का मानो एक लक्ष्य देदिया था। वह सभी की खुशियां का ख्याल रखती सभी के लिए कुछ न कुछ करती परकभी किसी के मन में जाहनवी की खुशी का ख्याल तक न आया।

मेरी जिंदगी में उसके लिए सिपर्फ प्यार था इसके अलावा मैं उसे कुछ दे नहीं सका। अपनेप्यार को कभी उससे व्यक्त्त तक न किया। जब भी उससे कुछ कहना चाहा तो उसकीपरिस्थितियां सुनकर चुप रह गया। आखिर शादीशुदा इंसान किसी दूसरी महिला सेप्यार कैसे कर सकता है? ये ऐसी लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करना शायद एकसज्जन व्यक्त्ति के लिए मुश्किल ही था। एक दिन मैने उससे पूछ ही लिया किजाहनवी तुम्हारे जीवन में कोई है? उसने कहा-मेरे जीवन में केवल मेरापरिवार है जिसके लिए मुझे बहुत कुछ करना है। मेरे प्यार को शायद उसनेसमझा ही नहीं था अथवा समझकर भी अनजान बन गई थी। उसका मानना था कि किसी की खुशियां छीनकर कभी कोई खुश नहीं रह सकता।

कभी मन होता तो कहती-‘मैं कभीकिसी के घर में आग नहीं लगा सकती। किसी की खुशी नहीं छीन सकती।’ उसके येवाक्य मेरे मन को पूरी तरह कुचलने के लिए काफी होते। पिफर मैने भी उस से बात करना बंद कर दिया। अपने मन को समझा लिया। किंतु कहते हैं ना ईश्वर कालिखा कभी मिट नहीं सकता। वहीं मेरी जिंदगी में हुआ। मैं उससे जितना दूरभागता वह मेरे उतना पास आती। हालात ऐसे बनते कि कब दस साल गुजर गये पता ही नहीं चला। उसके साथ मेरा प्रेम कभी खत्म नहीं हुआ। इसी बीच एक दिन पता चला कि वह शहर छोड़ गई है हमेशा के लिए। मोबाइल पर बात करने की कोशिश की तो नंबर बंद आया। तभी उसका व्हाटसअप पर एक मैसेज पढ़ा-‘सर मैं जानती हूं कि आपका मुझसे बेहद लगाव है। सच कहूं तो आपका प्यार एकदम सच्चा है। जिसका मैं सम्मान करती हूं और करती रहूंगी।

मगर मेरी अपनी जिम्मेदारी हैं, परिवार को देखना है। छोटे भाईयों को उनके पैरों पर खड़ा करना है। आपकी अपनी गृहस्थी है, पत्नी है बच्चे हैं। बेहतर यही है कि मैं आपकी जिंदगी से हमेशा के लिए अलविदा कह रही हूं। इससे आपका घर भी टूटने से बच जायेगा और मेरी जिदंगी का लक्ष्य भी पूरा हो जायेगा। मुझे गलत मत समझना। ह्दय में आपके लिए हमेशा सम्मान की भावना रहेगी, कृपया कभी संपर्क मत कीजिए ये निवेदन है।’ इस मैसेज ने तो मुझे तोड़ ही डाला। अब जाहनवी से कभी मुलाकात नहीं हो पायेगी। इस वियोग ने मुझे खूब रूलाया। किंतु अगले ही क्षण मेरे सामने मेरी पत्नी व बच्चों का चेहरा था। शायद मैं भटक रहा था, जाहनवी ने मुझे सही रास्ता दिखा दिया।

उसने ये शहर केवल मेरी खुशियों के लिए छोड़ा था। वो मेरे जीवन की पथ प्रदर्शक निकली, मैं गलत था, मुझे उससे प्यार करने का कोई अधिकार नहीं था। उसकी सच्ची और सापफ सुथरी छवि ने मुझे सही मार्ग दिखा दिया था। जाहनवी ने त्याग कर दिया था लेकिन जाहनवी हमेशा मेरे मन के एक कोने में रहेगी। उसके लिए मेरा प्यार हमेशा जिंदा रहेगा। चाहे कुछ भी हालात हो ये मेरा विश्वास है। वो मेरे जीवन में वाकई ‘मास्टरनी’ ही साबित हो गई।

डॉ. पंकज भारद्वाज
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